अयोध्या विवाद: मुस्लिम पक्ष ने कहा संविधान पीठ को सौंपा जाए केस, हिन्दू पक्ष राजी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के संपूर्ण विवाद को संविधान पीठ को रेफर करने के मुद्दे पर डेढ़ घंटे की बहस सुनी। इसके साथ ही इस मामले में सुनवाई पूरी हो गई।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, अशोक भूषण और एस.ए. नजीर की विशेष पीठ के समक्ष हिन्दू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि मामले को संपत्ति विवाद की तरह से ही देखा जाए और उसे बड़ी बेंच को रेफर न किया जाए। देश और जनता 1992 से काफी आगे निकल चुकी है। अब इस मामले में भावनाओं और संवेदनशीलता को जाग्रत करना मुसीबतों को आमंत्रण देना होगा। इस मामले को अब सख्ती के साथ कानून के अनुसार तय किया जाए। साल्वे ने कहा कि जब मुकदमा लंबित था उस समय क्या -क्या हुआ। वह बिल्कुल अलग था। यह महज एक संपत्ति का विवाद है, जिसमें यह तय होना है कि यह संपत्ति ‘क’ की है या ‘ख’ की।

मुस्लिम पक्ष के वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि यह कहना कि हम 1992 से आगे निकल गए हैं, खुद को नकारने जैसा है। यह केस देश के जीवन और सामाजिक ताने-बाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, इसे बड़ी बेंच को ही सौंपा जाना चाहिए।

पीठ ने इसके साथ ही पूरे मामले को बड़ी बेंच को भेजे जाने के आग्रह पर बहस पूरी कर ली। अब कोर्ट इस मुद्दे पर सुनवाई करेगा कि फारूकी केस (1994 के इस मामले में संविधान पीठ ने मस्जिद को मुस्लिम धर्म का अभिन्न अंग नहीं माना है) किस तरह से रामजन्म भूमि- बाबरी मस्जिद विवाद पर असर डालता है। यह बहस राजीव धवन कर रहे हैं। रामचंद्रन ने कहा कि अगली सुनवाई पर 15 मई को यदि धवन स्वस्थ नहीं हुए तो इस मुद्दे पर उनकी जगह वह ही बहस करेंगे।

कोर्ट रूम लाइव :
तथ्यों में सिद्धांत खोजने का काम सुप्रीम कोर्ट के गेट के बाहर हो- हरीश साल्वे
यह परंपरा रही है कि हाईकोर्ट की फुल बेंच के फैसले के खिलाफ अपीलों में सुप्रीम कोर्ट में भी तीन जजों की पीठ सुनवाई करती है। उन्होंने कहा कि यदि हम तथ्यों में से सिद्धांतों की खोज करेंगे तो यह उचित नहीं होगा, यह काम सुप्रीम कोर्ट के मेन गेट के बाहर होना चाहिए, कोर्ट के अंदर नहीं।
साल्वे मुस्लिम पक्ष के इस आग्रह का जवाब दे रहे थे कि यह महत्वूपर्ण मसला है और पूरे मामले को बड़ी बेंच को रेफर करना चाहिए। साल्वे ने कहा कि तीन तलाक, बहुविवाह, पारसी समुदाय विवाह और भूमि के मामले लैंगिक न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़े थे, इसलिए वे संविधान पीठ को रेफर किए गए। ये मामले संवैधानिक संवदेशीलता से जुड़े थे। लेकिन यह महज एक संपत्ति विवाद है।

उन्होंने कहा कि रामचंद्रन ने जितने भी केसों की नजीरें दी हैं, उनसे कोई भी केस संपत्ति विवाद का नहीं है जिसे संविधान पीठ को रेफर किया गया होगा। कोर्ट से आग्रह है कि सार्वजनिक भावनाओं को विचार में न लाकर इसे सिर्फ संपत्ति विवाद की तरह से देखा जाए। यह सबके लिए बेहतर होगा।

मुस्लिम पक्ष :
वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन का कहना था कि यह मामला देश के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाला है। यह कहना कि हम आगे बढ़ चुके हैं, यह अपने को अंधेरे में रखने की बात होगी। यह महज एक संपत्ति विवाद नहीं है। उन्होंने कहा कि यह मामला खत्म तभी होगा जब ढांचे को गिराने के मामले में आपराधिक मुकदमे को भी सुप्रीम कोर्ट अंतिम रूप से निपटा देगा। उन्होंने कहा कि ऐसे बहुत से मामले हैं जब कोर्ट ने छोटे मुद्दों को संविधान पीठ को रेफर किए हैं। यह मुद्दा तो सार्वजनिक महत्व का है। इस मामले के तथ्य, पृष्ठभूमि और इतिहास मांग करता है कि इसे बड़ी बेंच को रेफर किया जाए। रामचंद्रन वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन के बीमार होने के कारण उनकी जगह बहस कर रहे थे।

यह मेरा आखिरी केस :
श्रीरामलला विराजमान के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन ने कहा कि यह उनका आखिरी केस होगा, जिसमें बहस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 1956 से वह बाल्मीकि रामायण का नियमित सुबह-शाम पाठ करते हैं। मेरी इसमें आस्था है।

जस्टिस मिश्रा :
हम आपको नहीं छोड़ेंगे और आपको एमाइकस क्यूरी नियुक्त करते रहेंगे। परासरन ने कहा कि उनकी शारीरिक शक्तियां अब आधी ही रह गई हैं।

परासरन :
सुप्रीम कोर्ट की एक गरिमा है वह साक्ष्य अधिनियम, पुरातत्वों के सबूत और अन्य सबूतों की जांच नहीं कर सकता। कोर्ट के सामने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील है। उसे उसका ही परीक्षण करना है। तीन जजों की पीठ इसके लिए उचित है। यदि पीठ इसे पांच जजों की पीठ को सौंपेगी तो वहां भी यही बहस होगी, उसके बाद मामला सात जजों की पीठ को जाएगा लेकिन बहस वही रहेगी। तो क्या यह बहस 15 जजों को सुननी पड़ेगी।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सबूतों की जांच कर फैसला नहीं देता। सबूतों के परीक्षण का काम सर्वोच्च अदालत सिर्फ एक ही केस में करती है और वह है राष्ट्रपति के चुनाव की याचिका। उन्होंने कहा कि व्यपाक जनहित इसमें ही है कि मामले का जल्द निस्तारण किया जाए। उन्होंने कहा कि एक वक्त ऐसा भी था कि दोनों पक्ष विवादित स्थल पर पूजा करते थे। लेकिन 1949 के बाद से मुस्लिम पक्ष ने दुर्भाग्य से नमाज पढ़ना बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि जहां तक दो समुदायों में सौहार्द की बात है तो इसका मुकदमे से कोई लेना-देना नहीं है।

Posted By : CRIME REVIEW
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