भारतीय जवान, एलओसी, पांच हत्याएं, एक्सप्रैस ट्रिब्यून, नियंत्रण रेखा, लश्कर ए तोयबा, आईएसआई, जैश ए मोहम्मद

नियंत्रण रेखा पर 5 भारतीय जवानों की हत्या की जितनी भी निंदा की जाए, कम है। यह अक्षम्य भी है। इस बारे में कोई विवाद नहीं। फिर भी विपक्ष और मीडिया के कुछ वर्गों को बिना सोचे-समझे इस पर वावेला खड़ा करने की अनुमति देने से पूर्व हमें 2 सवालों के जवाब देने चाहिए थे। खेद की बात है कि किसी ने ये दोनों सवाल पूछे ही नहीं।

पहला सवाल एकदम सीधा है। क्या हत्याएं पूर्णत: अनायास थीं या एल.ओ.सी. पर लंबे समय से जारी घटनाक्रम का हिस्सा थीं? हमारी प्रतिक्रिया तो ऐसी थी जैसे ये पांचों हत्याएं व्याख्या से परे और अप्रासंगिक हैं लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं।

ये हत्याएं 6 अगस्त को बड़े तड़के हुईं। इससे एक सप्ताह पूर्व 28 जुलाई को पाकिस्तानी समाचार पत्र एक्सप्रैस ट्रिब्यून और हमारे अपने ‘फस्र्ट पोस्ट डॉट कॉम’ ने दावा किया था कि नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना ने 5 पाकिस्तानी ग्रामीणों का अपहरण कर लिया था जिन्हें रहस्यमय ढंग से बाद में मृत पाया गया। इससे एक सप्ताह पूर्व पाकिस्तानी सरकार ने दावा किया था कि इसका एक जवान आसिम इकबाल भारतीय सैनिकों द्वारा गोलीबारी में मारा गया जबकि उसका एक साथी गंभीर रूप में घायल हो गया।

मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि यह भयावह घटनाक्रम न केवल सप्ताहों या महीनों बल्कि शाब्दिक अर्थों में वर्षों तक पीछे जाता है। शायद कई दशकों तक। यह आगे भी जारी है। पाकिस्तान ने दावा किया है कि 6 अगस्त के बाद भी इसके 2 जवानों को गंभीर रूप में घायल किया गया। जवाबी गोलीबारी में उन्होंने भी कम से कम हमारे एक जवान को घायल कर दिया।

इसलिए पहला सबक हमें यह सीखना चाहिए था कि नियंत्रण रेखा पर भयावह घटनाएं होती रहती हैं और दोनों देश इसके दोषी भी हैं और शिकार भी। वैसे तो हर मौके पर बेकसूर जवान ही मारे जाते हैं जिनकी मौत अक्षम्य है। फिर भी हम पाकिस्तानियों को बेतरस हत्यारों की संज्ञा देकर खुद को नैतिक तौर पर ऊंचे सिद्ध नहीं कर सकते।

दूसरा सवाल कुछ टेढ़ा-मेढ़ा था लेकिन यह स्पष्ट तौर पर पूछा जाना चाहिए था। क्या हत्या का यह प्रयास दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच बैठक और प्रस्तावित वार्तालाप को साबोताज करने के लिए किया गया?

पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान में नवाज शरीफ के विशेष दूत शहरयार खान को इस बारे में तनिक भी संदेह नहीं और वह कहते हैं, ‘‘हमारे उग्रवादियों ने ही यह काम किया है और इसका मकसद शांतिवार्ता को पटरी से उतारना है।’’ यही एकमात्र टिप्पणी थी जो उन्होंने वापस नहीं ली।

स्पष्ट तौर पर लश्कर-ए-तोयबा और जैश-ए-मोहम्मद की ओर ही उंगली उठती है लेकिन केवल यही दोनों अपराधी नहीं हैं। संदेह की उंगली पाकिस्तानी सेना के कुछ तत्वों और आई.एस.आई. की ओर भी उठाई जा सकती है।

मई और जून में जब नवाज शरीफ ने भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना शुरू किया तो ऐसे व्यापक समाचार थे कि जनरल कियानी ने उन्हें ऐसा करने के विरुद्ध आगाह किया था। इसलिए तत्पश्चात नियंत्रण रेखा पर आक्रामक गतिविधियों में हुई बढ़ौतरी क्या मात्र एक संयोग है? या पाकिस्तानी सेना द्वारा नए प्रधानमंत्री को असफल करने का कुप्रयास?

कुछ लोगों के लिए यह अटकलबाजियों की चरम सीमा है लेकिन सलमान खुर्शीद के लिए नहीं। वह तो कहते हैं, ‘‘यह एक खुशफहमी भरा सिद्धांत है।’’ इसलिए एंटनी क्या तब सही थे जब उन्होंने अपना पहला बयान दिया कि पाकिस्तानी सेना की वर्दियों में 20 आतंकियों ने इन हत्याओं को अंजाम दिया है? शायद वह सही थे। उनकी गलती केवल यह थी कि वह केवल यहीं पर रुक गए जिससे यह प्रभाव पैदा हुआ कि वह पाकिस्तानी हकूमत को दोषमुक्त कर रहे हैं। यदि उन्होंने अपने दूसरे बयान के शब्द भी इसमें जोड़े होते तो कोई भी उनसे असहमत न होता, ‘‘हम जानते हैं कि नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की ओर से वहां की सेना की जानकारी, समर्थन और सहायता और अक्सर सीधी संलिप्तता के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।’’

ए.के. एंटनी अपने बयान की संक्षिप्तता पर अवश्य ही पछता रहे होंगे। इस बयान से हमारा गुस्सा भड़क उठा। लेकिन हमें उन सवालों पर गौर करना चाहिए जो हम पूछने में असफल रहे। इन सवालों का उत्तर मिल जाने से जहां हमारा गुस्सा नियंत्रण में रहता, वहीं हमारी प्रतिक्रिया भी अधिक परिपक्व होती।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA (Editor in Chief)
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