राहुल गांधी ने 72 घंटे की देर क्यों लगाई

अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को नेता बनने से रोकने के मामले ने जोर पकड़ लिया है। सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था और उसके बाद अध्यादेश और फिर उसके बाद राहुल गांधी ने जिस तरह से जनाकांक्षाओं के अनुकूल बयान दिया उससे पूरे देश में हलचल है। पिछले 2 दिन से मीडिया तो इस बयान को लेकर इतना उत्साहित है कि उसने एक ही सवाल को बार-बार दोहराने की झड़ी लगा दी है। मीडिया और विपक्ष के नेताओं का एक ही सवाल है कि राहुल गांधी 3 दिन से कहां थे और इसी से जुड़ा यह सवाल भी है कि जब कैबिनेट से इस अध्यादेश का मसौदा पास हो रहा था तब क्या राहुल गांधी को खबर नहीं मिली?

यानी राहुल गांधी पर आरोप है कि उन्होंने 72 घंटे की देर क्यों लगाई? फिलहाल हम राहुल गांधी को छोड़ कर पहले सुप्रीम कोर्ट बनाम अध्यादेश की बात करेंगे क्योंकि इससे कई सवालों के जवाब ढूंढने में मदद मिलेगी। संक्षेप में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताओं और भविष्य में दागी लोगों के राजनीति में आने पर पाबंदी के लिए बहुत ज्यादा आगे बढ़कर व्यवस्था कर दी थी। जब यह फैसला सुनाया गया तो इस पर देश भर में सामाजिक स्तर पर गंभीर सोच-विचार नहीं किया गया। फैसला तो दिखने में बहुत दमदार था पर इसके राजनीतिक दुरुपयोग की संभावनाओं को तलाशने और दूर करने का काम किया जाना चाहिए था जो नहीं किया गया। दरअसल हमारे यहां सर्वोच्च अदालत का आज भी इतना सम्मान है कि जनता उसके फैसलों को श्रद्धाभाव से ही स्वीकार करती है।

लेकिन यह एक ऐसा मामला था जिसका आगा-पीछा सोचने की बहुत ही ज्यादा जरूरत थी लेकिन इधर साल भर से नेताओं या पूरी राजनीतिक प्रणाली के इस तरह से धुर्रे उड़ाए जा रहे हैं कि जनता का नजरिया भी वैसा बनता जा रहा है। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट को भी खूब वाह-वाही मिली। ऐसा लगा कि अपराधियों को राजनीति में घुसने के सभी दरवाजे अब बंद हो जाएंगे। टी.वी. चैनलों पर विशेषज्ञों ने बढ़-चढ़कर इस फैसले का स्वागत किया। पूरे देश में फैसले के पक्ष में माहौल बन गया।

इस माहौल में इस मुद्दे पर फिर संसद में चर्चा हुई लेकिन लोकसभा में जो चर्चा हुई वह इतनी जल्दबाजी में हो गई कि जनमत बनाने का काम ही नहीं हो पाया जबकि अगर इस मुद्दे पर लंबी और खुली बहस होती और उसे दूरदर्शन पर देश देखता तो गंभीर राजनीतिज्ञों को अपने अंदेशे देशवासियों तक पहुंचाने में मदद मिलती पर जल्दी में निपटी बहस से यह संदेश चला गया कि सारे नेता व प्रमुख विपक्षी दलों के नेता भी अपराधियों को राजनीति में आने से रोकना नहीं चाहते। उसके बाद तो ऐसा माहौल बन गया कि देश के बहुसंख्यक जनप्रतिनिधि सुप्रीम कोर्ट के आदेश या व्यवस्था से सहमत नहीं हैं। इस तरह यह मामला कैबिनेट से एक अध्यादेश के मसौदे के रूप में मंजूर होकर राष्ट्रपति के पास पहुंच गया। राष्ट्रपति भवन को यह अध्यादेश फौरन ही मंजूरी लायक नहीं लगा तो उन्होंने प्रमुख दलों के नेताओं को बुलवाना शुरू कर दिया। यहीं से हलचल शुरू हो गई और इसी बीच राहुल गांधी का बयान आ गया।

अब हमारे सामने यह सवाल है कि इस मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों हो रही है? यह अलग बात है कि राहुल गांधी पर यह आरोप लग रहा है कि उन्होंने 72 घंटे की देर क्यों की? दरअसल इतने गंभीर मामले पर जिसे इस देश की राजनीति का पुश्तैनी रोग कहा जा सकता है, अगर केवल एक कानून बना देने से राजनीति के अपराधीकरण का कोई समाधान निकलना होता तो कब का निकल जाता।

अपराधियों से निपटने के लिए तो देश में आज भी तमाम कानून हैं पर उनसे कोई हल नहीं निकल पाया। इस मामले की जटिलता और बारीकी पर अगर गौर किया जाए तो हमें यह याद करना होगा कि हमारी न्याय प्रणाली की एक प्रतिस्थापना है कि ‘चाहे 100 अपराधी छूट जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सजा न हो’। यह उदारवादी प्रतिस्थापना ही दागी नेताओं पर रोक लगाने के मामले को जटिल बनाती है। हालांकि इस मुद्दे पर अकादमिक चर्चा नहीं हुई है इसीलिए जनता के दिमाग में यह मामला स्पष्ट नहीं हो पाया है। जब सब कुछ तथाकथित ‘जनाकांक्षाओं’ पर चलकर ही किया जाना है चाहे वे कितनी भी अव्यावहारिक क्यों न हों तो फिर देश में विद्वानों और विशेषज्ञों की बात को सुनने को राजी ही कौन है?

अब अगर इस नई व्यवस्था के भविष्य पर पूरी गंभीरता और अपने समाज की सच्चाई के आधार पर नजर डालें तो पूरा अंदेशा है कि भविष्य की राजनीति सिर्फ इस बात पर होगी कि अपने विरोधी दल के नेताओं पर आपराधिक मामले कैसे बनाए जाएं। हमारा अब तक का अनुभव बता रहा है कि आखिर में सत्य की जीत भले ही होती हो लेकिन सच को परेशान कर डालने के सारे मौके हमारी न्यायिक व्यवस्था में मौजूद हैं जिनका साधन सम्पन्न लोग आसानी से दुरुपयोग कर सकते हैं। राजनीतिक अपराधियों से निपटना भी तो अपराध शास्त्र का ही विषय है पर विडम्बना देखिए कि कानून बनाने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी लगभग शून्य है। जनप्रतिनिधियों और वकीलों के जरिए न्याय का सारा काम निपटाने से जो उथल-पुथल हो सकती है वह हमारे सामने है, यानी अभी भी हम तय नहीं कर पा रहे हैं कि प्रजातंत्र में ‘कथित जनाकांक्षाओं’ पर ही सब कुछ छोड़ दिया जाए या जन को निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिए कुछ विशेषज्ञों की भी मदद ली जाए।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA (Editor in Chief)
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