नेहरू बनाम पटेल, लड़ाई पुरानी है

इस वर्ष 31 अक्तूबर को सरदार पटेल की 137वीं जयंती के अवसर पर उनकी स्मृति में विश्व की सबसे ऊंची लौह प्रतिमा की स्थापना की घोषणा के साथ ही सरदार राष्ट्रीय बहस का केन्द्र बिन्दु बन गए हैं। मीडिया में लेखों और वक्तव्यों की बाढ़ आ गयी है। सरदार को गांधी जी का अंधभक्त, नेहरू का वफादार सहयोगी, नेहरू छाप सेकुलर और संघ विरोधी सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। यह बहस एकांगी साक्ष्यों के आधार पर ऐसे लोगों के द्वारा चलायी जा रही है जो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और जिसके पास इतिहास की गहराइयों में उतरने वाली सत्यनिष्ठा व शोध वृत्ति का अभाव है।
वस्तुत: नेहरू -पटेल मतभेदों की कहानी उनके जीवनकाल से ही चल रही है। यहां हम पचास वर्ष पूर्व पाञ्चजन्य के 30 नवम्बर 1964 के अंक में प्रकाशित एक लेख को पुनर्मुद्रित कर रहे हैं जिसमें नेहरू जी की मृत्यु के तुरंत पश्चात दिल्ली में सरदार पटेल और नेहरू की जयंतियों के समारोहों की प्रत्यक्षदर्शी झलकियां प्रस्तुत हैं। मैं जुलाई 1964 में दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में इतिहास का लेक्चरर बनकर लखनऊ से दिल्ली आ गया था और दोनों समारोहों का प्रत्यक्षदर्शी था। पाञ्चजन्य तब लखनऊ से ही छप रहा था।
पाञ्चजन्य 30 नवम्बर 1964 के अंक में प्रकाशित लेख
राष्ट्र में दो विरोधी विचार प्रक्रियाओं का प्रारंभ
14 नवम्बर को श्री जवाहर लाल नेहरू के निधन के उपरांत उनकी जन्मतिथि प्रथम बार मनायी गयी। इसी के 14 दिवस पूर्व 31 अक्तूबर को सुप्रसिद्ध लाल किले में दिल्ली के नागरिकों द्वारा सरदार पटेल के निधन के 14 वर्ष उपरांत प्रथम बार पटेल जयंती का आयोजन किया गया। जिन्हें इन दोनों समारोहों को अपनी आंखों देखने का सौभाग्य प्राप्त हो सका वे जब नेहरू जयंती के चार दिन पूर्व ही कांग्रेस महासमिति के गुंटूर अधिवेशन में विदेश नीति एवं आणविक नीति संबंधी विवाद को अपने सामने रखते हैं, तो उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि पं.नेहरू के निधन के पश्चात हमारे राष्ट्र जीवन में दो परस्पर विरोधी विचार प्रक्रियाओं का श्रीगणेश हो गया है।
जन भावना
एक ओर यदि स्व. नेहरू की कृपा से सत्तारूढ़ हुआ एक छोटा सा गुट, संभवत: अपनी राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए समस्त सरकारी साधनों एवं प्रचार तंत्र को जुटाकर पं.नेहरू के व्यक्तित्व को एकदम आकाश पर चढ़ा देना चाहता है तो देश का सामान्य बुद्धिजीवी, यहां तक कि सत्तारूढ़ कांग्रेस दल का अधिकांश नेतृ वर्ग भी, व्यक्तिपूजा के इस कृत्रिम वातावरण के ऊपर उठकर नेहरू जी के 17 वर्ष तक लगभग एकतंत्रीय शासन की वर्तमान स्थिति एवं समस्याओं की कसौटी पर कस कर ही उनके व्यक्तित्व का यथार्थवादी मूल्यांकन करना चाहता है। अन्यथा क्या कारण है कि 14 वर्ष की निर्मम एवं कृतघ्न उपेक्षा (जिसके लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के वर्तमान उपकुलपति एवं भूतपूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री डा.सी.डी. देशमुख ने अत्यंत दु:ख प्रकट किया) के उपरांत दिल्ली के नागरिकों के अंत:करणों में स्व.