राहुल गांधी खुद ही अपने ‘दुश्मन’

क्या आप इस बात से सहमत होंगे कि राहुल स्वयं ही कभी-कभी अपने सबसे बुरे शत्रु सिद्ध होते हैं?’’ पर्टी का अचानक यह सवाल सुनकर मुझे महसूस हुआ कि राहुल के हाल ही के व्यवहार की शायद यही सही व्याख्या है। सरकारी अध्यादेश संवाददाता सम्मेलन में चीथड़े उड़ाने या हाल ही के अपने भाषणों में राहुल द्वारा कही बातों की यदि यह बिल्कुल सम्पूर्ण व्याख्या न भी हो, फिर भी काम चलाने के लिए यह काफी है।

उदाहरण के तौर पर इंदौर में भाषण करते हुए उन्होंने अचानक और रहस्यमय ढंग से यह खुलासा किया कि उन्हें एक गुप्तचर अधिकारी ने बताया है कि मुजफ्फरनगर के 10-15 मुस्लिम लड़के पाकिस्तानी गुप्तचर एजैंसी आई.एस.आई. के सम्पर्क में हैं और वे इसके प्रभाव में आ सकते हैं। उनके इस बयान से कई ऐसी चिंताएं खड़ी हो गईं जिनकीं राहुल ने कल्पना भी नहीं की थी।

पहला सवाल तो यह पैदा हुआ कि गुप्तचर अधिकारियों ने उन्हें सूचना ही क्यों दी। वह केवल एक सांसद हैं और उन्होंने गोपनीयता की कोई शपथ भी नहीं ली, इसलिए वह गुप्तचर अधिकारियों द्वारा जानकारी दिए जाने के हकदार नहीं हैं। दूसरा सवाल यह उठा कि कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में क्या वह घटनाक्रम की जानकारी मात्र दे रहे थे या उन्होंने कुछ अन्य ही संदेश दिया है। तीसरा सवाल सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या यह बयान साम्प्रदायिक ङ्क्षहसा के शिकार मुस्लिमों को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संभावित निष्पादकों के रूप में प्रस्तुत नहीं करता? यदि उनके बयान पर अनेक लोगों द्वारा नाराजगी भरी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है तो हैरानी की बात नहीं।

विडम्बना तो यह है कि राहुल का इरादा हमदर्दी व्यक्त करने का था। वह सचमुच ही मुस्लिम समुदाय के लिए चिंतित हैं लेकिन उनकी यह चिंता उनके बयान में परिलक्षित नहीं हुई। यदि उन्होंने जुबान खोलने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार किया होता तो उनके शब्द कुछ और ही होते या उन्होंने बिल्कुल ही कुछ भी न कहा होता। यह भी हो सकता था कि अपनी बात स्पष्ट करने के लिए उन्होंने अधिक विस्तार से विचार व्यक्त किए होते। इसके विपरीत उनके इरादों पर ही सवाल खड़े हो गए और उन लोगों को दुख पहुंचा जो उनके प्रति झुकाव रखते थे। क्या यह अपना दुश्मन खुद बनने का निकृष्टतम उदाहरण नहीं?

एक अन्य उदाहरण है राहुल का अपनी दादी की हत्या का हवाला देना। उन्होंने कहा कि जो ‘दोस्त’ उन्हें बैडमिंटन खेलना सिखाते रहे उन्होंने ही जब उनकी दादी की हत्या कर दी तो वह क्रोध से भरे हुए थे। नि:संदेह उनका इरादा दादी मां के छिन जाने के सदमे और बेवकूफी भरी साम्प्रदायिक हिंसा के बारे में बात करने का ही था जब वह इसी प्रकार की पीड़ा झेलने वाले लोगों का दुख बांटने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान उन्होंने खुद को इस सवाल से घिर जाने दिया कि क्या उन्हें उन हजारों सिखों के लिए भी इसी प्रकार की पीड़ा महसूस हुई जो कांग्रेसी सांसदों और कार्यकर्त्ताओं द्वारा भड़काई गई भीड़ के हाथों दिल्ली की सड़कों पर कत्ल कर दिए गए? राहुल को पहले से ही पता होना चाहिए था कि यह सवाल अवश्य ही उठेगा।

नि:संदेह राहुल का यह आरोप सही है कि भाजपा और मोदी साम्प्रदायिक हिंसा का राजनीतिक लाभ लेने के प्रयास कर रहे हैं लेकिन वह यह भूल रहे हैं कि 1984 में उनके पिता का व्यवहार भी बिल्कुल ऐसा ही था। सिख विरोधी दंगों के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के विज्ञापनों में ये सवाल उठाए गए, ‘‘क्या आप चाहते हैं कि बार्डर आपके घर की दहलीज तक आ जाए?’’ तथा ‘‘क्या रात के समय आपको टैक्सी ड्राइवर से डर लगता है?’’ इन दोनों ही सवालों में बहुत सूक्ष्म ढंग से सिखों को डरावने रूप में पेश किया गया था। इस हत्याकांड में एच.के.एल. भगत की भूमिका पर कई सवाल उठाए गए थे लेकिन फिर भी वह राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में डटा रहा। राजीव गांधी ने खुद भी कौन-सी कसर छोड़ी थी जब उन्होंने इन दंगों का स्पष्टीकरण देते हुए कहा, ‘‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है।’’

राजनीतिज्ञों को घुमा-फिरा कर बात करनी पड़ती है। उन्हें अपने संदर्भों के संबंध में सचेत रहना चाहिए। जो भी उपमा देनी है उस पर अच्छी तरह विचार करना चाहिए। राहुल वास्तव में अपने बारे में यदि शंकाएं नहीं तो सवाल अवश्य ही पैदा करते हैं। पहली बार यह बात संवाददाता सम्मेलन में सामने आई जहां उनकी समझदारी पर कई जोरदार सवाल उठे। उसके बाद तो यह गलती बार-बार होने लगी। क्या यह खुद अपना दुश्मन होने वाली बात नहीं?

परिणाम यह हुआ है कि राहुल ने अपनी जो छवि बना ली है वह किसी भी तरह सुखद नहीं। अक्सर उनकी दाढ़ी बढ़ी होती है और वह लड़ाई करने के अंदाज में अपने कुत्र्ते की बाजू चढ़ाते रहते हैं। वह एक गुस्सैल अधेड़ व्यक्ति की छवि पेश करते हैं न कि किसी ऐसे राजनीतिज्ञ की जिससे देश वर्तमान संकट में से निकलने का नेतृत्व प्रदान करने की उम्मीद लगाए बैठा हो। यह सब कुछ राहुल का अपना ही कारनामा है और शायद वह स्वयं ही इस छवि को बदल सकते हैं लेकिन सवाल पैदा होता है कि क्या वह ऐसा करेंगे?

Posted By : BIPIN CHANDRA MISHRA (Editor)
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