देश के सरकारी अस्पतालों में ‘रोगियों की हो रही घोर उपेक्षा’

डाक्टरी पेशे को आदर्श पेशा माना जाता है और इसीलिए समाज में डाक्टरों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इसी कारण करियर अपनाते समय वे शपथ लेते हैं कि मैं अपना दायित्व पूरी ईमानदारी से निभाऊंगा परंतु कभी-कभी ये भी ऐसी भयानक लापरवाही कर बैठते हैं जिसके चलते मरीजों की जान तक चली जाती है और या फिर वे जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं। डाक्टरों की लापरवाही के हाल ही के चंद उदाहरण निम्र में दर्ज हैं :
* गत वर्ष शिमला के सबसे बड़े सरकारी महिला अस्पताल के.एन.एच. अस्पताल के डाक्टरों की लापरवाही से समय पूर्व जन्मे एक नवजात बच्चे को आक्सीजन की अधिक मात्रा देने के कारण उसकी आंखों की रोशनी चली गई।
डाक्टरों का कहना है कि इस बच्चे की आंखों का परीक्षण जन्म के 15 दिनों के भीतर हो जाना चाहिए था परंतु डाक्टरों ने ऐसा नहीं किया जिससे बच्चे की आंखों के पर्दे सिकुड़ गए और वह पूरी तरह ज्योतिहीन हो गया।
* 29 दिसम्बर, 2015 को मध्य प्रदेश में बैतूल के जिला अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती एक महिला के पेट में डाक्टरों ने रूमाल छोड़ दिया जिसके चलते उसे चार महीने तक असहनीय दर्द झेलना पड़ा। इस वर्ष 12 अप्रैल को निजी अस्पताल में उसके दोबारा आप्रेशन के बाद ही उसे इस पीड़ा से राहत मिल सकी जिस पर इस परिवार के 75,000 रुपए खर्च हो गए।
* 26 अप्रैल को लखनऊ स्थित डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरकारी अस्पताल में घायल अवस्था में भर्ती राम नारायण जब बिस्तर पर तड़प रहा था और उसके परिजनों ने डाक्टरों व नर्सों से उसे देखने का अनुरोध किया तो उत्तर मिला कि, ‘‘देख रहे हैं, अंधे नहीं हैं’’ और अंतत: उसकी मृत्यु हो गई।
* 2 मई को लखनऊ के सी.एच.सी. में महिला के प्रसव के बाद जब उसके नवजात बच्चे को मेज पर रखा गया तो डाक्टरों की लापरवाही से वह फिसल कर नीचे गिर गया जिससे थोड़ी देर बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। परिजनों का आरोप है कि बच्चा जीवित पैदा हुआ था और कागजों में भी यही दर्ज किया गया था जिसे बाद में काट कर ‘गर्भ में मौत’ लिख दिया गया।
* 5 मई को मुम्बई में कांदीवली स्थित सरकारी शताब्दी अस्पताल में उपचाराधीन धमीला शेख को चूहे ने काट लिया जिससे उसकी तबीयत और बिगड़ गई।
* 5 मई को ही शिमला के जोनल अस्पताल डी.डी.यू. में प्रसव हेतु लाई गई महिला की मृत्यु हो गई। मृतक के परिजनों के अनुसार बार-बार असफल प्रसव पीड़ा झेल रही महिला ने 5 मई को सुबह के 4 बजे जब पेट में जोर का दर्द होने की बात कही तो यह कह कर उसे चुप करवा दिया गया कि उसकी डिलीवरी अगले दिन होगी और वह चुपचाप सो जाए, नहीं तो उसे वार्ड से बाहर भेज देंगे। महिला का दर्द बढ़ता गया और 5 बजे उसने दम तोड़ दिया।
* 11 मई रात को राजस्थान में पलसाना के सरकारी अस्पताल में गुड्डïी देवी नामक एक प्रसूता को उसके परिजन प्रसव के लिए लेकर आए परंतु रात में अस्पताल से डाक्टर गायब मिले और अस्पताल के कम्पाऊंडर प्रसूता के परिजनों को रात भर टरकाते रहे। इसी भाग-दौड़ के दौरान प्रसूता की मृत्यु हो गई।
* 11 मई को ही मुम्बई के सरकारी दिवालीबेन मेहता अस्पताल के स्टाफ के विरुद्ध जांच का आदेश दिया गया। आरोप है कि इसी वर्ष मार्च में इलाज के लिए आए रोगियों को ओ.पी.डी. से बाहर निकाल कर नर्सें व डाक्टर घंटों नाचते रहे।
* 15 मई को अजमेर स्थित सरकारी जे.एल.एन. अस्पताल में मात्र 5 घंटों में 6 नवजात बच्चों की मृत्यु हो गई। उनके परिजनों का आरोप है कि इस दौरान अस्पताल के शिशु वार्ड में एक भी सीनियर डाक्टर मौजूद नहीं था और उनकेबार-बार शिकायत करने के बावजूद जूनियर डाक्टरों ने कोई ध्यान नहीं दिया।
यहां उल्लेखनीय है कि डाक्टरों की लापरवाही के ऐसे ही एक मामले में शीर्ष उपभोक्ता फोरम ने 14 मई को दिल्ली के एक अस्पताल और उसके डाक्टरों को समय से पूर्व जन्म लेने वाले एक नवजात शिशु के उपचार में लापरवाही बरतने से संबंधित एक केस में, जिससे वह जीवन भर के लिए अपनी आंखों की ज्योति खो बैठा, एक महिला को 64 लाख रुपए की क्षतिपूॢत देने का आदेश दिया है।
डाक्टरों में संवेदनहीनता और लापरवाही के इस रुझान पर शीघ्र और कठोरतापूर्वक अंकुश न लगाया गया तो इसी तरह अस्पतालों में जीवन पाने के लिए जाने वालों का अकाल मृत्यु के मुंह में जाना जारी रहेगा।

Posted By : ( Crime Review )
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