फिर सिर उठा रहा आतंकवाद " जम्मू-कश्मीर में "

निस्संदेह पिछले एक दशक के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में कुछ कमी दर्ज की गई थी लेकिन अब यह फिर से सिर उठाने लगा है और इस बार जम्मू-कश्मीर विशेषकर जम्मू संभाग के ऐसे जिलों को निशाना बनाया जा रहा है जो आतंकवाद की दृष्टि से अब तक अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र माने जाते रहे हैं। पहले साम्बा जिले में भारत-पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर सुरंग का मिलना और फिर कठुआ के हीरानगर पुलिस थाने एवं साम्बा के सैन्य शिविर में घुसकर आतंकी हमला सुरक्षा एजैंसियों के कान खड़े करने के लिए काफी था लेकिन अब कठुआ जिले के दयाला चक में हमले के साथ आतंकवादियों ने एक बार फिर इस शांत क्षेत्र में दस्तक देकर न केवल अपने नापाक इरादे दर्शाए हैं, बल्कि सुरक्षा एजैंसियों को खुली चुनौती भी दे डाली है।

आतंकवाद के पोषक तत्वों के तौर पर पिछले कुछ वर्षों में राज्य में हवाला राशि, जाली करंसी, पूर्व आतंकवादियों का आगमन और गैर-पंजीकृत मदरसों की संख्या में अचानक उछाल आया है। इसके अलावा अवैध तौर पर भारत पहुंचे बर्मी एवं बंगलादेशी नागरिकों के लिए भी जम्मू-कश्मीर सुरक्षित शरणस्थली बन गया है और राज्य का सबसे शांत माना जाने वाला जम्मू जिला इन गतिविधियों के केंद्र के तौर पर उभर रहा है। उधर, पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ और सुरक्षा बलों पर हमलों का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

ताजा जानकारी के अनुसार पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर स्थित विभिन्न आतंकी प्रशिक्षण शिविरों में 4132 आतंकवादी भारत में घुसकर दहशत फैलाने के लिए तैयार बैठे हैं। फिर अफगानिस्तान से अमरीकी सेनाओं की वापसी के बाद बदले हालात में सैन्य कमांडर भी जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियां बढऩे का स्पष्ट संकेत दे चुके हैं, इसके बावजूद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हैं कि राज्य से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को हटाए जाने की रट लगाए हुए हैं।

आंकड़े बताते हैं कि पिछले 5 वर्ष के दौरान राज्य में 250 सुरक्षा कर्मी शहीद हुए हैं जबकि 179 आम नागरिकों ने भी आतंकवाद का शिकार बनकर अपनी जान गंवाई है। इन आतंकी घटनाओं में घायल होने वालों में 555 सुरक्षा कर्मी और 377 नागरिक शामिल हैं। इस अवधि के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा आतंकी ठिकानों से 607 किलोग्राम आर.डी.एक्स., 262 किलोग्राम आई.ई.डी., 3249 ग्रेनेड, 366 इलैक्ट्रॉनिक डैटोनेटर, 91 ए.पी. माइन्स, 25 ए.टी. माइन्स, 1125 ए.के.-47/56/74 राइफलें, 869 पिस्टल/रिवाल्वर, 201 आर.पी.जी., 43 (.303) राइफलें, 12 स्नीपर राइफलें, 82 राकेट बूस्टर, 16 यू.एम.जी., 11 एल.एम.जी., 4584 मैगजीन, 127 राकेट, 509 वायरलैस सैट, 77 दूरबीनों समेत भारी मात्रा में असला एवं अन्य सामान बरामद किया गया।

सुरक्षा बलों ने अपनी जान पर खेलकर इस असले को बरामद किया और आतंकवादियों को भी मार गिराया, वर्ना इतने असले से आतंकवादी राज्य में कितनी ही तबाही मचा सकते थे। आतंकवादियों एवं अन्य राष्ट्र्रविरोधी ताकतों को आर्थिक सहायता पहुंचाने के लिए सक्रिय हवाला एवं जाली करंसी माफिया की गतिविधियों का आलम यह है कि पिछले 3 साल के दौरान जम्मू-कश्मीर के विभिन्न जिलों में हवाला राशि के 36 केस पकड़े गए और 67,62,778 रुपए की राशि बरामद की गई, जबकि जाली करंसी के 79 केस पकड़े गए और 73,04,300 रुपए की जाली करंसी पकड़ी गई।

हमारा आशय यह कतई नहीं है कि मजहबी तालीम के मकसद से स्थापित मदरसों में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का संचालन किया जाता है लेकिन इतना जरूर है कि जम्मू-कश्मीर में बढ़ती मदरसों (विशेष तौर पर गैर-पंजीकृत मदरसों) की तादाद को आधुनिक शिक्षा पद्धति की दृष्टि से बहुत अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। स्कूल शिक्षा विभाग के मुताबिक वर्ष 1996 में जम्मू-कश्मीर में कोई मदरसा नहीं था। वर्ष 2002 में 23 मदरसों का पंजीकरण किया गया जबकि गैर-पंजीकृत मदरसों की संख्या 9 थी। वर्ष 2008 में पंजीकृत मदरसों की संख्या तो 23 ही रही लेकिन गैर-पंजीकृत मदरसों की संख्या बढ़कर 11 हो गई। इस संबंध में ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं क्योंकि इस समय राज्य में 298 मदरसों का पंजीकरण हो चुका है और गैर-पंजीकृत मदरसों की संख्या भी बढ़कर 165 तक पहुंच गई है। इन मदरसों में 875 शिक्षक पढ़ाते हैं जिनमें से कुछ शिक्षक पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और असम सरीखे दूरदराज राज्यों से आकर राज्य के बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

पंजीकृत मदरसों में शिक्षा में गुणवत्ता लाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा पिछले 2 वर्षों में कश्मीर संभाग में स्थित मदरसों को 1 करोड़ और जम्मू संभाग के मदरसों को 1.39 करोड़ रुपए की सहायता दी गई है लेकिन गैर-पंजीकृत मदरसों को लेकर हर कोई चुप है। जहां तक पाकिस्तान के सीधे हस्तक्षेप का सवाल है तो वर्ष 2013 में 195 बार संघर्ष विराम संधि का उल्लंघन करने के अलावा पाकिस्तानी रेंजर्स लांस नायक हेमराज और सुधाकर सिंह की निर्मम हत्या जैसी कायराना हरकतों को भी अंजाम दे चुके हैं, जबकि इससे पहले 2012 में नियंत्रण रेखा पर केवल 93 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ था। बहरहाल, तमाम परिस्थितियों और विशेषकर हालिया आतंकी घटनाओं को ध्यान में रखते हुए यह कहना बेमानी होगा कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का दौर अब गुजर चुका है।

Posted By : Crime Review
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