जब पटेल ने किया कैबिनेट कमेटी की बैठक से वाकआऊट

राष्ट्रवादी अंग्रेजी साप्ताहिक ‘आर्गेनाइजर’ के दीपावली अंक में गत सप्ताह भारतीय सिनेमा के 100 साल पर विशेष परिशिष्ट निकाला गया। इस अंक में मेरे साथ किए गए एक लम्बे साक्षात्कार को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया। पत्रिका के सम्पादक प्रफुल्ल केतकर ने अपने संवाददाता प्रमोद कुमार के साथ इस साक्षात्कार को 15 दिन पूर्व रिकार्ड किया था। मेरे देखने में आया कि अंग्रेजी दैनिक ‘टैलीग्राफ’ एवं ‘आनंद बाजार पत्रिका’ ने भी इस साक्षात्कार के संबंध में समाचार प्रकाशित किए थे।
2 वर्ष पहले जब मैंने इससे पूर्व के 2 वर्षों में ब्लाग पर लिखी गई अपनी टिप्पणियों का एक संकलन प्रकाशित किया तो मैंने भारत के सबसे उल्लेखनीय पत्रकारों में से एक एम.जे. अकबर को इसकी प्रस्तावना लिखने का अनुरोध किया और उन्होंने बहुत ही बढिय़ा शब्दों में मेरे इस निवेदन को साकार किया। उनके 4 पृष्ठों के इस आलेख का अंतिम पैरा यहां प्रस्तुत है:

‘‘यह संकलन लाल कृष्ण अडवानी के करियर के संबंध में बेशक प्रत्येक सवाल का स्पष्टीकरण नहीं देगा लेकिन एक जवाब अवश्य प्रस्तुत करेगा। वह केंद्रीय सरकार में 2 अलग-अलग पदों पर मंत्री रह चुके हैं। मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल में वह सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री। उनके दिमाग में तो गृह मंत्रालय ही घूमता रहता है लेकिन उनके दिल में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय बसा हुआ है।’’

वास्तव में सूचना एवं प्रसारण मंत्री होते हुए मैं पहली बार एम.जे. अकबर को मिला और वह भी पाकिस्तान में। ‘मेरा देश : मेरा जीवन’ नामक अपनी स्मृतियों में मैंने अपने जन्म स्थान कराची की अपनी प्रथम यात्रा के बारे में अपना संस्मरण लिखा है जहां मैंने अपने जीवन के पहले 25 वर्ष गुजारे थे।

‘‘मैं पैरिस से वापस आ रहा था जहां मैं यूनेस्को सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए गया था। यह मात्र 2 दिन की एक छोटी यात्रा थी क्योंकि संसद सत्र शुरू होने वाला था। बहुत अटपटी सी बात है कि कराची में मुझे क्रिकेट ही लेकर गया था। पहली बार दूरदर्शन भारत-पाक टैस्ट मैच को कवर कर रहा था और सूचना एवं प्रसारण मंत्री की हैसियत से मुझे निमंत्रण मिला था। मैं खुशी से बावरा हो गया था। इस यात्रा के दौरान मैं केवल 2 ही बातें चाहता था कि अपना घर व स्कूल देखकर आऊं। जब मैं कराची में सेंट पैट्रिक हाई स्कूल में पढ़ता था तो फादर मॉडैस्टाइन हमारे प्रिंसीपल हुआ करते थे। वह काफी समय पूर्व रिटायर हो चुके थे लेकिन जब वह स्कूल के गेट पर निजी रूप में मेरा अभिनंदन करने पहुंचे तो मुझे सचमुच ही अथाह खुशी हुई। अन्य बातों के अलावा कराची में मैं पहली बार एम.जे. अकबर से मिला जोकि एक बहुत ही विद्वान सम्पादक एवं लेखक हैं। उनके साथ उसी समय से मेरी दोस्ती चली आ रही है जिसका मुझे गर्व है। उन दिनों वह अंगे्रेजी पत्रिका ‘संडे’ के लिए काम कर रहे थे और मुझे अभी तक याद है कि क्रिकेट मैच पर अपनी रिपोर्ट में उन्होंने मेरी ‘घर वापसी’ को भी कवर किया था।

यह स्पष्ट बात है कि जब यह संकलन प्रकाशित हुआ उससे पहले ही एम.जे. अकबर सरदार पटेल से संबंधित मेरी ब्लाग टिप्पणियां पढ़ते आ रहे थे। उन्होंने ही मेरा इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि 1947 में भारतीय सेना का नेतृत्व करने वाले ब्रिटिश जनरल का नाम गलत लिखा गया है। मैंने अपने ब्लाग में एक फुट नोट जोड़ कर इस गलती को ठीक किया।

