तो क्या मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे?


मैं जानता हूं कि कितने जोखिम के साथ मैंने यह शीर्षक लिखा है। इसे पढ़कर हो सकता है, कुछ लोग मेरी मानसिक दशा का परीक्षण करने को तैयार हो जाएं! मेरे विवेक पर सवाल उठाए जाएं। बहुत संभव है कि लोग मुझ अदना पत्रकार के खिलाफ कोई मुहिम ही छेड़ दें। यह भी हो सकता है कि कुछ लोग मेरे इस पत्रकारिता पर सवाल उठाए जाएं।

मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं कोई भविष्यवक्ता नहीं हूं। मैं कोई राजनीतिक पंडित भी नहीं हूं और न ही चुनाव विश्लेषक। मगर ऐसे समय जब तमाम टीवी चैनलों, से लेकर गांव-मोहल्ले तक के पत्रकार इस राजनीतिक शगल में डूबे हुए हैं, तो इस लोकतंत्र में इतना हक तो मेरा भी बनता है कि मैं भी बहती गंगा में हाथ धो लूं। वैसे भी इस देश में चुनाव और सियासत से बड़ा कोई शगल भी तो नहीं है।

यदि मैं अपनी स्मृति को टटोलूं तो मेरे जेहन में भारतीय राजनीति के जो पहले दृश्य दर्ज हैं, वे 1977 के आम चुनाव से जुड़े हैं। उस वक्त मैं छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बानुमा गांव कसडोल में छठी कक्षा में पढ़ता था। मेरे पिता वहां हायर सेकंड्री स्कूल में लेक्चरर थे। देश का माहौल बदल रहा था, लेकिन उस कच्ची उम्र में बहुत कुछ समझ में नहीं आता था।

वह ऐसा ही मार्च का महीना था और उस गांव तक में जो नारे लग रहे थे, वह मेरे जेहन में आज भी जिंदा हैं…. खा गई शक्कर, पी गई तेल, लाठी-गोली सेंट्रल जेल, खत्म है इंदिरा तेरा खेल। उस वक्त इंदिरा गांधी का जो चेहरा बन रहा था, वह कुछ ऐसी महिला का था, जिसने सब कुछ बर्बाद कर दिया। एक ऐसी महिला, जिससे सब डरते हैं। संजय गांधी का नाम भी इस सिलसिले में लिया जाता था।

मेरे चाचा विद्याभूषण ठाकुर भी उन दिनों जेल में थे। बाद में मैं ठीक से जान सका कि वह किसी जरायम पेशे में होने के कारण नहीं, बल्कि इन्हीं इंदिरा गांधी की नीतियों का विरोध करने के कारण आपातकाल में जेल में थे। ऐसे में सरकारी स्कूल में मेरे शिक्षक पिता का इंदिरा विरोधी होना बहुत स्वाभाविक ही था। घर में ऐसा मौहाल था मानो इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री नहीं कोई निरंकुश शासक हैं।

उन दिनों उस गांव तक टीवी तो पहुंचा ही नहीं था। इंटरनेट का सवाल ही नहीं। उस गांव तक पहुंचने के लिए तकरीबन तीन किमी दूर स्थित महानदी को पार करना होता था। तब वहां पुल नहीं बना था। लिहाजा रायपुर से अखबार भी दूसरे दिन ही पहुंच पाते थे। कुल मिलाकर बाहरी दुनिया के बारे में रेडियो से ही जानकारी मिल सकती थी। उन्हीं दिनों सुनी गईं विनोद कश्यप, रामानुज प्रसाद सिंह और देवकीनंदन पांडेय की आवाजें आज भी मेरे कानों में अनायास गूंज उठती हैं।

मेरे पिता के पास एक रेडियो था, जिसमें वह रोज सुबह आठ बजे और शाम को 8.45 पर आकाशवाणी से समाचार सुनते थे। मगर उन दिनों वे देर रात तक रेडियो सुनते रहते थे। परीक्षाएं खत्म हो गई थीं, इसलिए हम लोगों के भी देर तक जगने की कोई मनाही नहीं थी।

वह रात कुछ अधिक लंबी थी। लोकसभा चुनावों के नतीजे आने लगे थे। रेडियो पर हर घंटे में समाचार। रात के ढाई-तीन बजे होंगे, रेडियो पर आवाज आई, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चुनाव हार गई हैं। उन्हें राजनारायण ने पराजित किया था। इस खबर को सुनने के बाद मेरे पिता के चेहरे पर जो चमक आई थी, वह मैं आज तक नहीं भूल सका।

