इस देश में कौन सुरक्षित है.....अपना नाम बताये

सत्ता की चौखट से निकलते सालाना पांच लाख अपराध

पंजाब के तरनतारन में सड़क पर सरेआम पुलिस जसलीन कौर को डंडे से मारती है। थप्पड़ बरसाती है। जसलीन कौर को जमकर मारने से पहले जसलीन के पिता को मार कर अधमरा करती है। यूपी के कुंडा में डिप्टी एसपी को चंद नेता टाइप गुंडे सरेआम सरिया, डंडे से पीटते हैं। अपने ही बॉस को पिटता देखकर तमाम वर्दीधारी वहां से खिसक जाते हैं और उसके बाद सरेआम डिप्टी एसपी को गोली मार दी जाती है। महाराष्ट्र के सतारा में मेडिकल में प्रवेश के लिये उत्तर भारत से पहुंचे छात्रों को राजठाकरे के गुर्गे कुछ इस तरह मारते-पिटते हुये पूछताछ करते हैं, जैसे छात्र किसी दूसरे देश में बिना वीजा पहुंच गये हों। शिवपुरी में एक बच्चे के गायब होने पर मां-बाप को पुलिस हर दिलासा देती है कि सिंधिया खानदान के प्रभाव वाले इलाके में बच्चे का अपहरण हो नहीं सकता। तो एफआईआर भी दर्ज नहीं होती है। लेकिन 24 घंटे बाद ही बच्चे का शव शहर में मिलता है तो लोगो के आक्रोश को थामने वाला कोई नहीं होता। ना नेता ना पुलिसकर्मी।

सवाल है भरोसा हो किस पर। या फिर किसी भी आम आदमी को यह कैसे महसूस हो कि देश में कानून का राज है। या फिर जिन नेताओं को उसने चुना है और जो सरकार बनाकर सत्ता चला रहे हैं, उनकी फिक्र भी कोई करता है। सत्ता को फिक्र जब सत्ता की ही रहेगी तो सत्ता तक पहुंचने वाले हथकंडे ही लोकतंत्र के स्तम्भ हो जायेंगे । और बाकी सब बकवास होगा। सच की यह त्रासदी कितनी क्रूर है, जरा इन्हीं घटनाओं के जरीये परख लें। कुंडा में यादव और पाल आपस में हमेशा आमने सामने खड़े रहे हैं। सरकार मुलायम सिंह यादव की है तो यादवो की सत्ता में पाल कैसे सेंध लगा सकता है। इन दोनो के बीच खड़े हैं राजा भैया। और राजा भैया निर्दलीय विधायक होकर भी मुलायम के कितने खास हैं, यह बहुमत पाने वाली समाजवादी सरकार में मंत्री बने राजा भैया से समझा जा सकता है। तो जमीन के झगडे में जब एक यादव की जान गई तो पाल इलाके के घरों को फूंकना भी यादवों ने शुरु किया। डिप्टी एसपी जियाउल हक सत्ता के इस जातीय खेल को ही नहीं समझ सके। इसलिये वह यादवों के निशाने पर आये। पाल इलाके में शांति बनाने पहले पहुंचे और फिर जब यादव के घर पहुंचे तो वहां वह यादवों के ही निशाने पर आ गये। और डिप्टी एसपी पर भीड़ ने आरोप लगाया कि वह पाल समुदाय के जलते घरों की आग बुझाकर यादवो के घाव पर मरहम लगाने पहुंचे हैं। उसके बाद सत्ता के स्तम्भ कैसे बेखौफ होकर कानून की धज्जियां उड़ाते हैं,यह सच और किसी ने नहीं बल्कि डिप्टी एसपी की पत्नी परवीन आजम ने अपनी शिकायत में लिखकर दी।

