‘इसी हश्र का हकदार था’ मुशर्रफ

जब नवाज शरीफ ने यह बात समझ ली कि भारत और पाकिस्तान का आपस में मिलजुल कर रहने में ही भला है तो उसने भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाहौर आमंत्रित किया तथा दोनों ने आपसी मैत्री और शांति के लिए 21 फरवरी, 1999 को ‘लाहौर घोषणा पत्र’ पर हस्ताक्षर किए।

आशा थी कि इससे भारतीय उपमहाद्वीप में शांति-सद्भावना का नया अध्याय शुरू होगा पर पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ ने प्रोटोकोल का उल्लंघन करते हुए न तो मिलने पर श्री वाजपेयी को सैल्यूट किया और न ही वह श्री वाजपेयी के स्वागत में दिए भोज में शामिल हुआ।

बाद में उसने नवाज का तख्ता पलट उसे जेल में डाला व सत्ता हथिया कर देश निकाला ही दे दिया। 1999 में कारगिल पर हमले में भी उसी का दिमाग था जिसमें उसने बड़ी संख्या में पाक सैनिकों को भूखे-प्यासे मरवाया।

20 जून, 2001 से 18 अगस्त 2008 तक पाकिस्तान का राष्ट्रपति रहा मुशर्रफ 2001 में प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी से वार्ता के लिए भारत भी आया परन्तु आगरा में वार्ता अधूरी छोड़ कर पाकिस्तान लौट गया।

27 दिसम्बर, 2007 को बेनजीर भुट्टो की हत्या के षड्यंत्र में अपना नाम आने व अन्य दमनकारी कृत्यों के चलते अपने विरुद्ध रोष बढ़ता देख वह 18 अगस्त, 2008 को राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र देकर हज को चला गया और 2013 में पाकिस्तान लौटने तक लंदन व अन्य स्थानों पर ही रहा।

‘आल पाकिस्तान मुस्लिम लीग’ पार्टी बनाने के बाद वह 24 मार्च, 2013 को चुनावों में भाग लेने के लिए पाकिस्तान आ गया। इसी बीच उसके विरुद्ध पाकिस्तान सरकार ने (1) 2007 में संविधान निलम्बित करने, (2)आपातकाल लगाने (3) न्यायाधीशों को हिरासत में लेने,(4) देशद्रोह आदि के आरोपों में 13 नवम्बर, 2013 को मुकद्दमा चलाने का निर्णय लिया।

मुशर्रफ ने मुकद्दमों की सुनवाई से बचने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए और जनवरी 2014 में अदालत में पेशी के लिए जाते समय रास्ते में ही छाती के दर्द के चलते अस्पताल में भी भर्ती हो गया लेकिन आखिरकार 28 फरवरी, 2014 को उसे अदालत में पेश होना ही पड़ा।

अदालत ने उस दिन मुशर्रफ को आरोपित नहीं किया परन्तु 14 मार्च को 3 जजों की विशेष अदालत ने उसके विरुद्ध सशर्त गिरफ्तारी के वारंट जारी करके 31 मार्च को फैसला सुनाते हुए उस पर आरोप तय कर दिए जिनके लिए उसे सजा-ए-मौत तक हो सकती है।

हालांकि अदालत ने फिलहाल मुशर्रफ के विदेश जाने पर रोक नहीं लगाई है जिससे उसके पाकिस्तान से खिसकने की आशंका प्रबल हो गई है और विशेष अदालत ने टिप्पणी भी की है कि मुशर्रफ फिलहाल एक ‘आरोपी’ है, ‘दोषी’ नहीं, अत: यह फैसला सरकार पर निर्भर है कि वह मुशर्रफ का नाम उन लोगों की सूची से हटाए या नहीं जिनके देश से बाहर जाने पर रोक है।

जिस मुशर्रफ ने अपने मनमाने कृत्यों से नवाज शरीफ को देश निकाला दिया था वही नवाज शरीफ आज पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की गद्दी पर फिर बैठा हुआ है जबकि परवेज मुशर्रफ अभियुक्त के कटघरे में खड़ा है।

पाकिस्तान के 66 वर्षों के इतिहास में लगभग आधी अवधि शासन करने वाली शक्तिशाली सेना के लिए यह एक बहुत बड़ा आघात है और परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान का पहला ऐसा सैनिक शासक है जिस पर विशेष अदालत में अभियोग चलेगा।

मुशर्रफ के विरुद्ध आरोप तय करने के बाद यह पहला मौका है जब हिंसा से लहूलुहान यह देश सेना के वर्चस्व से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पाकिस्तान के मंत्री एहसान इकबाल ने ठीक ही कहा है कि, ‘‘यह उन तमाम लोगों की कामयाबी है जिन्होंने तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष किया और इसके लिए अपना बलिदान देने से भी संकोच नहीं किया।’’

बड़ी मुश्किल से पाकिस्तान में लोकतंत्र लौटा है और न्यायपालिका तथा प्रैस की आजादी बहाल हुई है। ऐसे में अपने सैनिकों तथा अन्य सैंकड़ों लोगों को मरवाने और देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नष्ट करने के दोषी परवेज मुशर्रफ को उसके किए की सजा देना बहुत जरूरी है।

Posted By : Crime Review
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