नेहरू-गांधी परिवार को वाड्रा ने किया कलंकित

संघ परिवार के हाशिए पर विचरण करने वाले कुछ मुट्ठी भर लोगों द्वारा आश्चर्यजनक हस्तक्षेप के बावजूद मोदी का काफिला आगे बढ़ता जा रहा है। भाजपा में लगभग शून्य हैसियत रखने वाले कुछ लोगों द्वारा केवल अपनी ओर ध्यान खींचने के उद्देश्य से दिए गए बयानों को सैक्युलर ब्रिगेड ने जिस प्रकार तूल दी वह घोर ङ्क्षनदनीय है, हालांकि उन्हें भ्रम था कि मोदी के विरुद्ध ऐसी बयानबाजी से शायद पूरा पासा ही पलट जाएगा।

जिस प्रकार डूबते व्यक्ति को तिनके का सहारा होता है बिल्कुल उसी प्रकार कांग्रेस पार्टी के डूब रहे चुनावी अभियान को प्रवीण तोगडिय़ा की पागलाना बयानबाजी के बूते पार लगाने के सपने देखे जा रहे हैं। स्मरण रहे कि एक दशक से भी ज्यादा पहले मोदी ने तोगडिय़ा को इतनी बुरी तरह हाशिए पर धकेल दिया था कि गुजरात में वह एक प्रकार से अवांछित व्यक्ति ही बन कर ही रह गए हैं।

यदि तोगडिय़ा ने राष्ट्र को यह याद दिलाने की कोशिश की हो कि वह अभी भी पहले की तरह दनदनाते हैं तो उन्हें निश्चय ही कुछ नाटकीय बयानबाजी की जरूरत थी और उन्होंने ऐसा ही किया। इस पर कोई ज्यादा ङ्क्षचता करने की जरूरत नहीं। कांग्रेस में भी बहुत से ‘सैक्युलर तोगडिय़ा’ हैं-उदाहरण के तौर पर इमरान मसूद- जिन्होंने कुछ ही दिन पूर्व बयान दिया था कि वह मोदी की बोटी-बोटी कर देंगे। लम्बे-चौड़े संघ परिवार में कई ‘साम्प्रदायिक तोगडिय़ा’ मौजूद हैं। कांग्रेस और संघ परिवार दोनों की ही ये नस्लें एक-दूसरे की परवरिश करती हैं लेकिन इनके प्रति सबसे समझदारी भरा रवैया यही होगा कि इनको अकेला छोड़ दिया जाए। इनकी अवहेलना करना ही इन्हें अप्रासंगिक बनाने का बेहतरीन तरीका है।

लेकिन यदि संघ परिवार में तोगडिय़ा जैसे दो-चार लोग नहीं होंगे तो कांग्रेस-मार्का सैक्युलरवाद कैसे फले-फूलेगा। अल्पसंख्यकों का वोट सामूहिक रूप में बटोरने के लिए वह उन्हें काल्पनिक डर दिखाता रहता है। यदि तोगडिय़ा जैसे लोग न हों तो शायद कांग्रेस को स्वयं इनका आविष्कार करना पड़ेगा क्योंकि इनके बिना वह अपने विशेष प्रकार के सैक्युलरवाद की डफली कैसे बजा सकेगी? अल्पसंख्यक वोट हासिल करने के लिए कांग्रेस की लार टपकती रहती है जबकि उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति सुधारने के नाम पर यह जुबानी जमा-खर्च के अलावा कुछ भी नहीं करती।

यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि मीडिया कैसे एक खूबसूरत चेहरे को अपने पर जादू चलाने की अनुमति देता है। प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा के विरुद्ध अवैध ढंग से भारी मात्रा में पैसा बनाने के आरोप अनेक प्रकार के दस्तावेजों पर आधारित हैं लेकिन प्रियंका ने अपनी टिप्पणियों में इस विषय को छुआ तक नहीं। पीतल के बर्तनों की बिक्री करने वाले मुरादाबाद के इस मामूली से व्यापारी को विपक्ष ने अपने अभियान में बिल्कुल ही न घसीटा होता यदि उसने दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान की कांग्रेस सरकारों का दुरुपयोग करके रातों-रात अपनी दौलत कई गुणा न बढ़ाई होती। आखिर केवल स्कूली पढ़ाई वाले इस व्यक्ति के पास जादू की कौन-सी छड़ी है जिससे उसने कुछ ही वर्षों में 1 लाख रुपए की पूंजी को 300 करोड़ रुपए में बदल दिया? रियल एस्टेट कारोबार में उसे संरक्षण देने वाले लोगों की विशेषज्ञता और कांग्रेस सरकारों की उसके आगे जी-हजूरी करने की तत्परता के बिना क्या ऐसा संभव था?

इस बात में लेशमात्र भी संदेह नहीं कि कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के आशीर्वाद के बगैर वाड्रा फटाफट अमीर बनने के अपने घोटाले में कदापि सफल न हुआ होता। इसके बावजूद वाड्रा की प्यारी अद्र्धांगिनी की हिमाकत तो देखिए कि उसने इन तमाम आरोपों को यह कह कर रद्द कर दिया कि उसे नाजायज तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। इससे भी आगे बढ़ते हुए उसने कहा, ‘‘मेरे परिवार को जलील किया जा रहा है...लेकिन जितना हमें जलील किया जाएगा, हम उतने ही मजबूत होकर निकलेंगे।’’

जबकि सच्चाई यह है कि प्रियंका के परिवार को यदि किसी ने जलील किया है तो वह है केवल वाड्रा। उसके भूमि घोटाले नेहरू-गांधी परिवार पर कलंक हैं। प्रियंका बार-बार अपनी दादी का नाम जपती है, उसे यह भली-भांति पता होना चाहिए कि उसका फिरोज गांधी नाम का दादा भी तो था। फिरोज गांधी ने बहुत मर्दानगी दिखाते हुए लोकसभा में देश के प्रथम घोटाले का पर्दाफाश किया था। इस पर फिरोज गांधी के ससुर साहिब (यानी प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू) खूब लाल-पीले हुए थे। फिरोज गांधी की पत्नी भी अपने पिता की तरह ही उनसे नाराज हुई थी। फिर भी नेहरू को अपने वित्त मंत्री की बलि देनी पड़ी और जांच का आदेश जारी करना पड़ा था। इस घोटाले को ‘‘मुंदड़ा स्कैंडल’’ के नाम से जाना जाता है। इस स्कैंडल के पर्दाफाश का एक अन्य लाभ यह हुआ कि मीडिया को संसद में कही गई बातों की रिपोर्टें बिना किसी भय के रिपोॄटग करने के मामले में कानूनी संरक्षण हासिल हो गया।

प्रियंका को चाहिए तो यह था कि वह वाड्रा पर लगाए गए आरोपों का एक-एक करके विवेकपूर्ण ढंग से जवाब देती लेकिन उसने केवल भावनात्मक भड़ास निकालना ही बेहतर समझा। बेशक वह दस्तावेजी सबूतों पर आधारित इन आरोपों के विरुद्ध कोई संतोषजनक प्रतिक्रिया नहीं दे सकी, फिर भी मीडिया ने उसके बयानों को खूब प्रचारित किया। आखिर मीडिया भी जानता है कि युवा और खूबसूरत चेहरा दर्शकों का ध्यान खींचता है।

यदि प्रियंका सचमुच ही अपने परिवार की प्रतिष्ठा पर चिंतित है तो उसे अपने पति द्वारा ‘कमाई गई’ एक-एक पाई का स्रोत ढूंढना चाहिए। यह पक्की बात है कि यदि पत्नी अपने पति की कमाई पर नजर रखे और किसी भी प्रकार की कठिनाइयों के बावजूद उसकी अवैध दौलत का प्रयोग करने से इंकार कर दे तो भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

Posted By : Crime Review
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