उसके बाद और चुनाव होते रहे। चाचा भी बाद में विधायक बन गए। उम्र बढ़ने के साथ-साथ राजनीति और चुनावों को नजदीक से देखता रहा। असल में 1977 का वह चुनाव राजनीतिक समझ के लिहाज से मेरे लिए नर्सरी जैसा है। भारतीय राजनीति और चुनावों के लिहाज से यह मील का पत्थर है, क्योंकि इन चुनावों के बाद ही देश में पहली बार कोई गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी।

इस चुनाव ने दिखाया कि इस देश के लोकतंत्र में यह ताकत है कि वह किसी भी निरंकुश सत्ता को उखाड़ फेंकती है। इंदिरा गांधी किसी भी सत्ता से बड़ी नजर आने लगी थीं, लेकिन भारतीय लोकतंत्र ने उन्हें जमीन दिखा दी।

1977 के बाद जो भी चुनाव हुए जाने अनजाने जनता पार्टी की उस ऐतिहासक जीत का जिक्र आता रहा है। भाजपा ने चुनावों में ही नहीं, बल्कि जब कभी उसे मौका मिला कांग्रेस पर आपातकाल के बहाने ही हमले किए हैं।

बेशक, आज 1977 जैसा माहौल तो है। दस वर्ष की सत्ता के दौरान कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार पर उस तरह के आरोप नहीं है, जैसे आरोप इंदिरा गांधी के खिलाफ थे। मगर जाने क्यों 1977 का चुनाव याद आ रहा है। जी हां, नरेंद्र मोदी की वजह से। उनकी छवि जैसी निर्मित की जा रही है, वह कुछ ऐसी है कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में सब कुछ ठीक हो जाएगा। भ्रष्टाचार, महंगाई और घोटाले सब खत्म हो जाएंगे। सारा देश गुजरात जैसा चमकने लगेगा। विकास की गंगा बहने लगेगी, इत्यादि।

तो फिर इसमें बुरा क्या है? बुरा कुछ नहीं है। 2002 के बाद बनी उनकी छवि को लेकर भी मेरी चिंता नहीं है। आज वह छोटे दलों से लेकर कांग्रेस के रणछोड़ों के लिए सम्मोहक बने हुए हैं। तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों से लेकर जम्मू-कश्मीर की पीडीपी तक।

तमाम चुनावी सर्वेक्षण ऐलान कर ही चुके हैं कि मोदी की अगुवाई में भाजपा इतनी सीटें जीत लेगी जहां से उसे सत्ता तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। पिछले हफ्ते भाजपा के एक सांसद से मेरी मुलाकात हुई। उनका आकलन भी था कि मोदी सरकार बना लेंगे।

मैंने उनसे कहा कि मान लीजिए कि भाजपा चुनाव जीत जाती है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं, उसके बाद क्या होगा। उनका जवाब था उसके बाद पार्टी में मोदी का कद और ऊंचा हो जाएगा। मैंने कहा, उसके बाद तो राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज वगैरह तो कहीं गिनती में नहीं होंगे। मुझे तो लगता है कि अमित शाह का कद भी इन नेताओं से बड़ा हो जाएगा। सांसद महोदय मेरी इस बात से सहमत थे।

तब मैंने उनसे कहा कि दरअसल भाजपा की मुश्किल यहीं से शुरू होती है कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो क्या होगा? भाजपा के आम कार्यकर्ता आज बेशक मोदी के अलावा किसी और को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। संघ भी मोदी के अलावा कोई और मंत्र नहीं पढ़ना चाहता। आडवाणी, जोशी और जसवंत सिंह जैसे दिग्गजों की बात छोड़ भी दें तो पार्टी की दूसरी पांत के कई नेता शायद उस मोदी को बर्दाश्त न करें, जिनका कद पार्टी और संघ से बड़ा हो जाए! 1977 में इंदिरा इसलिए हारीं क्योंकि उनकी पार्टी ने कहना शुरू कर दिया था कि इंदिरा इज इंडिया!

मोदी चाहें तो 1977 से सबक ले सकते हैं। वह उन आडवाणी से सलाह ले सकते हैं, जिन्होंने आपातकाल के दौर में 1975 में सबसे पहले उनमें संभावनाएं देखी थीं। यह मोदी को सोचना है कि क्या वह ये संभावनाएं बनाए रखेंगे। उन्हें जितनी चुनौती बाहर से है, उससे कहीं अधिक पार्टी के भीतर से।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA [ EDITOR IN CHIEF ]
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