सरदार पटेल के प्रति श्रद्धा का ज्वार इतने जोरों से उमड़ा कि जिसे देखकर लगता था कि मानो कोई दीवार थी जो इतने वर्षों तक जनमानस की श्रद्धा भावना एवं सरदार पटेल के बीच खड़ी रही हो और जो अचानक हट गयी हो। इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर केन्द्रीय मंत्री डा.सत्यनारायण सिन्हा एवं उपकुलपति डा. देशमुख दोनों ने इंगित भी किया। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि पटेल जयंती के गैर सरकारी नागरिक समारोह में सरकार एवं सत्तारूढ़ दल की केवल उपेक्षा ही नहीं तो सक्रिय विरोध होते हुए भी कांग्रेस अध्यक्ष कामराज का वचन देकर भी समारोह में न जाना, प्रधानमंत्री श्री शास्त्री का बार-बार अनुरोध करने पर भी संदेश न भेजना, राष्ट्रपति एवं केन्द्रीय मंत्री डा.सिन्हा तथा श्री देसाई पर समारोह में सम्मिलित न होने के लिए दबाव डाला जाना एवं दिल्ली कांग्रेस कमेटी द्वारा समारोह की विफलता के लिए अन्य हथकंडे अपनाना इस सक्रिय विरोध एवं उपेक्षा के जीवित प्रमाण हैं। लालकिले का विशाल दीवाने आम जनता से खचाखच भरा था तो दूसरी ओर 14 नवम्बर की प्रधानमंत्री श्री शास्त्री द्वारा उदघाटित ह्यनेहरू ज्योतिह्ण के जुलूस में विद्यालयीय अनुशासन से बंधे अबोध बालकों एवं 100-50 केन्द्रीय अधिकारियों के अतिरिक्त सामान्य जनता के कहीं दर्शन भी नहीं हुए। इस जन भावना का प्रदर्शन नेहरू स्मारक निधि की सूची को देखकर भी लग सकता है।
विगत साढ़े 5 माह से समस्त सरकारी प्रचार एवं अखबारी विज्ञापन के उपरांत भी जनसाधारण की ओर से इस निधि में अत्यल्प ही योगदान हो सका है और अंतत: सरकारी दबाव पर देश के कुछ प्रमुख उद्योगपतियों ने मिलकर लगभग 5 करोड़ रुपया देकर इस निधि की मान रक्षा की है।
कृतित्व का महत्व
पं.नेहरू की व्यक्ति पूजा से मुक्त होने के लिए जनता की छटपटाहट एवं सरदार पटेल के प्रति उत्तरोत्तर बढ़ती हुई श्रद्धा को देखकर डा.लोहिया का 31 अक्तूबर का यह कथन अत्युक्ति पूर्ण नहीं लगता कि अब से 300 वर्ष बाद आम लोगों की जिह्वा पर बीसवीं शताब्दी के जिन भारतीय नेताओं के नाम होंगे, वे होंगे-महात्मा गांधी, सरदार पटेल और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस। जनभावना की इस आश्चर्यजनक दिशा को कोई राजनीतिक षड्यंत्र कहना निरी मूर्खता होगी। यह तो भावी पीढि़यों द्वारा राष्ट्रीय कसौटी पर व्यक्तित्वों के यथार्थवादी मूल्यांकन की अनिवार्य ऐतिहासिक प्रक्रिया का संकेत मात्र है। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि राष्ट्र की कोई पीढ़ी अपने समकालीन किसी महापुरुष की आकर्षक मूर्ति, नाटकीयता एवं लम्बी चौड़ी उड़ान भरी बातों से इतनी अधिक अभिभूत हो जाती है कि वह उसके कृतित्व पक्ष की सर्वथा उपेक्षा कर देती है और साथ ही उन महान व्यक्तित्वों की ओर भी उसका ध्यान नहीं जाता जिनके ठोस कृतित्व के मंच पर खड़े होकर ही पहले महापुरुष को उछल कूद करने एवं लम्बी चौड़ी शाब्दिक उड़ानें भरने का अवसर मिल पाता है। डा.लोहिया ने जिन्होंने पं.नेहरू के दाहिने हाथ बनकर सरदार पटेल की मृत्यु-पर्यंत उनका खुला विरोध एवं आलोचना की निर्भीक एवं प्रामाणिक अत्मविश्लेषण करते हुए हमारे वर्तमान राष्ट्रीय चरित्र की इस दुर्बलता को स्वीकार किया कि हम लोग कृति को नहीं, शब्दों की उड़ान को महत्व देने लगे हैं। सरदार पटेल के प्रति यह सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है कि जीवन भर उनके प्रबल विरोधी रहते हुए भी डा.