‘व्यापार’ बन गया है आज वकालत का पेशा

मद्रास उच्च न्यायालय की स्थापना के 150 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। मद्रास उच्च न्यायालय में वकालत का पेशा उस स्वर्णिम युग का आधार रहा है जब वकालत को एक महान समाज सेवा, राष्ट्र सेवा और न्याय तथा कानून की स्थापना में प्रखर स्थान मिला है। आधुनिक युग में कानून का पेशा पूरी तरह से बदल चुका है। इस बदलाव को एक शब्द में व्यक्त करना हो तो यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रसेवा के स्थान पर यह पेशा एक बहुत बड़ा व्यापार बन चुका है। जिस गति से हमारे समाज में बदलाव आ रहे हैं उन्हें देखते हुए यह सहज कल्पना की जा सकती है कि इस पेशे का भविष्य आने वाले 2-3 दशकों के बाद क्या होगा?

पिछली 2 शताब्दियों की तुलना में इस पेशे में आज क्या-क्या बदलाव देखने को मिलते हैं? अधिवक्ताओं की संख्या बहुत अधिक बढ़ चुकी है। भारत की बार कौंसिल कानून की शिक्षा और प्रशिक्षण पर कोई विशेष छाप नहीं बना पाई। यहां तक कि बार कौंसिल इस पेशे के सदस्यों के व्यवहार, आचरण आदि को लेकर किसी ठोस आचार संहिता का निर्माण करके उसे प्रभावशाली ढंग से लागू भी नहीं करवा पाई। सामान्य जनता का नजरिया इस पेशे के प्रति पूरी तरह से बदल चुका है।

आज सामान्य जनता वकालत को भ्रष्ट, अनैतिक और गैर-कानूनी गतिविधियों का संरक्षक समझती है। यहां तक कि व्यक्तिगत मुकद्दमेबाजी के संबंध में भी सामान्यजन वकीलों के बारे में यह राय रखते हैं कि इनके चंगुल में फंसना अपना आर्थिक दोहन करवाना है। वकालत में आजकल ऐसी घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं जिनमें कोई वकील अपने विपक्षी वकील के साथ मिलजुल कर अपने आर्थिक हितों के दृष्टिगत भी कार्य करने से परहेज नहीं करते। कुल मिलाकर वकालत करने वाले मस्तिष्क का पूर्ण व्यापारीकरण हो चुका है। शायद इसलिए आज सामान्य वकीलों को वो प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हुई जो लगभग 5 दशक पूर्व प्राप्त थी।

अनेकों बार यह भी देखा जाता है कि सूचना तकनीक के इस युग में सामान्य लोगों को अपने संबंधित विषय पर वकीलों से अधिक कानूनी जानकारी होती है, क्योंकि हर प्रकार की जानकारी इंटरनैट पर उपलब्ध है। वादी-प्रतिवादी जनता इस सारी जानकारी के साथ जब वकील के पास पहुंचती है तो वह उससे केवल यही आशा करती है कि वह इसे कानूनी प्रक्रिया में समझदारी से न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करेगा। इस सारे कार्य में अपने ग्राहक के प्रति वफादारी की आशा भी वकील से की जाती है। प्राचीन युग में वकीलों के मुंशी आदि उनकी फीस ग्राहक के साथ तय करते थे। आज वकालत में प्रतियोगिता बढऩे के कारण यह काम वकीलों को स्वयं करना पड़ता है। आज इस कार्य को शर्मिंदगी से भी नहीं देखा जाता।

कानून का दायरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। आज कानून का पेशा केवल पारम्परिक दीवानी, फौजदारी आदि मुकद्दमों तक ही सीमित नहीं रहा। इसलिए कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को कुछ विषयों के संबंध में अपने आपको पूरी तरह से तैयार कर लेना चाहिए। विशेष रूप से आज के छात्रों को इन नई तकनीकों के साथ-साथ वकालत की आचार संहिता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आज तक वकालत के प्रति अपमान की छवि बढ़ती रही है। इस अपमानजनक छवि की पृष्ठभूमि में केवल अनाचार और अनैतिक व्यवहार ही कारण रहा है।

वकीलों का पुलिस अधिकारियों के साथ टकराव भी आए दिन देखने को मिलता है। वकीलों की संख्या आज देश के पुलिस बल की संख्या से भी अधिक हो चुकी है परन्तु वकील संगठनों के बार-बार आन्दोलन के बावजूद सरकार ऐसा कोई नियम या आचार संहिता का प्रावधान नहीं बना पाई जिसमें पुलिस अधिकारियों को वकीलों के साथ सम्मानजनक व्यवहार के लिए बाध्य किया जा सके।

वकालत के पेशे से अभी आशावाद की किरण समाप्त नहीं हुई। आज भी यदि वकालत का पेशा एक मजबूत आचार संहिता को लागू कर पाए तो देश में राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार तथा अनैतिकता आदि राक्षसी समस्याओं के उपाय सरलता से निकल सकते हैं। कांग्रेस, भाजपा, क्षेत्रीय दल या आम आदमी पार्टी सभी को देश के प्रशासन को एक कुशल प्रशासन में बदलने वाले महान कानूनविदों की आवश्यकता है। वर्तमान कानूनविदों की महानता के अभाव में ही सभी राजनीतिक दल अंधेरे में ही तीर चलाते जा रहे हैं।

Posted By : Crime Review
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