इतिहास का सबसे काला अध्याय : 15वीं लोकसभा का पतन

{HEMANT KUMAR MISHRA}: 15वीं लोकसभा का हाल ही में अवसान हुआ है और उसके अवसान गीत को किस प्रकार आरंभ किया जाए। यह भारत के लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। इस लोकसभा के दौरान सदन में बार-बार तीखी नोक-झोंक, व्यवधान, शोर-शराबा और यहां तक कि हाथापाई की नौबत देखने को मिली जिसने गत 5 वर्षों में लोकसभा को पंगु बनाकर रख दिया। इस लोकसभा को गलत कारणों से याद किया जाएगा। इस लोकसभा ने सत्ता की राजनीति के विकृत चेहरे को उजागर किया है और यह बताया है कि यह सत्ता की राजनीति कितनी गिर गई है।
इस तथ्य पर पिछले सप्ताह संसद के दोनों सदनों में तेलंगाना राज्य विधेयक को पारित करने के दौरान की गई कार्रवाई पर्याप्त प्रकाश डालती है, जिस दौरान न केवल राजनीतिक बढ़त के लिए संवैधानिक प्रक्रिया को पलटा गया अपितु दोनों सदनों को अखाड़े के रूप में बदलते भी देखा गया। सांसदों को एक-दूसरे पर हमला करते पाया गया। माइक्रोफोन उखाड़ते हुए देखा गया। महासचिव की मेज के शीशे को तोड़ते पाया गया और अध्यक्ष महोदया से कागज छीनते देखा गया। यही नहीं, उसके बाद एक सांसद ने अपने सहयोगियों पर मिर्च स्प्रे किया और एक अन्य सांसद ने कथित रूप से चाकू दिखाया।
दादागिरी की राजनीति 15वीं लोकसभा का मुख्य आधार बना। लोकसभा की कार्रवाई के दौरान प्रतिदिन अव्यवस्था तथा शोरगुल देखने को मिला और सांसदों को एक-दूसरे पर तीखे हमले करते देखा गया। विधायी कागजों को छीना गया, फाड़ा गया, माइकों को उखाड़ा गया तथा छोटी-छोटी बात पर सभागृह के बीच तक आए और इन सबको देखकर लगता है कि संसद के सफल सत्र का आधार ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ बन गया है। राज्यसभा में पिछले वर्ष तब अशोभनीय घटना घटी जब सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान करने वाला संविधान का117वां संशोधन विधेयक पेश करते समय हाथापाई देखने को मिली।
यह होना ही था। इसके लक्षण पहले से ही दिखाई दे रहे थे। वर्ष 2012 में शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन राज्यसभा में मध्य रात्रि को हुए नाटक को कौन भूल सकता है जब राजद के एक सांसद ने सदन के नेता से लोकपाल विधेयक को छीन लिया था और इस विधेयक को सदन में मतदान के लिए रखने से पूर्व इसे फाड़ दिया गया था। सी.डब्ल्यू.जी., 2-जी स्पैक्ट्रम, कोलगेट से लेकर के.जी. 6 बेसिन गैस जैसे घोटालों ने प्रत्येक वर्ष संसद के सत्रों में बाधा डाली।
2010 के शीतकालीन सत्र के दौरान 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले के कारण एक दिन भी सदन की कार्रवाई नहीं चल पाई। विपक्ष की मांग थी कि इस घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाए। इस मुद्दे पर विपक्ष और यू.पी.ए.-2 के बीच 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले के कारण राजकोष को हुए नुक्सान पर मतभेद था किंतु दोनों पक्षों ने इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं की कि संसद में इस गतिरोध के कारण उन्होंने 200 करोड़ रुपए की बर्बादी की क्योंकि संसद की एक मिनट की कार्रवाई पर 26 हजार रुपए खर्च होते हैं और 25 दिन के इस सत्र में संसद एक दिन भी कार्य नहीं कर पाई थी।
किसी को भी इस बात पर पश्चाताप नहीं है कि एक माह चले सत्र में लोकसभा ने अपने समय का 80 प्रतिशत और राज्यसभा ने 72 प्रतिशत समय शोरगुल के कारण बर्बाद किया तथा 32 लंबित विधेयकों में से केवल 4 को पारित कराया जा सका और ये विधेयक भी बिना चर्चा के पारित कराए गए। 2011 में भी 1.86 लाख करोड़ रुपए के कोयला घोटाले के चलते मानसून सत्र के दौरान संसद की कार्रवाई एक दिन भी नहीं चल पाई। फिर भी हमारे सम्मानीय सांसद कहते हैं कि वे संसदीय लोकतंत्र के सर्वोत्तम सिद्धांतों का पालन कर रहे हैं। गत 5 वर्षों में लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता गया। कोई भी दिन ऐसा नहीं बीता जब लोकसभा में किसी न किसी मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच रस्साकशी न हुई हो।
