चुनाव परिणाम बादशाहत के अहंकार पर चोट

{CEIME REVIEW}: ये चुनाव केवल सरकार बनाने के नहीं बल्कि भारत का भाग्य बदलने वाले साबित हो सकते हैं। भारत के इतिहास में पहली बार सारे देश में एक महानायक सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता के रूप में उभरे हैं, इस तथ्य को विपक्षी भी स्वीकार करते हैं। कोई स्मरण करे कि 1950 से 2013 तक ऐसा कौन-सा एक नेता हुआ जिसे सुनने के लिए केरल से कश्मीर और पूर्व से पश्चिम तक असाधारण और अद्भुत संख्या में न सिर्फ भीड़ जुटी हो बल्कि तमाम चैनल भी उनकी हर रैली और कालेजों-विश्वविद्यालयों में दिए जाने वाले भाषणों का सीधा प्रसारण करना अपनी टी.आर.पी. रेटिंग बढ़ाने के लिए जरूरी मानते हों? एक ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम से भारत गुजर रहा है जिसे राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठते हुए परिपक्वता से देखने की जरूरत है।
अब 2014 का कठिन सफर तय करने की तैयारी का वक्त है। भूख, भय और भ्रष्टाचार से मुक्ति का ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका, मीडिया तथा शासन व्यवस्था में टूट रहे भरोसे को फिर से जिंदा करने का मौका होगा 2014 का लोकसभा चुनाव परन्तु क्या हमारे नेता वास्तव में भारतभाग्य विधाता बनने के लिए आवश्यक, जनता से आत्मीयता और व्यवहार में विनम्रता को अपनाने के लिए तैयारहैं ?
विजय के बाद विनम्रता दुर्लभ होती है। भाषा में संयम, सामान्य जनता के साथ ईमानदारी का अपनापन बड़प्पन देता है और जीतने के बाद परास्त नेताओं पर कटु शब्दों में चोट करना तथा अपनी शेखी बघारना छोटापन दिखाता है। दिल्ली में शीला दीक्षित हारीं, यह सच है लेकिन सच यह भी है कि वह पिछले 3 चुनाव लगातार जीती थीं। जब जनता ने उनकी सरकार के काम और व्यवहार को पसन्द नहीं किया तो उनके सामने जो विकल्प दिखा उसको वोट दे दिया। शीला जी की पराजय वास्तव में भ्रष्टाचार और कुशासन के साथ-साथ कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व और सामूहिकता पर भी चोट है। जिस महिला नेता ने 15 साल लगातार दिल्ली जैसे कठिन और जटिल राजनीति वाले क्षेत्र में कांग्रेस को निरंतर जीत दिलाई, उनको न तो चुनाव प्रचार में मदद दी गई और न ही इतना सम्मान दिया गया कि आपने लगातार 3 बार राजधानी में कांग्रेस जिताई।
लोकतंत्र में जीत और हार का क्रम चलता रहता है, लेकिन अहंकार और धन कुबेरों को अंतत: परास्त होना पड़ता है। भारत का ऐसा कौन-सा राष्ट्रीय नेता है जो कभी न कभी लोकतांत्रिक उतार-चढ़ाव में हारा न हो, वह चाहे इंदिरा गांधी थीं या अटल बिहारी वाजपेयी। खड़े होने की शक्ति और समझदारी होनी चाहिए। जो आज जीते हैं वे पराजित पार्टियों को समाप्त हुआ न समझें। कांग्रेस में भीषण पराजय के बाद भी किसी न किसी तरीके की खोज करके उठने की ताकत रहती है। एक समय था जब नारायण दत्त तिवारी, शरद पवार, पी. संगमा और प्रणव मुखर्जी जैसे दिग्गज तथा कांग्रेस के स्तंभ कहे जाने वाले नेता कांग्रेस छोड़कर चले गए लेकिन नतीजा क्या हुआ? उन सबको या तो वापस लौटना पड़ा या शरद पवार की तरह कांग्रेस से हाथ मिलाना पड़ा।
निश्चित रूप से इस चुनाव में 7वें आसमान पर अहंकार तथा अपने संगठन और कार्यकर्त्ताओं के प्रति तिरस्कार के साथ धन की भाषा में व्यवहार करने वाली कांग्रेस को सबक मिला है और चारों राज्यों में एक ही संदेश सामने आया है कि कुछ भी चलेगा, सिवाय कांग्रेस के। क्या इससे सभी पार्टियों के राजनेता सबक लेंगे? राजनेताओं का व्यवहार धन, जाति तथा वोट बैंक में फायदा और नुक्सान पहुंचाने के गणित से निर्धारित होता है। क्या वजह है कि किसी भी राजनेता का कोई मध्यमवर्गीय मित्र या लंबी दूरी साथ-साथ तय करने वाले तथा उनकी आलोचना करने के बावजूद मित्र बने रहने वाले होते ही नहीं? जब ये राजनेता सड़कों पर तीव्र रफ्तार वाली गाडिय़ों में चलते हैं तो चारों ओर यही लगता है कि बादशाह सलामत जा रहे हैं। जब ये किसी की नमस्ते या प्रणाम का जवाब देते हैं तो इनका चेहरा देखने लायक होता है- भौंहें तनी हुईं, माथा हल्का-सा दाएं-बाएं घुमाएंगे और उसको ही अगर आप जवाब मान लेंगे तो समझ लीजिए आपका जीवन धन्य हो गया।
अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को लाख आलोचना का शिकार बना लीजिए लेकिन उन्होंने ठहरे हुए, काई जमे गंदे पानी में कंकर फैंका है और ठहराव को डिस्टर्ब किया है। चुनाव से पहले सोशल मीडिया पर खूब कठोर और अभद्र शब्दों के वार चले। चलिए उनको भी सच मान लें लेकिन इस सच का आप कैसे सामना करेंगे कि जिस पार्टी ने जन्मते ही पहला चुनाव लड़ा वह भी भारत की राजधानी दिल्ली में, वह भी आमतौर पर बिना रैली, पोस्टर, बिना करोड़ों रुपए प्रचार में खर्च किए, कम से कम ताम-झाम और शानदार सभाओं से 28 सीटों पर जीत गई?
यह इस बात को सिद्ध करता है कि अच्छाई और सादगी का कोई विकल्प नहीं। पांव छुआने वाले, बोरियों में पैसा इकट्ठा कर एयरपोर्ट से सर्किट हाऊस और सर्किट हाऊस से प्रैस कांफ्रैंस और मीडिया मैनेजमैंट के धुरंधर विशेषज्ञों को बगल में दबाए अगले महानगर की ओर प्रस्थान कर भारी-भरकम फौज और लाव-लश्कर वाले महान नेता कभी अपने कार्यकत्र्ता या आम नागरिक से बात करने का समय नहीं निकाल पाते हैं। कामकाज का यह तरीका बदलना ही होगा।
प्रगति, विकास तथा सन् 2013 की टैक्नोलॉजी के साथ कदम से कदम मिलाते हुए चलना वक्त की जरूरत है। विज्ञान और सोशल मीडिया आज सामाजिक परिवर्तन के उपकरण बने हुए हैं। दुनिया की सर्वाधिक बड़ी युवा जनसंख्या वाला हिन्दुस्तान भी बदलना चाहता है। राष्ट्रीय स्तर पर असंदिग्ध रूप से नरेन्द्र भाई मोदी इस परिवर्तन के सबसे बड़े सूत्रधार बनकर उभरे हैं।

Posted By : CEIME REVIEW
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