महाशिवरात्रि के व्रत से जीवन में सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है

शिवरात्रि का व्रत प्रत्येक महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है मगर फाल्गुन मास को जो चतुर्दशी पड़ती है, उसकी अर्द्धरात्रि को 'महाशिवरात्रि' कहा जाता है। इस वर्ष यह पर्व 27 फरवरी की अर्द्धरात्रि को बृहस्पतिवार के दिन मनाया जा रहा है।
महाशिवरात्रि पर व्रत और जागरण करने का विधान है। उत्तरार्ध और कामिक के मतानुसार सूर्य के अस्त समय यदि चतुर्दशी हो, तो उस रात को 'शिवरात्रि' कहा जाता है। यह अत्यन्त फलदायक एवं शुभ होती है। आधी रात से पूर्व और आधी रात के उपरांत अगर चतुर्दशी युक्त न हो, तो व्रत धारण नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे समय में व्रत करने से आयु और ऐश्वर्य की हानि होती है। माधव मत से 'ईशान संहिता' में वर्णित है कि जिस तिथि में आधी रात को चतुर्दशी की प्राप्ति होती है, उसी तिथि में मेरी प्रसन्नता से मनुष्य अपनी कामनाओं के लिए व्रत करें।
विधि-विधान
महाशिवरात्रि के दिन भक्ति भाव और श्रद्धा से शिव पूजन करें। अगर संभव हो तो किसी विशिष्ट ब्राह्मण से विधि-विधान से पूजन करवाएं। रुद्राभिषेक, रुदी पाठ, पंचाक्षर मंत्र का जाप आदि करवाना शुभ होता है। व्रतधारी को ब्रह्ममूर्हत में स्नानादि के उपरांत सारा दिन भगवान शिव का नाम जाप करना चाहिए। संध्या समय पुन: स्नान करके भस्म का त्रिपुंड और रुदाक्ष की माला धारण कर कच्चा दूध, गंगा जल, दही, चंदन, घृत, अक्षत,जनेऊ, लोंग, इलायची, सुपारी, धूप, पुष्पादि व अन्य पूजन सामग्री से शिव पूजन करें। रात्रि के पहले प्रहर में संकल्प करने के बाद दूध से स्नान तथा 'ओम हीं ईशानाय नम:' का जाप करें। द्वितीय प्रहर में दही स्नान करके 'ओम् हीं अधोराय नम:' का जाप करें। तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र 'ओम हीं वामदेवाय नम:' तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं 'ओम् हीं सद्योजाताय नम:' मंत्र का जाप करें।
अगर आप संपूर्ण विधि विधान से व्रत करने में सक्षम न हों तो रात्रि के आरंभ में तथा अर्द्धरात्रि में भगवान शिव का पूजन करके व्रत पूर्ण कर सकते हैं। इतना भी न कर सकें तो पूरे दिन व्रत करके सायंकाल में भगवान शंकर की यथाशक्ति पूजा-अर्चना करके भी व्रत को पूर्ण किया जा सकता है। शिवरात्रि का व्रत करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा से जीवन में सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।
समस्त शास्त्रों के मतानुसार शिवरात्रि व्रत सबसे उत्तम है। शास्त्रों में इस व्रत को 'व्रतराज' कहा जाता है जो चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। आप में क्षमता हो तो अपने पूरे जीवन काल तक इस व्रत को करें अन्यथा 14 वर्ष के उपरांत संपूर्ण विधि-विधान से इसका उद्यापन कर दें।

Posted By : Crime Review
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