नेहरू-गांधी परिवार के बिना भी भारत फले-फूलेगा

(HEMANT KUMAR MISHRA) नरेन्द्र मोदी की ‘फौज’ इतनी तेजी से बढ़ती आ रही है कि कांग्रेस पार्टी के चुनावी दुर्ग को निश्चय ही पैरों तले रौंद देगी। ऐसे में कांग्रेस ने ऐसी दुहाई मचा रखी है जैसे वास्तव में भारत का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया हो और इसे मोदी से बचाने की जरूरत है। कांग्रेस रूपी पुराने और जर्जर दुर्ग के अंदर दुबके हुए इस पार्टी के ‘सेनापति’ भयाक्रांत हैं कि 16 मई को वे खाक में मिल जाएंगे इसीलिए उन्होंने अपने तेजी से भाग रहे ‘सेनानियों’ को एस.ओ.एस. भेजना शुरू कर दिया है कि किसी भी कीमत पर मोदी से अपना अस्तित्व बचाएं। ऐसे में यदि उन्हें लगता है कि अपना बचाव करना भारत का बचाव करने के तुल्य है, तो वे गलत नहीं हैं। नेहरू-गांधी परिवार आज भी इस भ्रम में जी रहा है कि जो इसके लिए उचित है, वही भारत के लिए भी हितकर है। बेशक भारत उस जमाने से बहुत आगे जा चुका है जब इसका भाग्य नेहरू खानदान के भाग्य के साथ ओत-प्रोत था।

प्रियंका वाड्रा (या उसे गांधी कहें) ने रायबरेली और अमेठी के लंबे समय से संकट में फंसे हुए दोनों पारिवारिक दुर्गों में भारत पर छाए संकट के इस विचार को हवा दी है। वह इसके वास्तविक अर्थों को समझे बिना इस भावनात्मक उक्ति का उल्लेख करती हैं। कुछ लोगों के लिए तो 1947 में भारत की परिकल्पना को तोड़-मरोड़ कर अपने अनुकूल ढाल कर ही नेहरू परिवार ने अपनी राजनीतिक सत्ता-यात्रा की शुरूआत की थी और तब से अब तक लगातार अनगिनत मौकों पर न केवल इस पवित्र अवधारणा का दुरुपयोग किया है बल्कि इसे तोड़-मरोड़ कर लहूलुहान कर दिया है। ऐसा करने के पीछे इसका केवल एक ही उद्देश्य था कि किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहना है। नेहरू-गांधी परिवार ने सदा ही खुद को देश से ऊपर रखा है। भारत की परिकल्पना तो उसी दिन लगभग दम तोड़ गई थी, जब प्रियंका की दादी ने संविधान को सिर के बल खड़ा कर दिया था और गणतंत्र की ज्वलंत समस्याओं को दरकिनार करते हुए अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी सुरक्षित कर ली थी।

जो लोग एक मंत्र की तरह भारत के नाम की रट लगाने का दम्भ भरते हैं, उन्हें भारत के 80 करोड़ से अधिक मतदाताओं के विवेक पर विश्वास करना चाहिए। वे निश्चय ही बहुत उत्साह से भारत रूपी परिकल्पना की रक्षा करेंगे। जनमानस के इरादों का सम्मान करने से भारत की परिकल्पना और भी सुदृढ़ होगी। जब चुनावी बिसात पर सारी चालें विफल हो गई हों तो ऐसे में नौटंकियों का सहारा लेना भी काफी सुखद लगता है। वास्तव में चुनाव के मौके पर प्रियंका वाड्रा का यह विचार मोदी को हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाह के रूप में पेश करने के अभिषेक मनु सिंघवी के प्रयास के ही तुल्य है।

इन लोगों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि 10 जनपथ (यानी सोनिया गांधी) के मुंह से निकला एक-एक शब्द सभी कांग्रेसियों के लिए सर्वशक्तिमान फरमान की हैसियत रखता है। बहुत लंबा समय पहले की बात नहीं जब इसी मनु सिंघवी ने पूरी गंभीरता से राहुल गांधी को ‘जन्मजात नेता’ कह कर उनका गुणगान किया था। हां, वह निश्चय ही जन्मजात नेता हैं! जहां तक मुसोलिनी और हिटलर की बात है, तो भारत में यदि कोई नेता उनसे सबसे अधिक मेल खाता है तो वह है इंदिरा गांधी।

2007 में जब उमा भारती को अपमानजनक ढंग से भाजपा से बाहर कर दिया गया तो उन्होंने नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध भी बहुत उल्टी-सीधी बातें कहीं। कांग्रेस ने उमा की इन टिप्पणियों पर आधारित फिल्म तैयार करने के लिए उपरोक्त मनु सिंघवी को ही जिम्मेदारी सौंपी। उमा की कटु टिप्पणियां पेश करते हुए कांग्रेस नेतृत्व को यह बात याद नहीं आई कि उसने प्रवीण तोगडिय़ा और उन जैसे अन्य कट्टर हिन्दुवादी नेताओं की जोरदार वकालत की थी और इनको हाशिए पर धकेलने के लिए मोदी की आलोचना की थी। कांग्रेस को जरा संजय निरूपम की उन टिप्पणियों पर भी गौर फरमाना चाहिए, जो उन्होंने शिवसेना नेता होते हुए सोनिया गांधी के बारे में की थीं और सदा यह याद रखना चाहिए कि तर्क दो धारी तलवार है। जहां तक भारत का सवाल है यह नेहरू-गांधी परिवार के बिना भी फलता-फूलता रहेगा।

जो हरियाणा में सही, वह पंजाब में गलत क्यों
दोहरे मापदंड अपनाना कांग्रेस की आदत ही बन चुकी है। हरियाणा में एक दशक पूर्व कांग्रेस सरकार ने सभी नगर पालिकाओं में भारी-भरकम सम्पत्ति कर लागू किया था। जैसी कि उम्मीद थी, सरकार के इस कदम का जोरदार विरोध हुआ क्योंकि उस समय लोगों को पहली बार हाऊस टैक्स देने को कहा गया था। इस कानून को मनमाने ढंग से लागू करते हुए कई वर्षों से हरियाणा के राजनीतिज्ञ खूब अवैध कमाई कर रहे हैं। काफी संख्या में लोगों ने सम्पत्ति कर का भुगतान किया पर उन लोगों की संख्या भी कम नहीं जिनको यह टैक्स नहीं देना पड़ा।

गत वर्ष हुड्डा सरकार ने एक और चालाकी की। इसने सम्पत्ति कर में भारी कमी कर दी और परिणामस्वरूप लोगों की भारी संख्या को मामूली सा भुगतान करना पड़ा। जिन सम्पत्ति मालिकों ने पूर्व दरों के अनुसार भारी-भरकम टैक्स जमा करवाया था, उन्हें नई दरों के अनुसार रियायत मिली लेकिन फिर भी हरियाणा में इस टैक्स के आदेश को वापस नहीं लिया गया।

इसके बावजूद पड़ोसी राज्य पंजाब में कांग्रेस पार्टी का पूरा चुनाव अभियान ही सम्पत्ति कर लागू किए जाने के विरोध पर टिका हुआ है। गुरदासपुर हलके से भाजपा के विनोद खन्ना से कड़े मुकाबले का सामना कर रहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने वायदा किया है कि सत्ता में आने पर वह सम्पत्ति कर को सिरे से रद्द कर देंगे। बाजवा निश्चय ही मतदाताओं को बुद्धू बना रहे हैं क्योंकि कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह ने ही पंजाब में सबसे पहले सम्पत्ति कर का अनुमोदन किया था।

Posted By : Crime Review
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