"मुसलमानों का भाई चारा मुसलमानों तक ही सीमित है, गैर मुसलमानों को वे काफिर मानते हैं,

भीम- मीम गठजोड़ सिर्फ राजनीतिक पैंतरा और कुछ नहीं

बात बहुत पुरानी नहीं है जब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती ने 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार' के नारे से अपनी राजनीति की शुरुआत की थी, नतीजा यह रहा कि हिंदू समाज की अन्य जातियां मायावती से दूर हो गईं। 2007 में मायावती के साथ सतीश चंद्र मिश्रा जुड़े तब नारा दिया गया 'हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं'। बसपा के इस सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले ने काम किया और बसपा सत्ता में आ गई। 2012 में इस दावे की हवा निकल गई। सपा ने उत्तर प्रदेश में बाजी मारी। हर दल को आजमा चुके लोगों ने इस बार भाजपा को चुना। उत्तर प्रदेश केवल एक उदाहरण है अब जबकि समाज का हर वर्ग एकजुट होकर विकास की बात कर रहा है तो जाति और मजहब की बिसात पर राजनीति करने वाले सभी दलों को खतरा महसूस हो रहा है। वे सत्ता के आदि हैं, उन्हें सत्ता चाहिए किसी भी कीमत पर। भले ही इसके लिए समाज में उन्हें कितनी ही गहरी खाई क्यों न पैदा करनी पड़े।आज हिंदू समाज से अनुसूचित जाति—जनजाति वर्ग को काटने के लिए एक नया राजनीतिक पैंतरा खेला गया है। इसे पैंतरे को नाम दिया गया भीम-मीम के गठजोड़ का। विशेषकर हिंदी पट्टी के राज्यों में इसे खूब प्रचारित किया जा रहा है। यह स्पष्ट तौर पर हिंदू समाज को तोड़ने का प्रयास है ताकि किसी भी तरह से सत्ता हासिल की जा सके।

भीम और मीम दो अलग पहचान

भीम और मीम ये दो भिन्न पहचान हैं। आजकल इनके एक होने की बात प्रचारित की जा रही है। लोगों को भगवाकरण के नाम पर डराया जा रहा है। दरअसल भीम नाम उस समाज को परिभाषित करता है जिस समाज ने सामाजिक व्यवस्था में आए दोषों के कारण वर्षों तक शोषण सहन किया। बाबा साहेब आंबेडकर जी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और समाज के इस वर्ग के सशक्तिकरण के लिए प्रयास किए । बाबा साहेब के विचार भारतीय दर्शन को ही परिलक्षित करते हैं, उनका सिर्फ एक ही हेतु है समतायुक्त समाज का निर्माण किया जाए।

भीम नाम समाज में सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों की बात करता हैं जिसका एक पक्ष राजनीतिक भी हैं पर राजनीतिक पक्ष ही सबकुछ है ऐसा नहीं है। भीम समाज वह है जिसके आदर्श कबीर , ज्योतिराव गोविंदराव फुले ,छत्रपति साहू महाराज, डॉ. हेडगेवार और बाबा साहेब आंबेडकर हैं।


वहीं मीम शब्द अपने अर्थ में किसी एक पूजा पद्धति को मनाने वाले वर्ग की पहचान हैं । मीम शब्द पर दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं उर्दू के जानकार डॉ. शब्बीर आलम कहते हैं “ मीम उर्दू का अक्षर हैं जिसको हिंदी में हम मा भी कहते हैं जो अंग्रेज़ी में ‘एम ‘हो जाता है मीम ‘म ‘शब्द से आने वाले शब्द ( हर्फ़) का प्रतिनिधित्व करता हैं , इसी क्रम में मुस्लिम अक्षर ‘म’ शब्द से आता हैं इसलिए राजनीतिक दलों ने एक विशेष समुदाय को परिभाषित करने के लिए इसका प्रयोग शुरू किया। जहां भीम शब्द का अर्थ वंचित जातियों के सभी लोगों को एकजुट कर भारत में समरस समाज की स्थापना करना है। वहीं मीम शब्द का उद्देश्य सिर्फ राजनीति करना है। समाज में बंटवारा हो और हिंदू समाज कमजोर हो एकमात्र इसी उद्देश्य से राजनीतिक दल यह खेल करने में जुटे हैं। रायबरेली उत्तरप्रदेश के मुस्लिम नेता हैदर अली नकवी कहते हैं “ भीम जहां अपने समाज की मुक्ति में निर्मित एक पहचान हैं वही मीम स्वार्थ में तैयार किया हुआ हैं। भीम और मीम गठबंधन पर मेरा मानना है कि यह सिर्फ स्वार्थ की राजनीति के लिए है इसका लक्ष्य कोई सामाजिक बदलाव नहीं बल्कि सत्ता प्राप्त ही एक मात्र लक्ष्य है।

"मुसलमानों का भाई चारा मुसलमानों तक ही सीमित है, गैर मुसलमानों को वे काफिर मानते हैं, जिससे घृणा झलकती है। इसीलिए मुसलमान उसी कौम के साथ वफादारी जताते हैं। जहां, मुस्लिम शासन हो। इस्लाम किसी सच्चे मुसलमान को, भारत को अपनी मातृभूमि बनाने की आज्ञा नहीं देता " बाबा साहेब आंबेडकर "

