असाध्य रोग से ग्रसित सी.बी.आई.

केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सी.बी.आई.) केवल स्वायत्तता की कमी से ही पीड़ित नहीं। बिरला-पारेख प्रकरण की हैंडलिंग से आभास मिलता है कि यह बहुत गहराई तक गल-सड़ चुकी है। ‘पिंजरे में बंद यह तोता’ बीमारी का शिकार लगता है। आएं हम पारेख-बिरला प्रकरण के कुछ पहलुओं पर नजर डालें। पहले नम्बर पर तो सी.बी.आई. का यह मानना है कि हिंडाल्को को तालाबीरा कोयला ब्लॉक में हिस्सेदारी आबंटित करने के लिए इन दोनों व्यक्तियों ने साजिश की थी। यदि ऐसा हो तो यह साजिश इन दोनों तक ही सीमित कैसे रह सकती है? इसमें कम से कम उस व्यक्ति, यानी कि प्रधानमंत्री को अवश्य ही शामिल करना पड़ेगा जिसके हस्ताक्षरों के बिना यह काम हो नहीं सकता था।

सीधी-सी बात है कि सिफारिश को निर्णय में बदलने के लिए प्रधानमंत्री की स्वीकृति जरूरी है। इसलिए प्रधानमंत्री को आरोपियों की सूची से बाहर रखना न केवल अतार्किक बल्कि असंभव भी है। पी.एम.ओ. द्वारा जारी प्रैस रिलीज में दिए गए तथ्य हमारे निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं। कुमार मंगलम बिरला ने 7 मई, 2005 के दिन प्रधानमंत्री को सीधा पत्र लिखा और 18 दिन बाद यह पत्र कोयला मंत्रालय को इस संबंध में फैसला लेने के लिए भेज दिया गया। यानी कि आबंटन की प्रक्रिया बिरला के प्रधानमंत्री तक पहुंच करने से शुरू हुई थी न कि पारेख तक पहुंच करने से। प्रैस रिलीज में यह भी खुलासा हुआ है कि पारेख की सिफारिश स्वीकार करने में प्रधानमंत्री ने केवल यह सोच कर आंखें मूंदे हस्ताक्षर नहीं किए कि यह परामर्श भरोसेमंद कोयला सचिव द्वारा दिया गया है बल्कि हस्ताक्षर करने से पूर्व उन्होंने अपने विवेक से काम लिया। इसलिए प्रधानमंत्री हिंडाल्को को तालाबीरा ब्लॉक आबंटन के फैसले का अटूट अंग थे।

बेशक सुप्रीमकोर्ट इस जांच की निगरानी कर रही है फिर भी सी.बी.आई. ने या तो इस तथ्य की अनदेखी की या इसे कोई परवाह ही नहीं। सी.बी.आई. ने जो निष्कर्ष निकाला है वह तो स्वयं इसके मुंह पर तमाचे से कम नहीं। कथित साजिश को केवल दो व्यक्तियों तक सीमित करके यह या तो अपनी जांच एवं विशलेषण प्रक्रिया की खामियां उजागर कर रही है या फिर सुप्रीमकोर्ट से संरक्षण प्राप्त होने के बावजूद किसी अज्ञात भय से पंगु बनी हुई है।

दूसरी ओर अधिक बदतर बात है कि जो काम सी.बी.आई. ने एफ.आई.आर. दर्ज करने के बाद किया है। ऐन 2 दिन बाद इसके निर्देशक रणजीत सिन्हा ने समाचार पत्र ‘इकनामिक टाइम्स’ को साक्षात्कार में बताया कि दोनों व्यक्ति शायद बेगुनाह ही हों और इस आधार पर दोष मुक्त हो सकते हैं। स्पष्ट है कि सी.बी.आई. ने जो कदम उठाया उस पर इसे स्वयं भरोसा नहीं। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि इसने यह कदम उठाया ही क्यों? अब तो रणजीत सिन्हा ने अपनी ही एफ.आई.आर. की विश्वसनीयता को गंभीर संदेह के घेरे में ला दिया है।

फिर भी दुख और हैरानी की बात है कि यह किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ। साक्षात्कार के 2 दिन बाद सी.बी.आई. के सूत्रों ने ‘इंडियन एक्सप्रैस’ को लीक किए गए समाचार के माध्यम से कहा कि वे इस संदेह में हैं कि रिटायर होने के एक वर्ष बाद पारेख ने जिन कम्पनियों की नौकरी स्वीकार की उन्हें कोयला ब्लॉक आबंटित करवाने में शायद उनकी कोई भूमिका रही है। इसीलिए अपनी आशंकाओं के निवारण हेतु यह उनसे पूछताछ करना चाहती है। ऐसा लगता है कि जानबूझ कर इस व्यक्ति को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। पूरे मामले में से कीचड़ उछालने की साजिश नजर आ रही है।

लेकिन सी.बी.आई. ठहरी देश की अग्रणीय जांच एजैंसी। क्या इसे छननी की तरह लीक करना शोभा देता है? फिर भी यह सदा इसी काम में व्यस्त रहती है। पत्रकारों के कान में फूंक मार दी जाती है और इस तरह आशंकाओं का गुब्बार खड़ा किया जाता है और ऐसे लोगों को संदेह के दायरे में खींच लिया जाता है जिन पर आरोप भी नहीं लगा होता और शायद कभी भी दोषी न पाए जाएं। अन्ततोगत्वा बेशक वे दोषमुक्त हो जाते हैं लेकिन उनकी प्रतिष्ठा तो दागी हो ही जाती है। मुझे डर है कि सी.बी.आई. में भर्ती किए गए लोग ही शायद गलत किस्म के हैं क्योंकि इसकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठते रहते हैं। मैं निश्चय से नहीं कह सकता कि स्वायत्तता मिलने से ‘पिंजरे का तोता’ सुधर जाएगा। मुझे तो आशंका है कि इस तोते का शायद कोई भविष्य ही नहीं है। हमें बिल्कुल नई प्रकार की जांच एजैंसी की जरूरत है। यह ‘तोता’ किसी असाध्य रोग से ग्रसित है।

Posted By : BIPIN CHANDRA MISHRA (Editor)
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