जिन्ना की तस्वीर लगाने से ए.एम.यू. ‘राष्ट्रविरोधी’ कैसे हो गई

प्रश्र : शैतानी भरे नवीनतम शब्द का नाम दीजिए जो देश का साम्प्रदायिक आधार पर बंटाधार कर सकता है?
उत्तर : मोहम्मद अली जिन्ना जोकि पाकिस्तान के संस्थापक थे और इसी कारण भारत के विभाजन के जिम्मेदार थे।

प्रश्र : क्या कारण है कि हमारे राजनीतिज्ञों को उनकी तस्वीर में नई तरह के रंग दिखाई देने लगे हैं और वे भारतीय मुस्लिमों के बारे में आशंकित हो उठते हैं?
उत्तर : वोट बैंक राजनीति। इस नीति के अंतर्गत हमारे राजनीतिक तंत्र को हर तरह की सैकुलर तथा साम्प्रदायिक गणनाओं में कई गुना अधिक उम्मीदें दिखाई देने लगती हैं। इसी कारण वे हर छवि में अपनी मनमर्जी के रंग भरते हैं और भारतीय मुस्लिमों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। इसकी चिंता कौन करता है कि इस प्रक्रिया में वे हर किसी को न केवल घटिया रंगों में दिखाते हैं बल्कि यह काम कई-कई बार करते हैं। वे बहुत आसानी से भूल जाते हैं कि जिन्ना भी कभी राष्ट्रवादी थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता हुआ करते थे।

जिन्ना के बारे में मौजूदा विवाद की जड़ें अलीगढ़ से भाजपा सांसद के उस पत्र में हैं जो उन्होंने विश्व विख्यात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (ए.एम.यू.) के कुलपति को गत सप्ताह लिखा था। उन्होंने यूनिवर्सिटी के स्टूडैंट्स यूनियन हाल में पाकिस्तान के संस्थापक कायदे आजम जिन्ना की तस्वीर लगी होने पर एतराज जताया था। हालांकि यह तस्वीर कई दशकों से वहां मौजूद है। भाजपा सांसद ने इसे हटाए जाने की मांग की है। ऐसा करके उन्होंने यह कहते हुए इस संस्था के राष्ट्रवाद पर सवाल उठाया है कि इस तस्वीर की मौजूदगी इस तथ्य का प्रमाण है कि ए.एम.यू. राष्ट्रविरोधी तत्वों को संरक्षण देती है। इससे पूर्व हिंदू युवा वाहिनी ने यूनिवर्सिटी परिसर में संघ की शाखाएं लगाए जाने की मांग की थी और यूनिवर्सिटी पर आरोप लगाया था कि यह जेहादी पैदा करती है।

विवाद को और भी हवा देते हुए यू.पी. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया: ‘‘जिन्ना ने देश के टुकड़े करवाए थे इसलिए भारत में उनके यशोगान का सवाल ही पैदा नहीं होता। उसकी फोटो शायद हमेशा के लिए उतारनी होगी।’’ केन्द्रीय मंत्री नकवी ने उन्हीं के स्वर में कहा: ‘‘यह मुद्दा संवेदनशील पहुंच अपनाकर हल किया जाएगा।’’ इसकी प्रतिक्रिया में कांग्रेस ने कहा कि पाकिस्तान के कायदे आजम एक स्वतंत्रता सेनानी थे और हमें उन्हें उसी तरह सम्मान देना चाहिए जैसे पाकिस्तान में शहीद भगत सिंह को सम्मान मिलता है। राकांपा प्रमुख शरद पवार ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडऩवीस को ललकारते हुए कहा कि उनमें हिम्मत है तो उस जिन्ना हाऊस को गिराकर दिखाएं जहां कभी पाकिस्तान के संस्थापक का आवास हुआ करता था।

सवाल पैदा होता है कि 1875 में स्थापित हुई यूनिवर्सिटी को अपने ही इतिहास को विकृत करने और इससे इंकारी होने के लिए मजबूर क्यों किया जा रहा है? अपने अतीत की निशानी मात्र के तौर पर जिन्ना की तस्वीर लगाने से ए.एम.यू. ‘राष्ट्रविरोधी’ कैसे बन सकती है? क्या यह सब कुछ संघ परिवार की ऐतिहासिक तथ्यों को प्रभावी ढंग से मलियामेट करने और उनके स्थान पर अपना एजैंडा आगे बढ़ाने की कार्यशैली का हिस्सा है? क्योंकि ए.एम.यू. एक केन्द्रीय यूनिवर्सिटी है इसलिए मानव संसाधन मंत्रालय ने अब तक इस तस्वीर को उतरवाया क्यों नहीं था?

