'सियासत की अफीम चाटकर सोने वाले, किसे डेंगू की चिंता है'

दगा वहीं, जहां भरोसा। घात वहीं, जहां विश्वास। यूपी में माहौल ऐसा ही है। कोई बाहर वालों से परेशान तो कोई घर वालों से। सियासत से लेकर सोसायटी तक हर जगह यही हाल। जिसे और कोई तकलीफ नहीं, वह डेंगू से परेशान है। स्वच्छ भारत अभियान और डेंगू फैलाओ मिशन दोनों साथ-साथ हैं। स्वच्छता अभियान का असर दिल्ली दरबार के नवरत्नों से लेकर नेता-अफसरों तक के झाड़ू वाले सेल्फी पोज़ में ही दिखता है। डेंगू को किसी तरह की सेल्फ पब्लिसिटी की जरूरत नहीं। प्राइवेट से लेकर सरकारी तक सारे अस्पताल इस बुखार के मरीजों से भरे हैं।dengue मरीज को अस्पताल में दाखिल कराने के लिए उच्च स्तरीय सिफारिशों का दौर है। जिसे बेड मिल जाता है, वह धन्य हो जाता है।
ऐसे ही माहौल में एक दिन डेंगू फैलाने वाले मच्छर महोदय से मुलाकात हो गई। दंडवत प्रणाम के बाद बड़े आदर से पूछा कि भाई साहब क्यों कहर ढाए हैं। डेंगू जी बोले- भाई कहर तो चाचा जी ढाए हैं, हम तो मौसम के हिसाब से अपना काम कर रहे हैं। गुस्सा तो बहुत आया पर कंट्रोल करते हुए कहा कि भाई नेतागीरी न करो, बुखार के बारे में बात करो। पर डेंगू मच्छर तो मानो सीधे विक्रमादित्य मार्ग, लखनऊ से उड़ा आ रहा था। कहने लगा- पहले एक कहानी सुनो। फिर बिना मेरी प्रतिक्रिया देखे शुरू हो गया- एक जंगल में कौवों और उल्लुओं के दो झुंड रहते थे। कौवे दिन में खाना ढूंढते और उल्लू रात में। दोनों में दुश्मनी थी। उल्लू थोड़े बड़े थे और रात में अच्छा देख सकते थे। वो अक्सर रात में सोते हुए कौवों का शिकार कर ले जाते। कौवों के राजा ने परेशान होकर अपने एक चतुर सलाहकार कौवे से पूछा कि क्या किया जाए। सलाहकार ने कहा कि रात में सभा करिए। मैं जो उपाय बताऊंगा वह आपके कान में कहूंगा। रात में सैकड़ों कौवे सभा में आ गए। चर्चा शुरू हुई तो सलाहकार ने राजा के कान में कहा- दूसरे पेड़ पर छिपे उल्लू हमें देख रहे हैं। मेरी बात खत्म होते ही आप मुझे यह कहकर मारने लगना कि मैं गाली बक रहा था। चालाक उल्लू मुझे पिटा हुआ जानकर मुझे अपना भेदी बनाएंगे। फिर मैं उनके भीतर घुसकर उन्हें तहस-नहस कर दूंगा।
कहानी लम्बी हो रही थी तो झुंझलाहट होने लगी। मैंने कहा कि मुझे नहीं सुननी कहानी। तुम्हारी वजह से सारे अस्पताल भरे हैं। डॉक्टरों के यहां लम्बी-लम्बी लाइनें हैं।dengue-2 खून की जांच नहीं हो पा रही और तुम हो कि सियासत बघारे जा रहे हो। नेता, अफसर और आम लोग सभी परेशान हैं। तुम पर कोई असर ही नहीं हो रहा। यह सुनते ही डेंगू का मच्छर ठहाके मारकर हंसने लगा। उसने व्यंग्य भरी मुस्कराहट के साथ कहा- सियासत और दांवपेंच की अफीम चाट कर सोने वाले यूपीआइट, किसे डेंगू की चिंता है। नेता कुर्सी बचाने और झपटने की लड़ाई में उलझे हैं। ब्यूरोक्रेट समझ नहीं पा रहे हैं कि अगली विधानसभा में जुगाड़ फिट रखने के लिए कौन सी पार्टी ठीक रहेगी और आम लोगों की तो पूछो मत। वह लोग इसी फिराक में हैं कि कैसे अड़ोस-पड़ोस वालों की आंख चूके और वह अपने घर का कूड़ा दूसरे के घर के सामने फेंक सकें।
और तुम मीडिया वालो। तुम्हारे लिए क्या वाकई डेंगू से मरते लोग बड़ी खबर हैं? अगर हैं तो चैनलों, अखबारों की पहली खबर पर नेता क्यों हैं? डेंगू मच्छर जोर से हंसा और उड़ गया। अपन भी सदमे में आ गए और मोहसिन नकवी के इस शेर को याद करते हुए वापस चल पड़े-

ये दर्द की तनहाइयां, ये दश्त का वीरां सफर
हम लोग तो उकता गए, अपना सुना, आवारगी।

और हां आप सोच रहे होंगे। कौवों और उल्लुओं की जंग का क्या हुआ? डेंगू मच्छर जाते-जाते बता गया कि कहानी अभी डिवेलप हो रही है।

Posted By : crime review
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