खुले में शौच करने वालों की भारत में संख्या विश्व में सर्वाधिक

ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने 22 अक्तूबर, 2012 को कहा था कि ‘‘हम खुले में शौच की विश्व राजधानी हैं और विश्व भर में खुले शौच का 60 प्रतिशत भारत में होता है जो हमारे लिए शर्म की बात है।’’ और अब तो संयुक्त राष्ट्र ने भी अपनी ताजा रिपोर्ट में इसकी पुष्टि करते हुए कह दिया है कि ‘‘भारत में खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या अभी भी विश्व में सबसे अधिक है।’’

विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनीसेफ की संयुक्त रिपोर्ट ‘प्रोग्रैस ऑन ड्रिकिंग वाटर एंड सैनीटेशन-2014 अपडेट’ में कहा गया है कि ‘‘विश्व भर में खुले में शौच करने वाले 1 अरब लोगों में से 82 प्रतिशत लोग केवल 10 देशों में हैं। वैश्विक रूप से भारत ऐसा देश बना हुआ है जहां सबसे अधिक (59.7 करोड़) खुले में शौच करने वाले लोग रहते हैं।’’ न सिर्फ इससे विश्व समुदाय में भारत की छवि धूमिल हो रही है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी अत्यंत प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। अमरीका स्थित पिंस्टन विश्वविद्यालय के शिक्षाविद् डीन स्पेयर्स ने खुले में शौच की बुराई के कारण भारतीय बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव के संबंध में अपनी अध्ययन रिपोर्ट के तथ्यों का खुलासा करते हुए 9 अप्रैल 2013 को कहा था कि इसी कारण से बच्चों के कद में कमी देखी जा रही है।

उन्होंने चेतावनी दी थी कि बच्चों के जन्म के 2 वर्ष का समय उनके शारीरिक विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में खुले में शौच के कारण विभिन्न बीमारियों के कीटाणु बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। बच्चों के सामान्य कद में आ रही कमी का यह एक कारण है और बड़ी आयु के लोग भी खुले में शौच के खतरों से मुक्त नहीं हैं।

खुले में शौच से जल की गुणवत्ता समाप्त हो जाती है। यह पीने के योग्य नहीं रहता और इससे विभिन्न बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है। जल की गुणवत्ता में एक खास पहलू यह है कि इसमें मल की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए। इसीलिए जब पेयजल की बैक्टीरियोलॉजिकल जांच की जाती है तो उसमें सबसे पहले मल प्रदूषण की उपस्थिति की ही जांच की जाती है।

ई-कोलाइ नामक बैक्टीरिया जल में मानव के मल की उपस्थिति के संकेत देता है। जहां मल प्रदूषण से न केवल भू-जल दूषित होता है वहीं कृषि उत्पाद भी इस प्रदूषण से अछूते नहीं रहते। खुले में शौच के परिणामस्वरूप यही मल डायरिया, हैजा, टाईफाइड जैसी बीमारियों के कीटाणु फैलाता है।

अत: उचित शौचालय न केवल विभिन्न रोगों से बचने के लिए आवश्यक हैं बल्कि साफ-सुथरे पर्यावरण के लिए भी जरूरी हैं। शौचालय में मानव मल का एक ही स्थान पर निपटान संभव है और इससे पर्यावरण साफ-सुथरा और सुरक्षित रखा जा सकता है।

निश्चित ही खुले में शौच एक गंभीर समस्या है और स्वच्छता एवं मानव स्वास्थ्य के लिए गम्भीर खतरा है। इसीलिए गांधी जी ने भी कहा था कि ‘‘स्वच्छता स्वतंत्रता से भी अधिक महत्वपूर्ण है अत: हमें खुले में थूकने व शंका निवारण आदि से संकोच करना चाहिए।’’ इसीलिए 3 सितम्बर 1946 को अपने एक भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि ‘‘नौकरों के क्वार्टर भी मंत्रियों के क्वार्टरों की भांति ही साफ होने चाहिएं।’’

वैज्ञानिक परीक्षणों ने सिद्ध कर दिया है कि खुले में शौच के रुझान पर रोक लगा कर और गांवों को निर्मल बनाकर ही हम न केवल पेयजल का प्रदूषण कम कर सकते हैं बल्कि इससे गांवों व शहरों के प्रदूषण मुक्त होने से हम विभिन्न संक्रामक रोगों से भी मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे।

आजादी के 67 वर्ष बाद भी देशवासियों को शौचालयों की बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं हो सकी। यहां तक कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा संचालित अधिकांश शिक्षा संस्थानों और अस्पतालों तक में शौचालयों और स्वच्छ पेयजल की संतोषजनक व्यवस्था नहीं है।

अत: यह प्रश्र उठना स्वाभाविक ही है कि जब समय-समय पर आने वाली सरकारें नागरिकों को शौचालयों तक की बुनियादी सुविधा प्रदान नहीं कर सकीं तो अन्य सुविधाओं का क्या हाल होगा!

Posted By : Crime Review
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