एक साल में हो जनप्रतिनिधियों का फ़ैसला'

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फ़ैसला दिया कि मौजूदा सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामलों की सुनवाई में निचली अदालतों को आरोप तय होने के एक साल के भीतर फ़ैसला दे देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश में एक साल की समयसीमा तय किए जाने के बाद अब जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में तेज़ी से फ़ैसले आ सकेंगे.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा की अगुवाई वाली पीठ ने यह फ़ैसला दिया है.
पीठ ने कहा कि अगर निचली अदालत ऐसे मामलों में एक साल के भीतर फ़ैसला नहीं सुना पाती है, तो उसे इसके लिए संबंधित हाईकोर्ट को सफ़ाई देनी होगी.
अदालत ने कहा है कि अगर इस सफ़ाई से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संतुष्ट हो जाते हैं, तो फ़ैसला सुनाने की अवधि बढ़ाई भी जा सकती है.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के आधार पर राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव की संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी.
अपने ताज़ा फ़ैसले में सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इसके लिए जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में रोज़ाना सुनवाई करनी चाहिए.
अदालत ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया.
आमतौर पर देखा जाता है कि भारत में क़ानूनी मामले कई साल तक लटके रहते हैं.
यह जनहित याचिका 'पब्लिक इंट्रेस्ट फ़ाउंडेशन' नाम के एक ग़ैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ने दायर की थी.

Posted By : CRIME REVIEW
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