लोहिया ने उनकी मृत्यु के 14 वर्ष उपरांत सहस्रों नर-नारियों के समक्ष आत्मालोचन करते हुए मुक्त हृदय से यह स्वीकार किया कि अपनी जवानी में मैं सरदार पटेल को समझ नहीं पाया, इसमें कुछ मेरी कमी थी कि मैं राष्ट्रीय चरित्र की इस दुर्बलता से ओतप्रोत था और कुछ सरदार की भी रही कि वे केवल कृति के धनी बने रहे, शब्दों के फैलाव को, उड़ान को उन्होंने कभी अपनाया नहीं। डा. लोहिया ने और आगे बढ़कर अपने उस व्यक्तिगत संस्मरण को दोहराया जब 1948 की मेरठ कांग्रेस में पं.नेहरू के इशारे पर कांग्रेस के अंदर समाजवादी गुट के प्रवक्ता के रूप में डा.लोहिया ने सरदार पटेल की कड़ी आलोचना एवं निंदा की थी तो सरदार ने केवल इतना ही कहा था कि तुम समाजवादी जो बड़ी-बड़ी बातें करते हो, उनके उत्तर में मेरा इतना ही कहना है कि तुम लोग चाहे जिस एक सूबे का शासन संभाल लो और वहां कुछ करके दिखाओ। डा.लोहिया ने इस घटना को सुनाते हुए कहा कि उस समय तो जवानी के आवेश में मैंने सरदार के इस कटाक्ष का एक उत्तर दे दिया था जिसमें थोड़ी सी सच्चाई थी तो काफी घमंड भी भरा था किंतु आज देश के करोड़ों अधेड़ों का प्रतीक बनकर जब मैं सोचता हूं तो मुझे लगता है कि सचमुच सरदार ने ठीक ही कहा था। हम केवल बातों की दुनिया में उड़ने लगे हैं। कृतित्व की ठोस धरती पर पैर टिकाये रखने का हमारा स्वभाव नहीं रहा है।

सरदार की कूटनीतिक सफलता
डा.लोहिया ने जिस पक्ष को अपनी मर्मस्पर्शी शैली में रखा उसे ही वर्तमान केन्द्रीय मंत्री डा.सिन्हा, से लेकर भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री मोरार जी देसाई तक अन्य समस्त वक्ताओं ने भी मुखरित किया। श्री देसाई ने कहा कि सरदार की महानता का सही मूल्यांकन आज हम भले ही न कर पायें किंतु भावी इतिहास उसे आंके बिना नहीं रहेगा। वे सस्ती लोकप्रियता के पीछे कभी नहीं दौड़े। राष्ट्र के हित में उन्होंने जो आवश्यक उचित समझा उसे कठोरतापूर्वक किया। उन्होंने राष्ट्र के मूल्य पर अपनी कृतित्व-व्यक्तित्व को बड़ा बनाने की चेष्टा नहीं की। अपनी सर्वस्वाहूति देकर राष्ट्र को महान बनाने का संकल्प ही अपने मन में रखा। वे राष्ट्र के लिए जिए, राष्ट्र के लिए मरे। बदले में उन्होंने कभी कुछ नहीं चाहा, कभी कुछ नहीं मांगा। अपनी पुत्री जो स्वयं अविवाहित रहकर मृत्यु-पर्यंत सरदार की छाया बनी रहीं, के लिए भी उन्होंने मरते समय किसी से कुछ कहा नहीं, मांगा नहीं और वे उसे उसके भाग्य के भरोसे छोड़कर चले गये। लेकिन राष्ट्र के लिए जो कुछ उन्होंने किया, वह न किया होता, 550 देशी रियासतों की जिन्हें सर्वशक्ति सम्पन्न ब्रिटिश शासन भी आत्मसात न कर पाया, यदि सरदार ने अपनी सूझ बूझ से दो वर्ष के अंदर भारतीय संघ में पूर्णतया विलीन कर भारतीय इतिहास की वह महानतम कृति जिसे महान चाणक्य भी पूर्ण नहीं कर पाया था, न कर डाली होती तो आज हमारी क्या दशा होती, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यही था संक्षेप में श्री देसाई द्वारा प्रस्तुत सरदार का मूल्यांकन। सरसंघचालक श्री गुरुजी ने सरदार के दूसरे कतृर्त्व का स्मरण दिलाया कि गांधी जी ने अपने असामान्य व्यक्तित्व के चारों ओर महान प्रतिभाशाली एवं कतृर्त्व शाली व्यक्तित्व बटोरे किंतु उन्हें व्यवहार कुशलता एवं कठोरतापूर्वक अनुशासन के सूत्र में पिरोकर ले चलने का कार्य सरदार ने ही किया। यह सरदार का ही कतृर्त्व था कि वे कांग्रेस का इतना सुदृढ़ ढांचा निर्माण कर गये कि अनेकों अन्तर्बाहय आघातों को सह कर भी वह आज तक टिका हुआ है। श्री गुरुजी द्वारा प्रस्तुत इस मूल्यांकन से क्या यह निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा कि पं.