राजनीति में अपराधीकरण देश के लिए सबसे बड़ा संकट

पिछले 65 वर्षों में भारत इतने अधिक संकट से कभी नहीं घिरा था जितना आज प्रतिदिन घिरता जा रहा है। संकट बाहर के कम, अन्दर के, अपनों के और अपने ही नेताओं द्वारा पैदा किए गए अधिक हैं। देश को राजनीति ने चलाना है और पूरी राजनीति भ्रष्टाचार के शिकंजे में सिसक रही है। सच तो यह है कि बाड़ ही खेत को खा रही है। भ्रष्टाचार और अपराधीकरण से पूरा तंत्र नष्ट हो रहा है। ऐसे मौके पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बहुत बढिय़ा निर्णय दिया कि 2 वर्ष से अधिक की सजा प्राप्त करने वाले विधायक और सांसद अपने पद पर नहीं रह सकेंगे। इस निर्णय से लोकतंत्र को साफ करने की एक दिशा मिली थी परन्तु भारत सरकार ने अध्यादेश जारी करके इस निर्णय को रद्द करने की भयंकर भूल की है।

राजनीतिक दलों को वोट चाहिए तभी सत्ता प्राप्त हो सकती है परन्तु वोटों के लिए देश को ही दाव पर नहीं लगाया जा सकता। आज देश की राजनीति केवल वोट के लिए ही काम कर रही है। देश का हित किसी को दिखाई नहीं दे रहा। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद की स्थिति पर राजनीतिक दलों में हलचल हुई थी। बिल संसद में आया था और संसद ने उस पर विस्तृत विचार करने के लिए उसे स्थायी समिति को भेज दिया था। सरकार ने समिति की रिपोर्ट का भी इंतजार नहीं किया। एकदम जल्दबाजी में अध्यादेश जारी कर दिया। कारण स्पष्ट है कि लोकसभा के चुनाव सामने हैं। कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा। उसे जिन दलों का सहयोग चाहिए उनमें अपराधी भरे पड़े हैं। उन्हीं के दबाव में यह अध्यादेश जारी किया गया है।

राज्य सभा के कांग्रेस सांसद रसीद मसूद जब मंत्री थे तो एम.बी.बी.एस. के प्रवेश में धांधली हुई। उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया। सजा मिल रही है। 10 हजार करोड़ रुपए के चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव फंसते जा रहे हैं। मैं इस बात के लिए सी.बी.आई. को बधाई दूंगा कि चारा घोटाले में आज तक लगभग 100 से अधिक अधिकारियों और नेताओं को सजा मिल चुकी है। अब लालू प्रसाद यादव की बारी है। ऐसे लोगों के लिए केन्द्र की सरकार जिस बेशर्मी के साथ यह अध्यादेश लाई है उसके लिए इतिहास इसे हमेशा कोसता रहेगा। पिछले 10 वर्षों में 2 साल से अधिक सजा प्राप्त करने वाले लगभग 10 अपराधी नेताओं के लिए 130 करोड़ लोगों के देश के लोकतंत्र को अपमानित करने की कोशिश अत्यंत निंदनीय है।

मुजफ्फरनगर दंगों में 50 निर्दोष मारे गए। उन घरों में हमेशा के लिए अंधेरा हो गया। लगभग 50,000 लोग अपने घरों को छोड़ कर टैंटों के नीचे सहमे-सहमे दिन व्यतीत कर रहे हैं। इतने आतंकित हैं कि अपने घरों को नहीं जा रहे। यह सब अपराधी नेताओं के कारण हुआ। दंगे हुए नहीं, वोट के लिए दंगे करवाए गए।

पूरे देश में कई प्रकार के माफिया उभर रहे हैं। कहीं रेत, कहीं बजरी माफिया। कई जगह सरकार नपुंसक होती जा रही है। इन माफिया का ही शासन दिख रहा है। नेताओं को चुनाव में पैसा चाहिए। पैसा इनसे मिलता है। गैर-कानूनी धंधों से माफिया इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि उनके आगे स्थानीय सरकार बौनी नजर आने लगी है। अवैध खनन से प्रकृति को इतना छलनी किया जा रहा है कि उत्तराखंड की दुर्घटना कभी भी, कहीं भी घट सकती है। कहीं-कहीं लोकतंत्र माफिया तंत्र बनता जा रहा है।

जिस जल्दबाजी में यह अध्यादेश लाया गया है, उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही है। चुनाव के बाद फिर से सरकार बनाने के लिए नैतिकता को पूरी तरह से एक तरफ रख कर निर्लज्जता के साथ सब कुछ करने को तैयार है। देश को सोचना चाहिए कि सरकार अपराधियों के हाथ में देनी चाहिए या उनको अलग किया जाना चाहिए।

सूचना के अधिकार के दायरे में राजनीतिक दलों को लाने का मैं समर्थन करता हूं। राजनीतिक दल सब जगह पारदर्शिता चाहते हैं परन्तु स्वयं सब कुछ छिपा कर रखना चाहते हैं। राजनीति में काले धन के प्रयोग को रोकने की जरूरत है। पूरे चुनाव कानून में सुधार किया जाए। धन का प्रयोग कम हो। काले धन के प्रयोग पर सजा दी जाए। 10 करोड़ रुपए से अधिक कमाने वाली कम्पनियों पर विशेष कर लगाया जाए और वह धन राजनीतिक दलों को चुनाव लडऩे के लिए दिया जाए। जब तक राजनीति से कालेधन का प्रभाव समाप्त नहीं होता तब तक राजनीति साफ-सुथरी नहीं हो सकती। गोपीनाथ मुंडे से एक सच कहा गया कि उन्होंने चुनाव में 10 करोड़ खर्च किए हैं। एक कांग्रेस नेता ने कहा कि 100 करोड़ रुपए में राज्यसभा की सीट जीती जा सकती है। जो अन्दर की सच्चाई जानते हैं उन्हें पता है कि स्थिति प्रतिदिन खराब हो रही है।

यदि सूचना के अधिकार के दायरे में राजनीतिक दल आ जाएं तो उन्हें चुनाव में होने वाले खर्च का हिसाब देना पड़ेगा। आज सारा हिसाब काला है। इसी कारण उस निर्णय से सभी दल घबराए। उसे रद्द करने के लिए इकट्ठे हो गए पर वह इलाज नहीं है। नियम कानून बदलें और राजनीति को कालेधन से मुक्त करें।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA (Editor in Chief)
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