क्रांतिकारी...बहुत क्रांतिकारी

(Crime Review) हाल में मीडिया और नेताओं के संबंधों को लेकर एक बहुत ही ‘क्रांतिकारी’ वीडियो सामने आया। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और एक एंकर के बीच मीडिया फिक्सिंग का यह वीडियो अब यूट्यूब पर वायरल हो चुका है। वीडियो सामने आने के महज 24 घंटे के भीतर इसे पांच लाख से ज्यादा लोगों ने देख डाला था और इस वीडियो पर जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई।

सवाल है कि 55 सेकेंड का यह सिर्फ वीडियो है या इसके साए में कुछ गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जो मीडिया और राजनेताओं की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा करते हैं। पहले बात मीडिया और मीडियाकर्मियों की। पत्रकारों के राजनेताओं से मधुर संबंध कोई नई बात नहीं है। लेकिन, सवाल है कि क्या संबंधों की खातिर पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता किया जा सकता है? पत्रकार और राजनेता साथ चलती रेल की दो पटरियों के समान होते हैं, जो चलते एक साथ हैं, लेकिन मिल नहीं सकते। पत्रकार का काम सवाल पूछना है। वो सवाल, जो जनता राजनेता से पूछना चाहती है। लेकिन, सवाल फिक्स होने लगे और सिर्फ नेता को खुश करने के लिए किए जाने लगे तो फिर पत्रकारिता कहां हुई। इस फिक्सिंग की सहूलियत के चलते ही नेता सिर्फ वहीं जाना चाहते हैं और जाने लगते हैं जहां उनकी पसंद के सवाल पूछे जाते हैं। दरअसल, मीडिया के लोगों को राजनेताओं से अपने संबंधों में एक संतुलन रखने की जरुरत है। दोनों के बीच एक बेहद बारीक सी लकीर है, और इसे ही पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा कहा जा सकता है। केजरीवाल के मीडिया फिक्सिंग वाले वीडियो में यह लक्ष्मण रेखा क्रॉस होते दिखती है।

अब बात अरविंद केजरीवाल की। और यह वीडियो अरविंद केजरीवाल को ही ज्यादा सवालों के घेरे में खड़ा करता है। वजह केजरीवाल लगातार मीडिया पर आरोप लगाते रहे हैं कि पूंजीवादी समूह मीडिया को चला रहे हैं। केजरीवाल का आरोप रहा है कि मीडिया उन्हें नजरअंदाज करता है, गलत खबरें चलाता है और यह सब मोदी के इशारे पर हो रहा है। हद तो यह कि केजरीवाल लगभग पूरे मीडिया को पूर्वाग्रह से ग्रस्त बता देते हैं। वो भी बिना सबूतों के।

सच यह है कि केजरीवाल खुद इंटरव्यू फिक्स करते हैं। कम से कम यह कोशिश करते हैं। सामने आए वीडियो में साफ है कि अरविंद केजरीवाल पार्ट टाइम संपादक की भूमिका निभा रहे हैं, और पत्रकार को सुझाव दे रहे हैं कि इंटरव्यू के किस हिस्से को ज्यादा चलाया जाए। हद तो यह कि बैकड्रॉप में भगत सिंह की तस्वीर लगाई गई ताकि खुद के शहीद होने का प्रतीकात्मक संकेत दिया जा सके। बिना यह जाने की भगत सिंह को सजा सुनाए जाने के बाबत उनके पास सटीक जानकारी नहीं है। 14 फरवरी को केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता छोड़ी थी, और किसी ने केजरीवाल को बता दिया कि इसी दिन भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी। केजरीवाल ने इस सूचना को पुष्ट किए बिना अपना पूरा बैकड्रॉप भगत सिंह के इर्दगिर्द तैयार करा लिया और इंटरव्यू में भगत सिंह के बाबत सवाल पूछे जाने का माहौल तैयार कर लिया। हैरानी की बात यह है कि भले ही यह आइडिया केजरीवाल को आया हो लेकिन उस इंटरव्यू में बाकायदा केजरीवाल से भगत सिंह के बारे में सवाल पूछे गए। यानी एंकर ने केजरीवाल को फुलटॉस गेंद दी ताकि वो उस पर छक्का मार सकें।