वहीं दूसरी तरफ पंजाब के तरनतारन का सच तो और खौफनाक है। तरनतारन के नेशनल हाइवे पर ट्रक डाइवरों की ही चलती है। और ट्रक ड्राइवरों की सुरक्षा में और कोई नहीं बल्कि खाकी वर्दी ही तैनात रहती है। क्योंकि हाइवे पर तैनात पुलिसकर्मियों को जितना सरकार वेतन के तौर पर देती है, उससे कई गुना ज्यादा ट्रक ड्राइवरो से मिलता है। तो 4 मार्च को भी वही हुआ। पिता के साथ शादी में जा रही जसलीन को हाइवे पर तैनात पुलिसकर्मियों के सामने ट्रक ड्राइवरो ने छेड़ा। जसलीन ने पुलिस वालों से इसकी शिकायत की। पुलिस वालों ने ट्रक ड्राइवरों से पूछा। ट्रक ड्राइवरों ने पुलिस वालो के हाथ गरम किये और उसक बाद तो झटके में जसलीन और उसके पिता पुलिस के निशाने पर आ गये। पुलिस ने जी भर कर पिता को मारा। जसलीन की पिटाई की। गाली-गलौच करते हुये जसलीन के साथ बलात्कार करने तक की धमकी और किसी ने नहीं पुलिस ने दे दी। जसलीन को समझ नहीं आया वह क्या करे। शिकायत किससे करें। पुलिस ने जसलीन पर ही आरोप जड़े तो उसे कौन नहीं मानेगा। लेकिन इस घटना को कैमरे ने कैद किया तो वहशी पुलिस का खेल सभी को समझ में आया।

वहीं महाराष्ट्र के सतारा में सत्ता का खेल तो और ज्यादा खतरनाक है। मेडिकल में प्रवेश के लिये बिहार यूपी से गये छात्रों को राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस के कार्यकर्ताओ ने कुछ इस तरह पूछताछ शुरु की जैसे उत्तर भारत के छात्र बिना विजा की दूसरे देश में पहुंच गये हैं। किसी को थप्पड, किसी को लप्पड । किसी के बाल पकड़े। किसी के पीठ पर घूंसा धर दिया। उसके बाद घर का पता पूछा। पढाई-लिखाई के सारे कागजात देखे। अव्वल नंबर देख कर गालियां दीं। फर्जी तरीके से नंबर पाने और सर्टिफिकेट बनाने का आरोप जड़ दिया। छात्रों ने जब शिकायत कॉलेज प्रबंधन से की तो उसने हाथ खड़े कर दिये। जब पुलिस से शिकायत की तो पुलिस बोली आप अपने राज्य में क्यों नहीं रहते। यहां तो राज-ठाकरे की दादागिरी चलती है। क्या आप जानते नहीं हैं। पुलिस ने कोई एफआईआर दर्ज करने से भी हाथ खड़े कर दिये। छात्रों के सामने सवाल उठा कि देश में कानून का राज है कि नहीं। संविधान तक की महत्ता बची है कि नहीं । यह सवाल उन्हीं छात्रों ने सतारा पुलिस के सामने उठाये। लेकिन कोई एफआईआर किसी के खिलाफ दर्ज नहीं हुई।

और देश के राष्ट्रीय प्रतीक चार मुंह वाले शेर की तरह चौथा सच मध्यप्रदेश के शिवपुरी से निकला। जहां बच्चे का अपहरण होता है। हत्या होती है। लेकिन पुलिस सिंधिया खानदान के इलाके में सुरक्षित आम आदमी को सुरक्षित बताने के लिये एफआईआर दर्ज नहीं करती। और राज्य की सियासत में संकेत यही दिया जाता है कि सिंधिया घराने के प्रभावित इलाके में रामराज्य है जबकि राज्य में दूसरी जगहों पर कानून व्यवस्था के ऊपर अपराधी हावी हैं। फिर ग्वालियर और शिवपुरी के इलाके में तैनात खाकी वर्दी राज्य में सत्ता किसी की रहे खुद को सिंधिया खानदान से ही जुड़ा मानती है।