फलत: 2009 से 2014 तक 15वीं लोकसभा की केवल 345 बैठकें हुईं और इसने 1331 घंटे कार्य किया जिसके कारण विधायी कार्य बहुत प्रभावित हुआ। पिछले 5 वर्षों में सरकार केवल 165 विधेयक पारित करा पाई और 126 विधेयक लंबित रह गए, जबकि 1952 से 1967 के बीच 3 लोकसभाओं की औसतन 600 बैठकें हुईं और उनकी कार्रवाई औसतन 3700 घंटे चली। इस लोकसभा में 723.7 घंटे व्यवधान के कारण बर्बाद हुए जिनमें प्रश्नकाल का 40 प्रतिशत समय भी शामिल है जिसके कारण संसद के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व कम हुआ। 2010 में 440 तारांकित प्रश्नों में से केवल 73 अर्थात 16.5 प्रतिशत, 2011 में 300 में से केवल 47 अर्थात 15.6 प्रतिशत और 2012 में 3099 में से 11 अर्थात केवल 12.4 प्रतिशत तारांकित प्रश्नों को मौखिक उत्तर के लिए लिया गया।
वस्तुत: 15वीं लोकसभा कार्य न करने के लिए याद की जाएगी। यह लोकसभा कानूनों को पास करने में सक्षम नहीं रही। पिछले शीतकालीन सत्र के दौरान 31 विधेयक पारित करने के लिए सूचीबद्ध थे जिनमें से केवल एक लोकपाल विधेयक पारित किया जा सका और इस सत्र के दौरान सभा की बैठकों के केवल 63 प्रतिशत समय का उपयोग किया जा सका जिसमें से केवल 20 प्रतिशत का उपयोग विधायी कार्य पर खर्च किया गया।
दुखद तथ्य यह है कि हम लोग आकार और प्रकार को लेकर संतुष्ट हो गए हैं, न कि विषय सार को लेकर जिसके कारण लगता है कि संसद की सर्वोच्चता का स्थान गलियों के शोर ने ले लिया है इसलिए इस गिरती राजनीतिक संस्कृति और मूल्यों के चलते राजनीति पर संसदीय कार्रवाई का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा है। 15वीं लोकसभा में संसदीय लोकतंत्र पर किए गए आघातों की कहानी बहुत लंबी है और यह बताता है कि हम धीरे-धीरे विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। सबसे दुखद स्थिति यह है कि इस स्थिति से हमारे नेतागण चिंतित नहीं हैं। वे इसी मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैंं तथा उन्हें इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं है कि उन्होंने किस प्रकार संसद को क्षत-विक्षत कर दिया है। इससे भी ङ्क्षचताजनक बात यह है कि इन सांसदों में शर्म या पश्चाताप की कोई भावना नहीं है। इसी के चलते हमारे जनसेवकों के प्रति लोगों का मोह भंग हो रहा है।
अब चुनाव निकट आ रहे हैं और चुनावों में जाने से पहले हमारे नेतागणों को इस बात को ध्यान में रखना होगा कि संसद सदस्य बनना अपने आप में एक साध्य नहीं है। इसके साथ ही संसद की संप्रभुता, पारदर्शितापूर्वक कार्य करना और व्यवस्था में जवाबदेही लाना भी जुड़े हुए हैं इसलिए 15वीं लोकसभा को संसदीय शिष्टाचार और कार्यकरण के बारे में ऐसे मामलों के संबंध में एक सबक होना चाहिए कि संसद सदस्यों को सदन में क्या नहीं करना चाहिए।
अगली सरकार महत्वपूर्ण विधेयकों को फिर से पेश कर उन्हें पारित करवा सकती है किंतु हमारे संसद सदस्यों के लिए दलगत और पक्षपातपूर्ण राजनीति से ऊपर उठना और विधेयकों तथा राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर रचनात्मक वाद-विवाद करने की चुनौती होगी। क्या वे संसद को पतन के भार में डूबने की अनुमति देंगे? यह आवश्यक है कि हमारे नए सांसद तर्कों पर ध्यान दें और इससे पूर्व कि लोग उनका उपहास बनाएं, वे हमारे संसदीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए कदम उठाएं।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA [EDITOR IN CHIEF]
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