शराफत के चोले में शरीफ और हम

दो खबरें एक साथ पढ़ने को मिलीं। पहली अमेरिका से, जहां नवाज शरीफ अपनी चिर-परिचित चाशनी पगे अंदाज में वहां के लोगों को भरोसा दिला रहे थे कि भारत से दोस्ती के लिए उन्हें अपनी ओर से जितनी भी कोशिश करनी होगी, करेंगे। दूसरी, जम्मू से। पाकिस्तान की ओर से की गई गोलीबारी में हमारा एक जवान शहीद हो गया था। मैं सोच में पड़ गया। एक तरफ, पड़ोसी देश अच्छे रिश्तों की चाहत दिखा रहा है। दूसरी तरफ, उसकी सेना हमारे जवानों को अकाल मौत के मुंह में धकेल रही है। सवाल उठता है कि नवाज शरीफ कितना सच बोल रहे हैं? क्या वह वाकई चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच अमन की बयार बहे और दोनों मुल्कों के बाशिंदे चैन के साथ रह सकें? अटल बिहारी वाजपेयी के साथ किया गया लाहौर समझौता इसकी गवाही देता है, पर इस ऐतिहासिक घटना को कुछ क्षण के लिए बिसरा दें, तो उनके खाते में बहुत कुछ ऐसा दर्ज है, जो हिन्दुस्तानी ‘अमन ब्रिगेड’ की भोली आशाओं को खंडित करने के लिए पर्याप्त है। आइए, शुरू से बात करते हैं।
नवाज एक नवंबर 1990 को पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। उससे पहले वह जनरल जियाउल हक की मेहरबानी से पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके थे। उस जमाने में पाकिस्तान के राजनेताओं के बीच यह चर्चा आम थी कि शरीफ को आईएसआई धन और बल मुहैया करवाती है। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसा तभी संभव था, जब वह रावलपिंडी के फौजी सत्ता प्रतिष्ठान के काम आते। आप पूछ सकते हैं कि पंजाब प्रांत का मुख्यमंत्री भला पाकिस्तानी हुकूमत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों था? वजह बता दूं। जियाउल हक ने पाकिस्तानी फौज और राजनीति में कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा दिया था। उन्हें लगता था कि इस मुल्क की स्थापना इस्लामी उसूलों पर हुई है, इसलिए कट्टर धार्मिक लोगों को आगे लाने से ही देश का भला होगा। उसी दौरान हिन्दुस्तानी पंजाब में आतंकवाद को भी बढ़ावा मिला। इसके पीछे आईएसआई थी।
यह ठीक है कि नवाज शरीफ तब तक वजीर-ए-आजम नहीं बने थे, पर तब भी जियाउल हक के खासमखास होने से हिन्दुस्तान में आतंक की आग लगाने वालों से उनकी दोस्ती जगजाहिर थी। खालिस्तानी आतंकवादियों की ट्रेनिंग और संरक्षण के लिए भी यह सूबा बहुत जरूरी था। फिर अपेक्षाकृत तरक्कीपसंद भुट्टो खानदान को रोकने के लिए किसी दमदार शख्सियत की जरूरत थी। जियाउल हक को शरीफ में ये सारी खूबियां नजर आती थीं। जिया की मौत के बाद जब वह प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपने स्वर्गीय आका की नीतियों को बढ़ावा दिया। भारत तब तक पंजाब में शांति स्थापित करने में कामयाब हो गया था, पर जिया कश्मीर को सुलगा चुके थे। उन चिनगारियों को शोला बनाया शरीफ और आईएसआई के नापाक गठजोड़ ने।
यही वह समय है, जब घाटी के चिनार तक सुलग उठे थे और नई दिल्ली को सेना व अर्ध-सैनिक बलों के लाखों जवान वहां झोंकने पड़ गए थे। आज भी हम कश्मीर में अलगाववादियों से जूझ रहे हैं। हमारी इन दुश्वारियों में काफी कुछ योगदान नवाज शरीफ का भी है। भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करने की तो यह सिर्फ शुरुआत थी। 12 मार्च, 1993 को मुंबई में सिलसिलेवार धमाके हुए। इनमें 257 लोग मारे गए और सात सौ से अधिक घायल हुए। भारतीय राष्ट्र-राज्य की गरिमा पर अपने किस्म की यह काफी बड़ी चोट थी। इन बम धमाकों के अभियुक्तो को पाकिस्तान में शरण मिली और इसके सूत्रधारों को ईनाम। उस दौरान भी नवाज शरीफ ही वजीर-ए-आजम थे।