मीडिया के कई लोगों और कई राजनेताओं का कहना है कि इस वीडियो में चौंकाने वाला कुछ नहीं है क्योंकि ऐसा होता है। ऐसा होता होगा-इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन, सवाल है नैतिकता के ऊंचे मानदंडों के ध्वस्त होने का। अरविंद केजरीवाल और एंकर सभी ने नैतिकता के ऊंचे मानदंड बना रखे हैं, और इसी को वो बाजार में बेचते हैं। इसलिए सवाल तो उठेंगे ही।

वैसे, इस वीडियो ने भारतीय पत्रकारिता में नए युग की शुरुआत की है। क्योंकि ये खबर किसी पत्रकार, किसी संपादक या किसी चैनल ने ब्रेक नहीं की। इसे ब्रेक किया सोशल मीडिया पर एक्टिव लोगों ने। और न सिर्फ ब्रेक किया बल्कि अपने दम पर वायरल कर दिया। हमने भी बीस घंटे तक इस खबर पर आ रहीं तमाम प्रतिक्रियाओं पर नजर रखी। सिटीजन जर्नलिस्ट पर कार्यक्रम चलाने वाले अलग अलग चैनलों और उनके संपादकों ने इस खबर को छुआ भी नहीं। ऐसे संपादक चाहते हैं कि सिटीजन जर्नलिस्ट सिर्फ अपने घर के आसपास की टूटी सड़कें, बुनियादी समस्याएं और छोटे मोटे भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग करते रहें।

जब 20 घंटे तक इस खबर को महत्व नहीं दिया गया, तब हमने ज़ी न्यूज पर इस खबर को चलाने का फैसला किया। भारत में अभी करीब 10 करोड़ सोशल मीडिया यूजर्स हैं, और उनके बीच यह खबर तेजी से चर्चा का विषय बन रही थी। अभी जब मैं यह लेख लिख रहा हूं, यूट्यूब पर इस वीडियो को करीब 15 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। लेकिन, सेटेलाइट टीवी के करीब 50 करोड़ से ज्यादा यूजर्स इस खबर से पूरी तरह अंजान थे। उन तक खबर पहुंचाना ज़रुरी था और इसलिए हमने इस खबर को ज़ी न्यूज़ पर दिखाने का फैसला किया।

आजकल मार्केटिंग का ज़माना है। हर शुक्रवार को जब भी कोई नई फिल्म आती है, उस फिल्म के कलाकार तमाम न्यूज़ चैनल्स के ऑफिस में घूम घूमकर अपनी फिल्म को प्रमोट करते हैं। अक्सर उनकी यही फ़रमाइश होती है कि इंटरव्यू के दौरान सिर्फ फिल्म के बारे में पूछा जाए और उनकी निजी ज़िंदगी और आचरण के बारे में सवाल न किया जाए क्योंकि उसका फिल्म से कोई लेना देना नहीं है। वो इंटरव्यू से पहले साफ कर देते हैं कि वो सिर्फ प्रमोशन के लिए आ रहे हैं। ज्यादातर चैनल इस बात के लिए तैयार भी हो जाते हैं क्योंकि ऐसा करके वो उस बड़े फिल्मस्टार तक पहुंचने का मौका पा लेते हैं। अब तकरीबन यही बात राजनीति में भी होने लगी है। बड़े बड़े नेता सिर्फ उन पत्रकारों को इंटरव्यू देना चाहते हैं, जो सिर्फ उनसे उनकी पसंद के सवाल पूछें। और लोग उनके जवाबों को क्रांतिकारी कह सकें।

Posted By : Crime Review
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