अपने हिसाब से न्याय व्यवस्था क्यों चलाना चाहती है कांग्रेस ?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब संविधान बचाओ रैली कर रहे हैं. उनकी दादी स्वर्गीय इंदिरा गांधी की आत्मा यदि इसे देख रही होगी, तो पूर्व जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की आत्मा भी कहीं से निहार रही होगी. पचास साल में बाजी पलट गई है. 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज सिन्हा ने इंदिरा गांधी के रायबरेली से निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया था. इंदिरा गांधी यानी कांग्रेस ने कोर्ट के फैसले का, संविधान का इतना सम्मान किया कि 26 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा दिया गया.

कांग्रेस को न तो तब कोर्ट का अपने इशारों के खिलाफ जाना बर्दाश्त था, न ही आज है. देश के सर्वोच्च न्यायाधीश के न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का बचकाना प्रयास यही दर्शाता है. चूंकि राहुल गांधी के साथ कांग्रेस बाल्यकाल में चली गई है, इसीलिए इस प्रयास को बचकाना कहना ही ठीक होगा. देश के सर्वोच्च न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग मजाक नहीं है. इसके लिए बहुत गंभीर अनियमितता के बहुत ठोस सुबूत होने जरूरी हैं. तभी तो उप राष्ट्रपति ने इस प्रस्ताव को अपने ही स्तर पर अस्वीकार करते हुए बहुत बड़ी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि प्रतीत होता है, संभावना है जैसे शब्दों के दम पर देश के सर्वोच्च न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग नहीं लाया जा सकता. हमें समझना होगा कि कांग्रेस को न्यायमूर्ति मिश्रा से क्या एतराज है. असल में ये एतराज न्यायमूर्ति मिश्रा से नहीं है. ये एतराज उस हर संवैधानिक संस्था है, जो कांग्रेस को रास न आए, जो उसके इशारों पर न नाचे. भारत की आजादी के साथ ही कांग्रेस ने इसे अपना विशेषाधिकार मान लिया था.

ये सवाल आजादी के चंद दिनों बाद ही खड़ा हो गया था. दुनिया के सबसे बड़े और लिखित संविधान को लागू होने के चंद माह बाद ही प्रधानमंत्री नेहरू के प्रस्ताव पर 18 जून 1951 को पहले संशोधन से गुजरना पड़ा. इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 368 को कांग्रेस ने हथियार बना लिया. ये अनुच्छेद संसद को संविधान में संशोधन की असीमित शक्तियां देता है. बहुमत के दम पर कांग्रेस संविधान को अपनी सुविधा के अनुसार बदलती रही. ये चलता रहता अगर केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार का मामला उच्चतम न्यायालय के सामने न आता. 24 अप्रैल 1973 के दिन को आप भारतीय संविधान, अदालत के लिए ऐतिहासिक मान सकते हैं. मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में 12 और सदस्यों की संविधान पीठ इस बात पर विचार के लिए बैठी कि क्या वास्तव में संविधान में संशोधन की शक्तियां असीमित हैं. संसद चाहे, तो क्या नागरिकों के मूलभूत अधिकार तक छीन सकती है. सात बनाम छह के बहुमत से फैसला आया और कांग्रेस की नाक में नकेल पड़ी. अदालत ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन उसी सीमा तक कर सकती है, जब तक कि संविधान के मूल ढांचे और अवधारणा पर असर न पड़े.

कांग्रेस ने अदालत और संविधान को धता बताकर क्या नहीं किया. 1967 से अदालत और कांग्रेसनीत सरकार के बीच तनाव शुरू हुआ. गोलकनाथ केस का ही उदाहरण ले लीजिए. इंदिरा को सुप्रीम कोर्ट ने साफ बताया कि वह किसी के संवैधानिक अधिकारों में दखल नहीं दे सकती. इंदिरा ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, उसमें भी अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा. इंदिरा तो इस कदर मनमानी पर उतर आईं थी कि उन्होंने 1970 में प्रीवी पर्स (राजघरनों को मिलने वाली पेंशन) ही खत्म कर दिया. जबकि ये भारत सरकार ने भारत में विलय के समय इन रियासतों से वादा किया था.

अब आप अंत में समझिए कि कांग्रेस को कैसे जज चाहिए. 1975 में जब इमरजेंसी लगी तो आठ नए जजों की नियुक्ति हुई. केशवानंद भारती के फैसले के कारण इंदिरा या यूं कहिए कि कांग्रेस के हाथ बंधे हुए थे. भारतीय संविधान के मूल ढांचे के रक्षक बने केशवानंद भारती के फैसले की समीक्षा के लिए मुख्य न्यायाधीश ए. एन. रे ने 13 अन्य जजों की संविधान पीठ गठित करी. देश के मुख्य न्यायाधीश को इससे ज्यादा शर्मिंदा क्या होना पड़ेगा, जब सुनवाई के समय ये पता चला कि इस फैसले की समीक्षा के लिए तो कोई अपील ही नहीं आई थी. फिर समीक्षा का सवाल कहां से आया. बेंच क्यों गठित हुई. बहरहाल दो दिन में ही इस बेंच को भंग करना पड़ा. देश के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी को इससे ज्यादा कभी शर्मसार नहीं होना पड़ा था. लेकिन इसके बावजूद रे कुर्सी पर बने रहे क्योंकि वह कांग्रेस को रास आते थे. कांग्रेस को ए. एऩ. रे ही रास आते हैं, दीपक मिश्रा नहीं.

Posted By : CRIME REVIEW
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