सरदार पटेल के साथ नेहरू के मतभेदों के संदर्भ में उन्होंने मुझे एक बहुत ही बढिय़ा पुस्तक के बारे में बताया। बलराज कृष्ण द्वारा लिखी गई इस पुस्तक का नाम है: ‘इंडिया’का बिस्मार्क, सरदार वल्लभ भाई पटेल’। यह पुस्तक सरदार पटेल ट्रस्ट, कर्मसाड़ द्वारा प्रकाशित है। कर्मसाड़ ही सरदार पटेल का जन्म स्थान है।

आज के ब्लाग में मैं इस पुस्तक में से केवल एक ही हवाला देना चाहूंगा जो इस बात की पुष्टि करता है कि अपने विरुद्ध बहुत कठोर शब्द सुन कर सरदार पटेल न केवल कैबिनेट कमेटी की मीटिंग से वाकआऊट कर गए थे बल्कि इस बात का भी संकेत देता है कि उनके शीघ्र ही बाद वी.पी. मेनन भी मीटिंग से चले गए थे।

‘‘एक लोकतांत्रिक ढांचे में पुलिस कार्रवाई के लिए मंत्रिमंडल की मंजूरी जरूरी थी। नेहरू की अनिच्छा पर काबू पाना पटेल के लिए बहुत भारी काम था। नेहरू की अध्यक्षता वाली रक्षा समिति की मीटिंगों में से एक में इतनी कड़वाहट पैदा हो गई कि सरदार पटेल वाकआऊट कर गए। वी.पी. मेनन ने इस संबंध में बात करते हुए मुम्बई में एक रोटरी मीटिंग में बताया ‘‘उनकी सीट खाली देखकर मैं भी 5 मिनट बाद चलता बना।’’ लगता है कि पटेल और मेनन की इस कार्रवाई से नेहरू अपने लापरवाही भरे रवैये और पुलिस कार्रवाई के विरोध के रुख को त्यागने को मजबूर हुए। बाद में गवर्नर जनरल (राज गोपालाचारी), प्रधानमंत्री, गृहमंत्री (पटेल) एवं गृह मंत्रालय के सचिव (मेनन) की उपस्थिति वाली मीटिंग में हैदराबाद में सेना भेजने का फैसला हुआ।’’

पटेल को नेहरू के असमंजस का सामना अभी और भी करना था। भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल राय बूचर ने नेहरू को इस बात के लिए राजी किया कि ‘‘अभियान बेशक अंतिम पड़ाव पर है लेकिन पूरे देश की आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर इसे सैन्य दृष्टि से खतरनाक और जोखिम भरा माना जाना चाहिए।’’ 12 सितम्बर को लगभग आधी रात के करीब जब वह नेहरू से बात कर चुका था तो बूचर ने ‘अकल्पनीय कारनामा’ करते हुए पटेल को नींद से जगा दिया और उन्हें सलाह दी कि सैन्य कार्रवाई कम से कम स्थगित ही कर दी जाए क्योंकि बम्बई और अहमदाबाद पर हवाई हमला हो सकता है। इस पर पटेल ने बूचर को याद दिलाया कि ‘‘किस प्रकार महायुद्ध के दौरान लंदन को भारी नुक्सान झेलना पड़ा था और ठंडे मन से उन्हें विश्वास दिलाया कि जब ऐसा हमला होगा, अहमदाबाद और बम्बई अपनी रक्षा कर सकते हैं।’’

के.एम. मुंशी लिखते हैं कि जनरल बूचर ‘‘सदा झिझक दिखाते रहे। वह हैदराबाद की सेना की क्षमता को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर और अपनी खुद की सेना को बहुत कम करके आंकते थे एवं सरदार पटेल की आंतरिक अमन-कानून की समस्याओं से निपटने की क्षमता से अनभिज्ञ थे। अधिकतर अंग्रेजों की तरह वह भी यह एहसास करने में असफल रहे कि भारत के अस्तित्व को चुनौती देने वाले रजाकारों को खत्म करने के लिए कोई भी कीमत बड़ी नहीं है।’’ एच.वी.आर.आयंगर का मत है कि ‘‘किसी दिन इतिहास अपना फैसला सुनाएगा कि सरदार पटेल ही सही थे।’’ बाद में नेहरू ने भी पूरे मन से इस फैसले से सहमति व्यक्त की।

भारतीय सेना 13 सितम्बर को मार्च करती हुई हैदराबाद में दाखिल हुई। ‘आप्रेशन पोलो’ नामक यह अभियान केवल 108 घंटों में सम्पन्न हो गया था। इस कार्रवाई के दौरान विशालाकार भारत में एक भी साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। हैदराबाद को इतनी तेजी से मुक्त कराने के अभियान की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई और देश भर से भारत सरकार को प्रशंसात्मक संदेशों व बधाइयों की बाढ़ आ गई।

Posted By : Editor in Chief
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