तो शनिवार से सोमवार यानी 2 से 4 मार्च के बीच 48 घंटों के यह चार सच ऐसे चार राज्यों की कहानी कहते हैं, जहां राष्ट्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस और बीजेपी की भी सरकार है और क्षत्रपों के तौर पर राष्ट्रीय दलों को चेताते समाजवादी पार्टी से लेकर अकाली और एनसीपी की भी सरकारे हैं। यानी दोष अकेले किसी सरकार के मत्थे नहीं मढ़ा जा सकता है। यहां सवाल सिस्टम है, उस व्यवस्था का है, जिसके आसरे हर राजनीतिक दल को यह लगने लगा है कि उसकी मौजूदगी तभी होगी जब वह सत्ता में होगी और सत्ता में तभी होगी जब हर घेरे के सत्ताधारियों के सामने कानून बिलबिलाता हुआ सा नजर आये। अपने घेरे में पुलिस भी सत्ताधारी है। और राजनेता से टकराने पर पुलिस भी प्यादा है। राजनेता की दादागीरी ही सत्ता भी है और कानून को दरकिनार कर राजनेताओं के लिये व्यवस्था बनना भी सत्ता की नयी व्यवस्था है। जाहिर है मौजूदा वक्त में पहली बार देश के सामने यह संकट कि उसकी जरुरतों के साथ सत्ता के कोई सरोकार नहीं है और सत्ता के सरोकार जिन स्तितियो से हैं, उसमें सबसे पहले कमजोर तबका ही कुचला जाता है। यानी जिस मौके पर जो सबसे ताकतवर है कानून उसी की परिभाषा में गुम हो जाता है। तो क्या मौजूदा वक्त में सिस्टम ही जंगल राज के दौर में खड़ा हुआ है। अगर बारीकी से व्यवस्था के खाके को परखे तो कई सवाल एक साथ खड़े हो सकते हैं। मसलन जिसके साथ पुलिस है उसी की चलेगी। जिसके पास पैसा है उसी की चलती है। जो सरकार में है आखिर में चलती उसी की है। जो नेता है उसकी सफलता ही ऐसे अपराध को मान्यता देने से जा जुड़ी है, जहां छोटे अपराधियों को यह भरोसा हो जाये कि नेता उनसे बड़ा अपराधी है या फिर आम आदमी यह मान ले अपराधियो से निपटने के लिये पाक साफ सत्ता नहीं दागदार सत्ताधारी ही असल समाधान कर सकता है। जाहिर है इन परिस्थितियों में कोई भी मुद्दा किसी सत्ता से सरोकार की भाषा की उम्मीद कैसे कर सकता है। ध्यान दें तो अपराध हो या भ्रष्टाचार या कालाधन हो या महंगाई सत्ता का रुख कभी सीधे इन पर निशाना नहीं साधता। जो विरोध में होते हैं। जो विपक्षी राजनीतिक दल की भूमिका में होते हैं, वह अपने सियासी सरोकार को जरुर जोड़ते हैं। लेकिन बीते 48 घंटे की चार घटनायें बताती है कि सत्ता की परिभाषा जब हर जगह एक है तो फिर सवाल सत्ता के सिस्टम का हो चुका है। जिसे बनाये रखने पर या सत्ता में आने की सहमति सभी बनाकर ही देश को भारत नाम दिये हुये हैं। क्योंकि बीते एक बरस के दौरान देश के सरकारी आंकडे बताते हैं कि भारत में जनवरी 2012 से जनवरी 2013 तक साठ हजार हत्या के मामले थानो में दर्ज हुये। 36 हजार 984 मामले बलात्कार के दर्ज हुये। दो लाख 35 हजार लूट और डकैती के मामले थानो में दर्ज हुये। और कुल 5 लाख से ज्यादा आपराधिक मामले थानो में दर्ज हुये। हालांकि सरकार ने यह सच छुपा कर रखा है कि इन पांच लाख आपराधिक मामलों में कितने मामले हैं, जो सत्ताधारियों के चौखट से निकले।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA (Editor in Chief)
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