एक 'खोजी' पत्रकार का हश्र अब जब पोल खुल ही रही है तहलका की, क्यों न मैं एक-दो और खोल दूं

अब जब पोल खुल ही रही है तहलका की, क्यों न मैं एक-दो और खोल दूं आपके लिए। ऐसा करने से पहले यह कहना जरूरी है कि मुझे बेहद खुशी हुई है कि तहलका की पोल खुलने से, क्योंकि कई वर्षों से मालूम था मुझे कि इस तथाकथित खोजी पत्रिका के पन्नों में छिपे हैं कई शर्मनाक राज छिपे इसलिए रहे थे ये राज, क्योंकि हम पत्रकार अपनों पर कीचड़ उछालने से कतराते हैं, और इसलिए भी कि तरुण तेजपाल माहिर थे अपना ढिंढोरा पीटने में। इतने माहिर, कि खूब चतुराई से अपने आप को एक ईमानदार खोजी पत्रकार के रूप में पेश करते रहे हैं, जबकि सच कुछ और था शुरू से। सच यह था कि वह कांग्रेस पार्टी के अघोषित प्रचारक थे, और शायद यही कारण था कि उन्होंने रक्षा सौदों पर वह स्टिंग ऑपरेशन किया, जिससे गहरी चोट पहुंची थी वाजपेयी सरकार को उससे भी ज्यादा चोट पहुंची भारतीय सेना को, क्योंकि उस स्टिंग ऑपरेशन के बाद वर्षों तक बुरी तरह अटक गई सेना के लिए आधुनिक हथियारों की खरीदारी। रक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि ऐसा होने से भारतीय सेना की तैयारी कोई दस साल पीछे हो गई है।
सवाल यह उठता है अब कि क्या तहलका का वह पहला स्टिंग ऑपरेशन जायज पत्रकारिता का उदाहरण था या वाजपेयी सरकार को बदनाम करने का सोचा-समझा षड्यंत्र। ध्यान में रखिए कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद तहलका ने रक्षा सौदे में जरा-सी भी दिलचस्पी नहीं दिखाई है, और न ही उस जोश से सोनिया-मनमोहन सरकार के अन्य घोटालों पर ध्यान दिया है।
कांग्रेस की सरकार जब 2004 में बनी, तब तेजपाल ने सोनिया गांधी को ऐसा खत लिखा अपनी पत्रिका में, जो उनके सबसे बड़े चमचे भी नहीं लिखते। उन्होंने यहां तक लिखा कि, मैं बेताबी से इंतजार कर रहा हूं उस समय का, जब आप अपनी बेटी को राजनीति में लाएंगी, क्योंकि आपकी बेटी एक चमकता सितारा है। इस खत से ही मालूम हो जाना चाहिए था कि तहलका खोजी पत्रकारिता का माध्यम कम और कांग्रेस का भोंपू ज्यादा है।
हम जो दिल्ली के इस वीआईपी हिस्से में रहते हैं, पहले से जान गए थे इस बात को, और यह भी जान गए थे कि श्री तेजपाल चतुर व्यापारी ज्यादा हैं। पर हमें भी नहीं मालूम था कि उनके गोवा और नैनीताल में आलीशान होटल हैं और स्वर्गीय पोंटी चड्ढा जैसे दागी उद्योगपतियों से करीबी रिश्ता था। हमको भी नहीं मालूम था कि तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी के पास कितना पैसा था। धीरे-धीरे अब इनके बारे में सब कुछ मालूम हो जाएगा, लेकिन जिन लोगों के साथ तहलका ने अपनी झूठी खोजी पत्रकारिता से अन्याय किया, उनको कभी न्याय नहीं मिलेगा।
आश्चर्य होगा आपको यह जानकर कि तहलका ने ऐसे कई लोगों को निशाना बनाया, जिन्हें कांग्रेस अपना विरोधी मानती है। इनमें राजनेता हैं, उद्योगपति हैं, और अन्ना हजारे भी थे। याद कीजिए कि आम आदमी का दुखड़ा रोने वाली इस पत्रिका ने डटकर विरोध किया था अन्ना हजारे के आंदोलन का। उसी दौरान मुझे मिली थी शोमा चौधरी और ताज्जुब हुआ कि वह इस आंदोलन का विरोध क्यों कर रही थी। थोड़ी-सी तहकीकात करने के बाद समझ में आया कि तहलका की यह महिला संपादक भी तेजपाल की तरह कांग्रेस की प्रचारक हैं। लेकिन यह नहीं मालूम था पिछले सप्ताह तक कि वह तेजपाल की इतनी बड़ी समर्थक थीं कि उनको बचाने के लिए खुद की आलोचना सुनने को तैयार थीं।
अच्छा हुआ है कि इस झूठी खोजी पत्रिका का किस्सा अब खत्म होता दिख रहा है, लेकिन खत्म होने से पहले जरूरी है कि तहलका में निवेश करने वालों की तहकीकात की जाए। कहां से आया श्री तेजपाल के पास इतना पैसा? कौन हैं वह मंत्री, जिनके साथ उनकी इतनी दोस्ती रही कि सुषमा स्वराज ने इल्जाम लगाया है कि वह तेजपाल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं?
ये सवाल जरूरी हो गए हैं, क्योंकि लुटियन्स की दिल्ली में यह अफवाह है कि तरुण तेजपाल किसी बहुत बड़े राजनेता के नाजायज धन को जायज करने का काम कर रहे थे। यही कारण था, लोग कहते हैं, कि तरुण तेजपाल इतनी ऊंचाइयों में घूम रहे थे कि उनका रिश्ता धरती से टूट गया था। ऐसा न हुआ होता, तो क्या वह करते अपनी बेटी की सहेली के साथ ऐसी घिनौनी हरकत, जिसके लिए वह अब लंबी सजा भुगतने वाले हैं?

Posted By : Crime Review
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