शुक्र है, सुप्रीम कोर्ट है!

वर्षों तक हम लोग क्रिकेट के लिए पागल रहे। मुझे अच्छी तरह याद है कि कैसे बचपन के दिनों में हम सुबह चार बजे उठकर कई बार मैच देखा करते थे। पूरे दिन की प्लानिंग मैच के हिसाब से की जाती थी। पूरे हफ्ते की प्लानिंग क्रिकेट सीरिज के हिसाब से करते थे हम लोग। मैच की वजह से कई ज़रूरी काम अटका दिए जाते थे और भारतीय टीम की एक जीत या किसी खिलाड़ी का शतक त्योहार की तरह मनाया जाता था। लेकिन, पत्रकारिता करते हुए जब कई खिलाड़ियों से निजी तौर पर मुलाकातें होने लगीं। क्रिकेट प्रमोटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स से मिलना हुआ तो निराशा होने लगी। मैं यहां सब खिलाड़ियों की बात नहीं कर रहा, लेकिन कइयों से मिलकर निराशा हुई। ऐसा लगने लगा कि इनमें से ज्यादातर लोग खेल के लिए कम और पैसे के लिए ज्यादा आए हैं और खेल व्यापार बन चुका है। मेरा और मेरे जैसे कई लोगों का इस दौर में क्रिकेट से मोहभंग शुरू हुआ और खेल से जुड़े लोगों से बातचीत, मेल, और अलग-अलग जगहों से मिली प्रतिक्रिया के आधार पर मोहभंग और ज्यादा हुआ। महसूस हुआ कि कई बार जो होता है, वो दिखता नहीं। कई मैच देखकर शक भी होता था।
इस बीच कई बार लगता था कि खेल में गड़बड़ तो है और मौका मिलेगा तो खुलासा ज़रूर करेंगे। मौका मिला तो हमने ज़ी न्यूज़ पर एक्सपोज़ किया भी। हमने विन्दू दारा सिंह और पूर्व आईपीएस अधिकारी संपत कुमार का स्टिंग ऑपरेशन किया। वजह बनी जस्टिस मुकुल मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट। जस्टिस मुद्गल ने साबित किया कि कोई एक शख्स भी ठान ले कि एक्सपोज करना है तो इसके लिए सैकड़ों पुलिसवालों की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ एक शख्स अच्छी नीयत से बड़ा काम कर सकता है। हमने स्टिंग ऑपरेशन किया तो कई जगह से दबाव आए। कहा-मत करो, मत दिखाओ। स्टिंग दिखाने से पहले ही संपत कुमार को सस्पेंड कर दिया गया। स्टिंग ऑपरेशन के बाद जब हमने कई बड़े खिलाड़ियों-अधिकारियों से प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कहा-रिएक्शन नहीं डिफेमेशन का केस मिलेगा।
उस वक्त हमें तय करना था कि स्टिंग ऑपरेशन दिखाना चाहिए या नहीं। हमने तय किया कि हम दिखाएंगे। इसके बाद हमारे ऊपर मानहानि का मुकदमा भी किया गया। 100 करोड़ का मुकदमा, जो महेन्द्र सिंह धोनी की तरफ से किया गया। इस डिफेमेशन में पूरा सिस्टम साथ था। कुछ मुट्ठी भर लोग ऐसे थे, जो हमारी मदद करना चाहते थे, लेकिन वो मदद करने की स्थिति में नहीं थे। और जो मदद कर सकते थे, वो पूरी तरह चुप थे। लेकिन मैं बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव आदित्य वर्मा की तारीफ करना चाहता हूं, जिन्होंने हमसे हमेशा कहा कि इस लड़ाई को जारी रखना चाहिए।
हां, अपनी लड़ाई के दौरान हमें इस बात का अहसास फिर हुआ कि शुक्र है सुप्रीम कोर्ट है। सुप्रीम कोर्ट ने क्रिकेट में गंदगी का वो नज़ारा देखा और इसे साफ करने का बीड़ा उठाया, जो कई बड़े लोग और कई सरकारें देखकर भी नहीं देख रही थीं। उन्होंने आंखों पर पट्टी बांध रखी थी। सवाल है कि बीसीसीआई में नरेंद्र मोदी भी बैठते हैं गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष की हैसियत से। नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ, वंशवाद के खिलाफ, परिवारवाद के खिलाफ जमकर बोलते हैं लेकिन क्रिकेट की सफाई को लेकर उनका एक बयान तक सामने नहीं आया। कांग्रेस की तरफ से राजीव शुक्ला ने कुछ नहीं कहा। अरुण जेटली जाने-माने वकील हैं, दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन से जुड़े रहे हैं लेकिन उन्हें भी बीसीसीआई का गोरखधंधा नहीं दिखायी दिया। आखिर क्यों?
मुझे निजी तौर पर इस प्रकरण में दो लोगों ने बहुत निराश किया। नरेंद्र मोदी और महेन्द्र सिंह धोनी। मोदी इस वक्त डबल रोल में हैं। बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष। लेकिन, वो इस पूरे मुद्दे पर खामोश रहे। वो क्रिकेट की गंदगी के खिलाफ बोलते तो उनका कद और बढ़ा होता। महेन्द्र सिंह धोनी तो ट्रिपल रोल में हैं। भारतीय टीम के कप्तान। चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान और इंडिया सीमेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट। लेकिन, धोनी इंडिया सीमेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट की तरह ही काम करते दिखे, जैसा हरीश साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट में कहा। हरीश साल्वे ने कहा कि धोनी ने झूठ बोला। मेरा मानना है कि धोनी सचिन के बाद भारतीय क्रिकेट के दूसरे सबसे बड़े खिलाड़ी हैं, और वो अपनी ‘आइकोनिक इमेज’ बचाने में नाकाम रहे। उनके सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी, जिसकी वजह से उन्हें झूठ बोलना पड़े। वह टीम में जगह बनाने को प्रयासरत कोई संघर्षशील खिलाड़ी नहीं हैं। वह भारतीय टीम के कप्तान हैं और बेहद मजबूत कप्तान हैं। बावजूद इसके वो श्रीनिवासन जैसे इंसान के चंगुल में फंस गए। सवाल यह भी कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों होने दिया?
सच बात यही है कि अब बीसीसीआई से श्रीनिवासन के जाने से कुछ नहीं होगा। उनकी इतने दिनों तक मनमानी के लिए बीसीसीआई में बैठे बाकी लोग भी जिम्मेदार हैं। आज जब लोग चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाएं, परिवारवाद का मुद्दा उठाएं तो आप यह भी सोचिए कि इन्होंने भारत में धर्म की तरह देखे जाने वाले क्रिकेट के खेल में पसरी गंदगी को लेकर क्या बोला। दुख की बात है कि अलग-अलग विचारधारा होने के बावजूद सारे पदाधिकारी बीसीसीआई के एसी रूम में एक हो जाते हैं। आज सुप्रीम कोर्ट ने जो कदम उठाया है, वो हमारे लिए बड़ा अवसर है। हम इस अवसर का चाहें तो लाभ उठा सकते हैं, नहीं तो यह अवसर बर्बाद चला जाएगा। यह मौका है अंदर तक क्रिकेट की सफाई करने का। सुप्रीम कोर्ट के दिये मौके को भुनाने से हम चूक गए तो फिर देश में क्रिकेट का भगवान ही मालिक है..। सच में!

Posted By : EDITOR IN CHIEF CRIME REVIEW
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