नहीं सफल होगी यह साजिश

इलाहाबाद के अनुसूचित जाति—जनजाति के नेता अजय सरोज (संपादक श्री पासी सत्ता पत्रिका) का कहना है “भीम-मीम का राजनीतिक रूप से कितना भी गठजोड़ बनाने का दावा क्यों न क़िया जाए लेकिन यह सामाजिक तौर पर सफल नहीं हो सकता। यह एक साजिश है जो सफल नहीं हो सकती। इसका सबसे बड़ा कारण दोनों समुदायों का सांस्कृतिक ताना-बाना भिन्न होना है। स्वयं बाबा साहेब आंबेडकर ने भी ऐसे किसी गठबंधन की बात को नकार दिया था।


मुसलमान ख़ुद ही आपस में जातियों में बंटे हुए हैं, ऐसे में वह हम लोगों के साथ कैसे हो सकते हैं जब उनमें स्वयं में ही इतने मतभेद हैं। मुसलमान भी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों साथ उसी तरह का व्यवहार करते हैं जैसा कि पुराने समय में सांमती सोच रखने वाले अन्य लोग उनके साथ व्यवहार किया करते थे। सिर्फ हिंदू समाज को बांटने और कुर्सी तक पहुंचने की लालसा में ऐसा किया जा रहा है। मुस्लिम समाज में सैयद , शेख़ , पठान , अंसारी और पसमंदां समेत अनेक वर्ग हैं। शादी विवाह तो दूर की बात एक दूसरे के साथ खाने और बैठने में भी इनमें मतभेद है। 90 के दशक में बनी डॉक्यमेंट्री “ India untouched“ में बिहार में मुसलमानों में मस्जिदों को लेकर क्या भेदभाव हैं इसको दिखाया गया है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज के लोगों के लिए काम करने वाले सुशील पासी कहते हैं “ मुसलमान कभी शोषित समाज के हिस्से नहीं रहे। इन्होंने बरसों तक शासन किया लेकिन जब मुगल साम्राज्य का पतन हुआ उसके बाद से यह लोग सामाजिक तौर पर नीचे जाने लगे। जबकि बाबा साहेब आंबेडकर के प्रयासों से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज के लोगों को उनके अधिकार मिले, उन्हें आगे बढ़ने के अवसर मिले। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज के लोग पढ़—लिख कर तरक्की कर रहे हैं जबकि मुसलमानों में शिक्षा का स्तर क्या है यह सभी जानते हैं। पाकिस्तान के पहले क़ानून मंत्री रहे जोगेंद्र नाथ मण्डल ने मुस्लिम और दलित गठजोड़ बनाने का प्रयास किया लेकिन जल्द ही उन्हें समझ में आ गया कि मुसलमानों की आस्था देश से ज्यादा उनके मजहब में है, नतीजतन जिन्ना की मौत के बाद उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा। अपने अंतिम समय तक वह मुस्लिम कट्टरवाद के बारे में लोगों को समझाते रहे। यदि भारत में दलितों की बुरी स्थिति के लिए कोई जिम्मेदार है तो वह मुसलमान शासक ही हैं। भारत में अस्पृश्यता की शुरुआत ही मुसलमानों के शासन के दौरान हुई।

उत्तर प्रदेश पहला हिंदू—मुस्लिम दंगा 1880 में हुआ था। तब से लेकर आज तक अनेकों बार दंगा हुआ। 1980 में मुरादाबाद में हज़ारों की संख्या में लोग मारे गए थे। बताया जाता है कि एक सुअर घूमता हुआ नमाज के समय ईदगाह में पहुंच गया। मुसलमानों ने आरोप लगाया कि ऐसा जानबूझकर किया गया। हंगामे की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची। मुसलमानों की भीड़ ने पुलिस पर पथराव कर दिया इसमें एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई। जवाबी कार्रवाई में कुछ लोग मारे गए। इसके बाद मुसलमानों ने ईदगाह के पास स्थित एक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज के लोगों की बस्ती पर हमला कर दिया। भारी संख्या में दलित लोगों को मारा गया। उनके घरों को जलाया गया। अभी चार साल पहले की बात है उत्तर प्रदेश के शामली जिले के सोनाटा गांव में एक हैंडपंप से पानी भरने को लेकर विवाद हुआ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अनुसूचित जाति के लोगों को सरकारी हैंडपंप से पानी नहीं लेने दिया। इसी प्रकार 2014 में मुजफ्फरनगर में मुसलमानों और अनुसूचित जाति के युवकों में अंडे ख़रीदने को लेकर विवाद हुआ बाद में मुसलमानों ने इन युवकों पर हमला कर दिया। नतीजतन उनके और मुस्लिमों के बीच संघर्ष हुआ। हाल ही में 24 अप्रैल को शिकोहाबाद के मोहल्ला काजी टोला में अनुसूचित जाति के एक युवक विद्याराम की मोहल्ले के मुसलमान युवकों ने मामूली बात पर पीट—पीटकर जान ले ली। इस घटना के बाद ये वहां पूरे क्षेत्र में तनाव है।

यदि खंगाले जाएं तो सैकड़ों ऐसे उदाहरण मिलेंगे जिनमें मुसलमानों ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज पर अत्याचार किए हैं। भीम और मीम का गठजोड़ केवल राजनीतिक दलों की सत्ता पाने की मंशा के कारण किया जाने वाले एक प्रयोग है जिसका इस्तेमाल वह आने वाले लोकसभा चुनावों में करना चाहते हैं। हिंदू समाज को उनकी इस बांटने वाली चाल को समझना होगा।


Posted By : CRIME REVIEW
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