क्षेत्रीय पार्टियों का अलग होना कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी

(CRIME REVIEW) लोकसभा चुनाव की तैयारियां अंतिम चरण पर हैं। आगामी 16 मई को जनादेश सामने आ जाएगा, किन्तु नतीजे आने से पूर्व ही कांग्रेस नीत यू.पी.ए. सरकार अपना डेरा-डंडा समेटने लगी है। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने अपने लिए 3, मोती लाल नेहरू मार्ग पर नया आवास ढूंढ लिया है। इसके साथ ही सरकार ने भी नई सरकार को सत्ता सौंपने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस सत्ता में वापस लौटने की उम्मीद खो चुकी है, इसीलिए यू.पी.ए. सरकार ने सभी मंत्रालयों से राष्ट्रीय महत्व के उन विषयों की सूची तैयार करने को कहा है, जिनके बारे में नई सरकार को अवगत कराना है। इस सूची में वैसे मुद्दे होते हैं, जिन्हें किसी भी पार्टी की सरकार को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में आगे ले जाना होता है।

कांग्रेस की हताशा एक बहुप्रचारित एस.एम.एस. से झलकती है। ‘2 हार्वर्ड (पी.चिदम्बरम, कपिल सिब्बल) और 2 ऑक्सफोर्ड (डा. मनमोहन सिंह, सलमान खुर्शीद) मेड यू.पी.ए. बैकवर्ड (पिछड़ा) एंड कांग्रेस ऑकवर्ड (अटपटा)’। मजे की बात यह है कि यह एस.एम.एस. एक कद्दावर केन्द्रीय मंत्री ने अपने नजदीकी सहकर्मियों और मीडिया के लोगों को भेजा था। पिछले 10 साल में यू.पी.ए. के कुशासन से जहां लोगों का विश्वास कांग्रेस से पूरी तरह टूट गया है, वहीं यू.पी.ए. के घटक दलों के साथ स्वयं कांग्रेस में भी नेतृत्व क्षमता को लेकर संदेह का भाव है। डा. मनमोहन सिंह पिछले 10 सालों से राज्यसभा के रास्ते प्रधानमंत्री बने रहे। अब उन्होंने संन्यास लेने की घोषणा कर दी है। यू.पी.ए. के तारणहार प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति पद संभाल रहे हैं। बाकी बड़े नेताओं में वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने चुनाव नहीं लडऩे का निर्णय लिया है। बेदाग छवि वाले रक्षामंत्री ए.के. एंटनी ने लोकसभा चुनाव लडऩे से इंकार कर राज्यसभा के रास्ते ही राजनीति में बने रहने का संकेत दिया है।

सन् 2004 के चुनाव से पूर्व कांग्रेस ने 14 दलों के साथ मिलकर यू.पी.ए. का गठन किया था। 2014 के चुनाव में कांग्रेस के साथ नैशनल कांफ्रैंस, राकांपा, राष्ट्रीय लोकदल, राष्ट्रीय जनता दल, महान दल और झारखंड मुक्ति मोर्चा का ही साथ शेष रह गया है। कई राज्यों में कांग्रेस अकेले चुनाव लडऩे को मजबूर है। तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों और पश्चिम बंगाल की 42 सीटों पर कांग्रेस का किसी के साथ कोई गठजोड़ संभव नहीं हुआ है। उड़ीसा, बिहार और छत्तीसगढ़ में देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के रहमोकरम पर खड़ी है। अलग तेलंगाना सृजित कर कांग्रेस को टी.आर.एस. से समर्थन मिलने की आशा थी, जिसे टी.आर.एस. प्रमुख चंद्रशेखर राव ने ठुकरा दिया है। तेलंगाना को लेकर आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं में जबरदस्त आक्रोश है। आंध्र प्रदेश के कांगे्रसी मुख्यमंत्री किरण रैड्डी ने त्यागपत्र देकर नई पार्टी गठित कर ली है। गठबंधन के दौर वाली राजनीति में क्षेत्रीय दलों का साथ छूटना कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। कुल मतदान में क्षेत्रीय दलों का मत प्रतिशत निरंतर बढ़ा है। 1999 के चुनाव में क्षेत्रीय दलों की हिस्सेदारी 47.95 प्रतिशत थी, जो सन् 2004 में बढ़कर 51.41 प्रतिशत और 2009 में 52.54 प्रतिशत हुई।

