सरकारी मनमर्जी के कारण घोटाले बंद होना असंभव

हाल ही में जब अमरीका में सरकारी कामकाज ठप्प (शटडाऊन) हुआ था तो संसार में किसी को भी महसूस नहीं हुआ कि वहां सरकार का कामकाज असलियत में ठप्प है। अपितु वहां कामकाज पूरी तरह से चल रहा था। इसके विपरीत भारत में देखने को लग रहा है कि सरकारी कामकाज ठीक-ठाक चल रहा है परन्तु सत्य यह है कि सरकारी कामकाज एक प्रकार से स्थिर सा हो गया है। मानो देश रूपी शरीर के भीतरी अंग भ्रष्टाचार रूपी कैंसर जैसी बीमारी से पूरी तरह ग्रस्त हो चुके हैं। सियासी नेताओं पर लोगों का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। नौकरशाही भी पूरी तरह मनमानी करके लोगों पर अपना दबाव बढ़ाती जा रही है।

देश में घोटालों का सिलसिला लगातार चलता आ रहा है और कोयला घोटाला देश की अस्थिरता का मुख्य कारण बन सकता है। देश में पहली बार इस घोटाले में प्रधानमंत्री का नाम सीधे तौर पर उछल रहा है और लगभग पहली बार ही कोयला मंत्रालय के सेवानिवृत्ति सचिव का नाम भी कोयला घोटाले में दर्ज एफ.आई.आर. में शामिल किया गया है। देश में अब यह आशंका जताई जा रही है कि सी.बी.आई. की इस कार्रवाई से देश में 250 के करीब प्रोजैक्ट, जिनका निवेश 12.50 लाख करोड़ रुपए है और जो देश की जी.डी.पी. का 20 प्रतिशत भाग है, उन पर कुप्रभाव पड़ सकता है।

इसी प्रकार देश के प्रमुख औद्योगिक घराने से संबंधित उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला का नाम एफ.आई.आर. में शामिल किया गया है। हालांकि कोयला घोटाले में दर्ज यह 24वीं एफ.आई.आर. है परन्तु इससे पहले की एफ.आई.आर. से उतना तूफान नहीं उठा था जितना इस बार उठ रहा है। इस कोयला घोटाले में सबसे पहली एफ.आई.आर. 4 सितम्बर, 2012 को दर्ज हुई थी और आखिरी एफ.आई.आर. 11 जून, 2013 को कांग्रेस पार्टी के सांसद नवीन जिंदल के खिलाफ दर्ज हुई थी। उद्योगपतियों के खिलाफ दर्ज एफ.आई.आर. के मामले पर देश में बहुत रोष दिखाया जा रहा है जबकि पूर्व कोयला सचिव और प्रधानमंत्री को पीछे रखा जा रहा है। देश में जो भ्रष्टाचार होता है वह मुख्य तौर पर सियासी और नौकरशाही वर्ग द्वारा ही होता है और उद्योगपतियों को मजबूरन इसमें शामिल किया जाता है क्योंकि उनके बगैर इतने बड़े घोटाले हो ही नहीं सकते।

बड़े उद्योगपतियों में आपस में आगे बढऩे की होड़ स्वाभाविक है। देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि देश का एक औद्योगिक परिवार ऐसा है जिसकी तरफ कोई देखने की हिम्मत भी नहीं कर सकता है और यही परिवार एक प्रकार से देश की आर्थिकता को जिधर चाहे मोड़ सकता है। गैस के उत्पादन और गैस के मूल्य निर्धारित करने का मामला देश के सामने है और जाहिर तौर पर उस मामले पर एक मंत्री को इस परिवार का विरोध करने के कारण मंत्री पद से हटा दिया गया था।

ऐसी स्थिति में जब सरकार मनमर्जी से काम करती है और देश में सत्ता के 2 केन्द्र हों तो घोटालों का सिलसिला बंद होना असंभव है। कुदरती संसाधनों के बंटवारे में धांधली का होना स्वाभाविक है। इस हालत में बड़े उद्योगपति, जो अच्छी सोच रखते हैं तथा उनकी छवि और भूमिका भी कई वर्षों से साफ-सुथरी रही है, वे दुविधा में पड़ जाते हैं। रतन टाटा, जो टाटा ग्रुप के प्रमुख भी रह चुके हैं, उनका नाम भी सी.बी.आई. ने 2-जी घोटाले में शामिल किया था। अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘ट्रांसपेरैंसी’, जो संसार में भ्रष्टाचार का हिसाब-किताब रखती है, उसने आदित्य बिड़ला ग्रुप की कम्पनी हिंडाल्को, जो कोयला घोटाले में लिप्त है, को 75 प्रतिशत स्वच्छता के अंक दिए हैं जबकि यह औसत 54 प्रतिशत है। इसी प्रकार टाटा ग्रुप की 6 कम्पनियों को इस संस्था द्वारा स्वच्छता के मामले में ऊंचे स्तर पर रखा गया है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने सी.बी.आई. को आदेश दिया है कि वह राडिया टेप से संबंधित 6 मुख्य केसों को 2 महीनों के अंदर-अंदर निपटाएं। इसमें बहुत से प्रमुख उद्योगपति, नौकरशाह और सियासी नेता लपेट में आ सकते हैं। कोयला घोटाले में भी अभी और कई एफ.आई.आर. दर्ज होनी बाकी हैं। अब जब देश की आर्थिकता डावांडोल है, इस स्थिति में देश की हालत क्या होगी, यह तो ईश्वर ही जानता है। जब 1990 के दशक के आस-पास देश में आर्थिक सुधारों का सिलसिला शुरू हुआ था, उसमें एक ही आधार था कि लोगों को मनमर्जी करने का पूरा अधिकार दिया जाए, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो।

मनुष्य में लालच का भाग किसी न किसी मात्रा में जरूर होता है और खुली छूट देने के कारण इसका बढऩा स्वाभाविक है। इस लालच की आग ने हमारे देश की और संसार की आर्थिकता को मानो तबाह कर दिया है। मनुष्य की प्रवृत्तियों को नियंत्रण में करने के लिए दो ही मुख्य साधन होते हैं। एक भय और दूसरा धर्म। धर्म का सहारा लेने में लोग स्वयं महसूस करते हैं कि गलत काम न किया जाए। हर युग में लोगों पर कोई न कोई नियंत्रण जरूर रहा है जिससे गलत प्रवृत्तियों वाले लोगों को काबू में रखा जाता रहा है। इन दोनों परिस्थितियों में मनुष्य का लालच काबू में रहता है।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA (Editor in Chief)
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