पाकिस्तान से ‘सरकारी प्रेम’ का अर्थ क्या है

अचानक रात साढ़े दस बजे उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सुदूरवर्ती सीमा गांव असगोली से फोन आया और उधर से कहा गया ‘‘मैं लक्ष्मण सिंह अधिकारी बोल रहा हूं। मेरा भाई जैपाल सिंह अधिकारी भारतीय सैनिक था जो कश्मीर में शहीद हुआ। पाकिस्तानियों ने उसका सिर कटा शव भेजा था। हम अपने भाई की इस बर्बर और दुखद मृत्यु पर हर दिन शोक मनाते हैं पर गौरव भी करते हैं कि वह देश के लिए शहीद हुआ। आज 5 सैनिकों की शहादत की फिर खबर मिली तो मेरे गुस्से का पारावार नहीं रहा। कृपया रक्षा मंत्री से इजाजत दिलवाइए। मैं खुद सरहद पर जाकर पाकिस्तानियों से बदला लेना चाहता हूं। मेरे भाई के साथ जो बर्बरता हुई उसका प्रतिशोध सरकार नहीं लेगी। आप भी संसद में क्या कर रहे हैं?’’ और यह कह कर लक्ष्मण सिंह अधिकारी रोने लगे। क्या देश शहीदों का सम्मान करना जानता है? जब राज्यसभा में यह मुद्दा उठाते हैं तो क्या होता है?

जो आज तक कभी नहीं हुआ वह राज्यसभा में घटित होते देखा गया तो सब स्तब्ध और आश्चर्यचकित रह गए। रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने अपने ही मंत्रालय के बयान को काटते हुए लगभग पाकिस्तान के पक्ष में जो बयान दिया था, उसके विरोध में भाजपा के सांसद चाहते थे कि एंटनी स्पष्टीकरण दें। जब ऐसा होते नहीं देखा गया तो 5 भारतीय सैनिकों की शहादत से क्षुब्ध सांसदों ने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए तथा अपना आक्रोश व्यक्त किया।

हालांकि बाद में एंटनी ने अपने इस बयान में सुधार कर दिया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम था कि देश के 5 बेटे सरहद की रक्षा करते हुए शहीद हो गए और सरकार को घटनाक्रम की पूरी जानकारी नहीं थी या वह पाकिस्तान के बचाव में मूर्खतापूर्ण ऐसा बयान दे रही थी जिसका न तो सिर था न पैर और जो अंतत: भारतीय सैनिकों की शहादत का मजाक करने वाला ही सिद्ध हो रहा था। क्या इस पर हम चुप रहते? ऐसी विद्रूपता पर खामोशी ओढ़ते हुए सरकार का साथ देने वाला विपक्ष अभी भारत में तो है नहीं।

इस विरोध का नतीजा क्या निकला? नतीजा यह निकला कि 8 अगस्त को जब भाजपा सांसद सदन में आए तो देखा कि राज्यसभा की संसदीय बुलेटिन के पहले पेज पर अनुशासन तोडऩे के आरोप में उनके 20 नामों का उल्लेख किया गया है। ऐसा पहले कब हुआ था? पिछले 2 दिनों में ही वरिष्ठ कांग्रेसी सदस्य सदन में कठोर एवं अपशब्द बोलते हुए देखे गए पर उनके बारे में कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे पहले लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करते समय आर.जे.डी. के एक सांसद महोदय ने मंत्री जी के हाथ से विधेयक की प्रति छीन कर फाड़ दी और वहीं सदन में धरने पर बैठ गए। तब भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

केवल भाजपा सांसदों को उनके पाकिस्तान विरोध तथा सैनिकों के समर्थन में आक्रोश व्यक्त करने के तथाकथित ‘‘अपराध’’ में उनका इस प्रकार नामोल्लेख करना ऐसा लगा मानो कांग्रेस की राजनीति हमारे सदन पर भी हावी हो गई है। नतीजतन अरुण जेतली के नेतृत्व में सभी भाजपा सांसदों ने सदन से बहिर्गमन किया और अंतत: दोपहर बाद बुलेटिन से नामोल्लेख वापस लेने का वायदा लेकर आए कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला के आग्रह पर भाजपा सांसद सदन में गए।

यह समझ में नहीं आता कि कांग्रेस के रक्षा मंत्री ने पहले अपने ही मंत्रालय के स्पष्ट एवं रक्षा अधिकारियों द्वारा अनुमोदित वक्तव्य को क्यों निरस्त किया और उसके बाद ऐसा बयान क्यों दिया जिसमें पाकिस्तान का बचाव होता था और अर्थहीन ढंग से यह कहा गया कि जिन आतंकवादियों ने भारतीय सैनिकों पर हमला किया वे पाकिस्तान की वर्दी पहने हुए थे? ये जानकारी किसने और कहां से प्राप्त की? जो भारतीय सैनिक शहीद हुए वे नियंत्रण रेखा पर थे या उससे दूर थे? यह भी रक्षा मंत्री स्पष्ट रूप से नहीं बता पाए। सांसदों के तीव्र विरोध के कारण अगले दिन एंटनी ने पुन: बयान दिया जो वस्तुत: वही बयान था जो जम्मू से रक्षा मंत्रालय ने 7 अगस्त दोपहर में जारी किया था और जिसे एंटनी ने निरस्त करते हुए पाकिस्तान के बचाव वाला बयान दिया था।

अगर पहला बयान गलत था तो फिर 8 अगस्त को एंटनी ने अपना दूसरा बयान क्यों दिया? ऐसी स्थिति में भारत की पाकिस्तान में क्या छवि जाती है और भारतीय सैनिकों के मनोबल पर इसका कैसा असर पड़ता है, इसका अंदाजा कोई लगा सकता है क्या? यही कारण है कि भारत में एक कमजोर दब्बू और रीढ़हीन सरकार का संदेश दुनिया में जाता है। अगले महीने नवाज शरीफ से होने वाली सैन्य मुलाकात के लिए हम किस प्रकार सैनिकों के सम्मान और देश के अभिमान को चोट पहुंचा सकते हैं, यह घटनाक्रम इसका प्रमाण है। जरा देखिए जब रूस ने अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार द्वारा लाखों लोगों की जासूसी तथा इंटरनैट तथा ई-मेल पर की गैरकानूनी गुप्तचरी का भंडाफोड़ करने वाले स्नोडेन को अपने यहां शरण दी तो ओबामा ने पुतिन से मिलने से ही इंकार कर दिया और यात्रा रद्द कर दी लेकिन लगातार भारतीय सैनिकों के सिर कटे धड़ भेजने वाले बर्बर और दरिंदे पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए हम अपने सैनिकों की हत्या का अपमान भी भूलने लग जाते हैं।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA (Editor in Chief)
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