कांग्रेस के विपरीत भारतीय जनता पार्टी के साथ राजनीतिक दलों का जुड़ाव और अन्य दलों से राजनेताओं का पलायन जारी है। बिहार में लोकजनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान और पसमांदा समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले साबिर अली का जद (यू)छोड़कर भाजपा में आना देश में भाजपा के पक्ष में चल रही लहर की पुष्टि करता है। उत्तर प्रदेश में अपना दल, सुदूर दक्षिण में पट्टाली मक्काल काची, देसीय मुरपोकु द्रविड़ कषगम और मरुमलारची द्रविड़ मुनेत्र कषगम का भाजपा के साथ गठजोड़ महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। महाराष्ट्र में राकांपा ने 26 सीटें अपनी झोली में रखी हैं, वहीं बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस को 11 सीटों तक ही सीमित रखा है। कांग्रेस के युवराज ने दागी मंत्रियों-नेताओं को बचाने के लिए अपनी ही सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश को कूड़ा बताकर फाड़ डाला था। चारा घोटाले के आरोपी लालू प्रसाद से कांग्रेस का गठजोड़ साबित करता है कि कांग्रेस की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। वास्तव में राहुल का उपरोक्त निर्णय कांग्रेस की विवशता से ही उपजा था। जो मंत्रिमंडल 7 रेसकोर्स की जगह 10 जनपथ की परिक्रमा करता हो, वह मां-बेटे की जोड़ी से मंत्रणा किए बगैर कोई अध्यादेश लाने का दुस्साहस कैसे कर सकता है?

वास्तविकता तो यह है कि सरकार ने अध्यादेश को पारित कर उसे मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा था, जिन्होंने इस पर दस्तख्त करने से इंकार कर दिया। इसी मजबूरी के कारण राहुल गांधी को उस प्रैस कांफ्रैंस में आकर यह ड्रामा करना पड़ा, जिसमें केन्द्रीय मंत्री अजय माकन अध्यादेश को जरूरी बता रहे थे। पूरे देश में इस अध्यादेश को लेकर जन आक्रोश पहले से था, जिसे राहुल गांधी ने भुनाने का असफल प्रयास किया। देश के राजनीतिक इतिहास में संभवत: यह पहला चुनाव होगा, जिसमें सत्ताधारी दल का प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार से खुद को दूर रख रहा हो। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह अदृश्य हो गए हैं और कांग्रेस के कुशासन से लोगों में जो आक्रोश है, उसके कारण वह जनमानस से भी विलुप्त हो गए हैं। पं. जवाहर लाल नेहरू के बाद इतिहास डा. मनमोहन सिंह को दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री के तौर पर भले याद रखे, जिन्होंने 10 सालों तक लगातार देश की कमान संभाली, किन्तु उनकी सरकार की करतूतों के कारण वह हाशिए पर ही रखे जाएंगे। डा. मनमोहन सिंह अब तक के सबसे कमजोर और विवश प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। यू.पी.ए. सरकार की पहली पारी में वह कम्युनिस्ट संगियों का रोना रोते थे कि उनकी बंदिशों के कारण वह आर्थिक विकास कर पाने में अक्षम हैं किन्तु यू.पी.ए.सरकार की दूसरी पारी में उनकी क्या विवशता थी? भाजपा नीत राजग सरकार से कांग्रेस को 8 प्रतिशत की दर से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, जिसे सरकार ने खुद द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण में स्वीकारा था। आज विकास दर 4 से 5 प्रतिशत के बीच क्यों लुढ़की? एक सफल अर्थशास्त्री महंगाई को क्यों नियंत्रित नहीं कर पाए? ईमानदार प्रधानमंत्री की नाक के नीचे लूट-खसूट कैसे संभव हो पाई?

इन सब समस्याओं के मूल में सन् 2004 में किया गया नया राजनीतिक प्रयोग है। जिसके पास प्रधानमंत्री का पद है, उसके पास शक्ति नहीं है और जिसके हाथों में सारी शक्ति केन्द्रित है, उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। इस विसंगति के कारण केन्द्र में सरकार नाम की चीज नहीं रह गई थी। हरेक मंत्रालय अपने आप में सरकार था और केवल 10 जनपथ के प्रति जवाबदेह था। इसके दुष्परिणाम में अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी और उसका सारा खमियाजा जनता को भुगतना पड़ा किन्तु जनता अब इस अनूठे प्रयोग को और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। कांग्रेस दीवारों पर लिखी यह इबारत पढ़ रही है, इसलिए समय से पूर्व विदाई लेने में जुट गई है।

Posted By : Crime Review
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