उनका दूसरा कार्यकाल 1997 में शुरू होकर 1999 में खत्म हुआ। इसी दौरान पोखरण में भारत ने दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने हमसे ज्यादा धमाके किए। यही नहीं, कारगिल की जंग भी तभी शुरू हुई। शरीफ और उनके अलमबरदार कहते हैं कि वह तो अटल जी के साथ अमन के तराने रच रहे थे, पर उनके बेलगाम जनरल परवेज मुशर्रफ ने उनकी नेकनीयती की पीठ में छुरा घोंप दिया।
क्या वे सच बोल रहे हैं? इस सवाल पर चर्चा फिर करेंगे। अब आते हैं शरीफ साहब के तीसरे कार्यकाल पर। इसकी शुरुआत पांच जून, 2013 को हुई। तब से लेकर अब तक पाकिस्तान की ओर से सीजफायर के उल्लंघन की सौ से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं। यही नहीं, हमारे कई अफसर व जवान मारे जा चुके हैं। जम्मू और कश्मीर में इधर आतंकवादी गतिविधियों में इजाफा हुआ है। बरसों से शांत पड़ा कठुआ से सटा इलाका भी सुलगने लगा है। कठुआ और सांबा में हुए आतंकवादी हमले इसके उदाहरण हैं। इनमें एक कर्नल समेत 12 जवानों को शहीद होना पड़ा। नवाज शरीफ के प्रशंसक कह सकते हैं कि जरदारी के जाते-जाते यह सब शुरू हो गया था, पर बात इतनी साधारण नहीं है। शरीफ साहब का पूरा खानदान भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहा है।
एक उदाहरण। 26/11 के वास्तुकार हाफिज सईद को नवाज के भाई शहबाज ने शरण दे रखी है। उसकी अगुवाई वाले संगठन जमात-उद-दावा को शहबाज की पंजाब सरकार ने इस साल न केवल छह करोड़ रुपये से अधिक की इमदाद मुहैया कराई, बल्कि उस जैसे तमाम आतंकवादियों को शरण भी दी। इसी जमात से खूंखार दहशतगर्दों के संगठन लश्कर-ए-तैयबा का जन्म हुआ है। जो काम नवाज शरीफ ने 1980 के दशक में पंजाब में किया था, वही अब उनके भाई शहबाज कर रहे हैं। क्या अब भी आपको लगता है कि नवाज शरीफ की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है? क्या उनका हृदय परिवर्तन हो गया है और वह वाकई हिन्दुस्तान से दोस्ती चाहते हैं? यदि एक क्षण को इसे सच भी मान लें, तो सवाल उठता है कि जो शख्स प्रधानमंत्री की कुरसी पर बैठकर भी इतना बेचारा हो, उससे बातचीत का क्या फायदा? यही वजह है कि कुछ अतिवादी मानते हैं कि नई दिल्ली को इस्लामाबाद में फौजी हुक्मरां ही रास आते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण शिमला और लाहौर समझौते का दर्दनाक हश्र है। ये दोनों समझौते जम्हूरियत के जरिये चुने गए नेताओं ने किए थे, पर पाकिस्तानी सेना ने इन पर पानी फेर दिया। इसके उलट सैनिक हुक्मरानों से जो सहमतियां बनीं, वे हर तरह से अमल में लाई गईं।
हालांकि, यह भी सच है कि अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद आसिफ अली जरदारी के वक्त में अपेक्षाकृत शांति रही। कहीं ऐसा तो नहीं कि शरीफ साहब दोहरा खेल खेलने के आदी हैं? वह भारत से पुराना हिसाब बराबर करना चाहते हैं और दुनिया को दिखाने के लिए अमन राग का आलाप भरते रहते हैं? यह आशंका बेबुनियाद नहीं है। दोनों ओर के हुक्मरानों में नेकनीयती या बदनीयती भरी आकांक्षाएं समय-समय पर जोर मारती रही हैं। इसीलिए अगर अमन की चाहत दिखी है, तो अनावश्यक आक्रमण भी हुए हैं। वक्त की गेंद इस वक्त शरीफ के पाले में है। अगर उनकी नीयत नेक है, तो अपने जनरलों से उन्हीं को जूझना होगा। इतिहास को सार्थक दिशा देने का ऐसा अवसर शायद उन्हें फिर कभी हासिल न हो।

Posted By : Editor in Chief
Like Us on Facebook