क्या राजग हमें यह बताने का प्रयास कर रहा है कि यूनिवर्सिटी में एक तस्वीर लगाना राष्ट्रविरोधी होने का कारण बन सकता है? क्या वह वर्षों पुरानी सम्प्रादायिक भावनाओं को फिर से भड़काकर हिंदुत्व की नीतियों को बल प्रदान करने का प्रयास कर रहा है? क्या इस प्रयास से उसे अधिक वोट मिल सकते हैं? क्या ऐसी मानसिकता ही किसी की देशभक्ति का प्रमाण पत्र है? क्या हमें राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की शिक्षा देने का संघ का यही तरीका है? नि:संदेह कोई भी व्यक्ति यह दलील दे सकता है कि यूनिवर्सिटियां और अन्य शैक्षणिक संस्थान विद्यार्थियोंं को शिक्षा और कौशल सिखाने तथा आगामी जीवन में अपने पसंसीदा क्षेत्र में समृद्धि के लिए वांछित ज्ञान उपलब्ध करवाने के लिए स्थापित किए गए हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि इन संस्थानों को बहुत अधिक सबसिडी मिलती है इसलिए यह मांग बिल्कुल तार्किक है कि छात्रों को विद्यार्जन और ज्ञानर्जन के प्रति समर्पित होना चाहिए, उन्हें साम्प्रदायिक घृणा तथा विद्वेष की चिंगारियां नहीं भड़कानी चाहिएं और उत्पात नहीं मचाना चाहिए।

ऐसा आभास होता है कि शिक्षण संस्थानों को या तो कुछ संगठनों के राष्ट्रवादी इतिहास के नुस्खों का अनुसरण करना होगा नहीं तो उन्हें कीमत अदा करनी होगी। आज लोग यह भूल गए हैं कि जिन्ना की यह तस्वीर भारत-पाक के दो टुकड़े किए जाने से भी पहले यूनिवर्सिटी में लगाई गई थी। क्या इस अतीत को मिटाना किसी तरह से प्रगति का सूचक हो सकता है? एक इतिहासकार का कहना है : ‘‘ए.एम.यू. कोई ऐतिहासक कलावस्तु नहीं बल्कि ऐन शाब्दिक अर्थों में अलीगढ़ आंदोलन’’ की सफलता की साकार प्रतिमा है। भारत की अधिकतर कलावस्तुओं की तरह यह यूनिवर्सिटी भी हमें बताती है कि भारत राष्ट्र की परिकल्पना ने अपनी समस्त जटिलताओं तथा विरोधाभासों को संजोए रखते हुए कितना लम्बा सफर तय किया है। भूतकाल किसी कमीने पड़ोसी जैसा नहीं होता जिससे आप जब चाहे ‘कट्टी’ कर लें।

एक अन्य स्तर पर हिंदुत्व ब्रिगेड का यह खेल निश्चय ही जिन्ना की तस्वीर के बहाने ए.एम.यू. को बदनाम करने की साजिश है ताकि संघ परिवार से बहुत अधिक वैचारिक दूरी रखने वाले इस यूनिवर्सिटी परिसर में युद्ध की लकीरें खींची जा सकें और फलस्वरूप भारतीय मुस्लिमों को शैतानी रूप में पेश करते हुए न केवल उन्हें विघटनकारी तत्वों के रूप में प्रस्तुत किया जाए बल्कि बहुसंख्यवाद को भड़काते हुए यह प्रचार किया जाए कि उनकी हमदर्दियां और वफादारियां आज भी पाकिस्तान के साथ हैं।

इस प्रकार कैराना लोकसभा उपचुनाव तथा विभिन्न राज्यों के चुनावों से पहले-पहले साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल खेलकर चुनावी लाभ के लिए मजबूत आधार तैयार करने का प्रयास हो रहा है और इस प्रयास को अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव तक जारी रखा जाएगा। ऐसे लोगों को इस ऐतिहासिक तथ्य से कुछ लेना-देना नहीं कि विभिन्न प्रख्यात हस्तियों को आजीवन मानक सदस्यता प्रदान करना यूनिवर्सिटी की लम्बे समय से परम्परा चली आ रही है। सबसे पहले इस यूनिवर्सिटी ने गांधी जी को और उसके बाद 1938 में जिन्ना को सम्मानित किया था। यह सम्मान हासिल करने वाले अन्य व्यक्तियों में बाबा साहब अम्बेदकर, डा. राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सर सी.वी. रमण, जय प्रकाश नारायण, मदर टैरेसा आदि शामिल हैं।

खेद की बात है कि भारत के विभाजन और लाखों हिंदुओं व मुस्लिमों की मौत के लिए जिन्ना को एकमात्र खलनायक के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास को विकृत करने के तुल्य है। इसे गलत समझिए या सही ऐसा आभास हो रहा है कि देश स्वयंभू अंधराष्ट्रवादियों तथा सांस्कृतिक कठमुल्लावाद की जकड़ में है जिसके चलते सैलेब्रिटी हस्तियां और फिल्में ही नहीं बल्कि विद्यार्थी भी बहुत तेजी से हमलों का लक्ष्य बनते जा रहे हैं। ऐसे में कोई लेखक, चिंतक, इतिहासकार या सामाजिक एक्टिविस्ट ईमानदारी तथा वस्तुपरक ढंग से शोधकार्य नहीं कर सकता।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA
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