नेहरू जो 17 वर्ष तक भारत पर निर्विघ्न एकछत्र शासन कर सके उसका मूलाधार कांग्रेस संगठन की विशालता एवं सुदृढ़ता ही रही, जिसका एकमेव श्रेय सरदार पटेल की संगठन कुशलता एवं कर्तव्य कठोरता को ही दिया जा सकता है।
सरदार शिव थे
उपर्युक्त तीनों मूल्यांकनों के प्रकाश में केन्द्रीय मंत्री डा. सिन्हा द्वारा सरदार पटेल के लिए प्रस्तुत दोनों उपमाएं यथार्थ के अतिनिकट एवं सारगर्भित हो जाती हैं। डा.सिन्हा ने ऋग्वेद के एक सूत्र को सामने रखकर कहा कि जिस प्रकार सृष्टि रचना के तुरंत पश्चात दोलायमान पृथ्वी को इन्द्र ने अपने पराक्रम द्वारा स्थिरता प्रदान की उसी प्रकार सरदार ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात विद्यमान विकट एवं संकटापन्न स्थिति पर विजय पाकर हमारी स्वाधीनता को स्थायित्व प्रदान किया। और यदि गांधी नेहरू पटेल को ब्रह्मा विष्णु महेश की विभूति से उपमा दें तो सरदार इस विभूति में सबसे महान थे। वे शिव थे क्योंकि उन्हीं में लोक कल्याण के लिए हलाहल पान करने की क्षमता थी।
समस्या एवं समाधान
एक बात के लिए मन में शंका उत्पन्न होती है कि विभिन्न विचार पक्षों के शीर्ष नेताओं द्वारा किया गया उपर्युक्त मूल्यांकन कहीं नेहरू विरोधी भावना से प्रेरित अत: एक पक्षीय तो नहीं? किंतु आज राष्ट्र के समक्ष अनेक समस्याएं खड़ी हैं यथा पाकिस्तान और चीन का संकट, प्रवासी भारतीयों का भविष्य, गोवा और कश्मीर के विलीनीकरण की समस्या, खाद्य संकट एवं उड़ीसा के उपद्रव आदि-आदि इन समस्त समस्याओं का उग्र रूप प्रति सप्ताह जब हमारे सामने आता है और जब-जब हम उन्हें हल करने की इच्छा से उनके जन्म और विकास का इतिहास टटोलने का प्रयास करते हैं तो न चाहते हुए भी हम कहीं जाकर अटक जाते हैं?
समस्या एवं समाधान
विगत 17 वर्षों में करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाने, सैकड़ों भारतीय जवानों की बलि देकर सब अन्तरराष्ट्रीय जगत में स्वयं को विवाद का विषय बनाकर भी आज हम कश्मीर की समस्या को कहां हल कर पा रहे हैं?
गोवा केविलय पर जहां पंडित नेहरू के जीवित रहते किसी को कुछ बोलने का साहस नहीं हुआ वहां पर अब प्रतिरक्षा मंत्री चव्हाण और रेलमंत्री श्री पाटिल का सार्वजनिक रूप से वाद-विवाद हो रहा है। सरदार पटेल ने जहां 500 से अधिक देशी रियासतों के विलय का प्रश्न इतनी सरलतापूर्वक हल कर लिया था वहीं नागालैंड और कश्मीर के हमारे हाथ से निकल जाने की संभावना बढ़ती जा रही है। जहां तक विदेशी नीति का प्रश्न है उसके बारे में इस बार गुंटूर अधिवेशन में अधिकांश सदस्यों ने जो निर्भीक मत व्यक्त किया है उसको देखकर यही लगता है कि विरोधी दल जो भाषा अब तक बोलते आ रहे थे वहीं कांग्रेसजनों के मन में भी भरी पड़ी थी, किंतु उनकी जुबान पर ताला लगा था। ताला हटते ही वह भाषा बाहर आ गई है।

Posted By : Editor in Chief
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