भारतीय समाज में फैले कट्टरवाद के लिए सैकुलरिस्ट जिम्मेदार

लोकसभा के चुनाव अंतिम चरण में हैं। उत्तर प्रदेश की जनता को 12 मई को बड़े फैसले लेने हैं। इसलिए स्वाभाविक तौर पर तथाकथित सैकुलर दलों में बेचैनी है। प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है, किन्तु जिनके बूते वह सत्ता पर काबिज हुई थी, वह तबका पिछले 2 सालों में उससे छिटक गया है। सपा उन्हें पुन: रिझाने का प्रयास कर रही है। सपा सरकार ने सत्ता में आने से पूर्व अल्पसंख्यक समुदाय से आतंकवाद के सिलसिले में जेलों में बंद अल्पसंख्यकों को रिहा करने का वायदा किया था। उसे पूरा करते हुए सपा सरकार ने प्रदेश भर में बम विस्फोट व अन्य आतंकी गतिविधियों में शामिल 21 अभियुक्तों के मुकद्दमे वापस लेने की पहल शुरू की थी, जिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगा दी गई।

उच्च न्यायालय ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि आज आप उन्हें रिहा कर रहे हैं, कल को उनका नाम पद्म भूषण पुरस्कार के लिए नामित करेंगे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि संबंधित आतंकी ‘गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम’ के अंतर्गत आरोपी हैं। केन्द्रीय कानून होने के कारण ऐसे मुकद्दमे केन्द्र की मंजूरी के बिना वापस नहीं लिए जा सकते। सपा सरकार ने इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दाखिल कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने की विनती की थी। इसकी सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सपा सरकार से पूछा था कि आखिर मुकद्दमे वापस लेने का आधार क्या है? सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के जवाब में सपा सरकार ने हाल में जो हलफनामा दाखिल किया है, वह सैकुलरिस्टों की वोट बैंक की राष्ट्रघाती नीति और उनके दोहरे आचरण को ही उजागर करता है।

सरकार ने हलफनामे में अपनी ही पुलिस की चार्जशीट और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा किया है। सरकार के हलफनामे में अभियुक्तों का नाम एफ.आई.आर. में न होना और मौके से गिरफ्तारी न होने को रिहाई का आधार माना गया है। यह तर्क जहां हास्यास्पद है, वहीं सैकुलरिस्टों की क्षुद्र मानसिकता को भी रेखांकित करता है। क्या कोई भी आतंकी, फिदायीनों को छोड़कर, आतंकी वारदात को अंजाम देने के बाद घटनास्थल पर उपस्थित रह सकता है? किसी आतंकी घटना की जब तक सही तरीके से जांच नहीं होगी, तब तक हमले में शामिल लोगों की पहले से ही शिनाख्त की अपेक्षा कोई कैसे कर सकता है? वस्तुत: सपा सरकार का यह बेतुका तर्क सैकुलरवाद के नाम पर इस देश में पोषित किए जा रहे कट्टरवाद को ही उजागर करता है।

सैकुलरिस्ट लंबे समय से इस देश की सुरक्षा एजैंसियों और पुलिस तंत्र की छवि कलंकित करने में जुटे हैं। दिल्ली स्थित बाटला हाऊस मुठभेड़ को फर्जी बताने वाले सैकुलरिस्ट क्या कभी उन सुरक्षा जवानों के प्रति भी कोई संवेदना रखते हैं, जो सभ्य समाज की रक्षा में शहीद हो जाते हैं? जिन आतंकियों को सपा सरकार छोडऩा चाहती है, उनमें कचहरी ब्लास्ट केस (लखनऊ व फैजाबाद) में गिरफ्तार मोहम्मद खालिद मुजाहिद भी शामिल था। कोर्ट पेशी के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। सपा सरकार इतनी द्रवित हुई कि उसने खालिद के परिजनों को 6 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा कर दी। यह दर्द हर रंग और रूप के सैकुलरिस्टों में है। आंध्र प्रदेश की कांग्रेसी सरकार ने 18 मई, 2007 को हुए मक्का मस्जिद बम विस्फोट में गिरफ्तार 21 मुस्लिम युवाओं को मुआवजा देने का निर्णय लिया, जिन्हें 5 साल के कारावास के बाद पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में रिहा किया गया। सभ्य समाज को रक्तरंजित होने से बचाने वाले शहीदों के साथ महज खानापूर्ति और आतंकियों के प्रति ऐसी दरियादिली ही क्या सैकुलरवाद का मापदंड है?

जहां तक सुरक्षा बलों के द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं की गिरफ्तारी और उनके कथित उत्पीडऩ का प्रश्न है, ऐसे कई मामले भी हैं, जहां दोष सिद्ध नहीं होने पर उन्हें रिहा कर दिया गया है। वहीं दूसरी ओर बहुसंख्यक समुदाय के आरोपियों को वर्षों जमानत तक नहीं मिलती। सद्भावना एक्सप्रैस में बम धमाका करने के आरोप में पुलिस ने पहले इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों को गिरफ्तार किया था। बाद में पुलिस की कहानी बदल गई और उसने भारतीय सेना के कर्नल विजय पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को जेल में बंद कर दिया।

राष्ट्रीय जांच एजैंसी उपरोक्त गिरफ्तारियों के 3 साल बाद भी आरोपियों की जमानत का विरोध कर रही है। पुलिस की प्रताडऩा और संत्रास से साध्वी कई गंभीर रोगों से त्रस्त है, किन्तु जांच एजैंसी अब तक उनके खिलाफ पूरा आरोप पत्र पेश नहीं कर पाई है। इसकी तुलना में कांग्रेस शासित केरल सरकार अपनी हदों को पार कर बेंगलूर धमाकों के आरोपी आतंकी अब्दुल नासेर मदनी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए कर्नाटक सरकार से अपील करती है। कांग्रेस और अन्य सैकुलर दलों को इसी आधार पर गंभीर रोगों से ग्रस्त साध्वी के मानवाधिकारों की चिंता क्यों नहीं होती? क्या मानवाधिकार की व्याख्या आरोपी के मजहब के आधार पर होगी?

सैकुलरवाद और वोट बैंक की विभाजनकारी राजनीति के कारण कट्टरपंथियों के पोषण की विकृति कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैली है। केरल में एक बार फिर कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां कोयम्बटूर और बेंगलूर धमाकों के आरोपी अब्दुल नासेर मदनी को रिहा कराने के लिए एकजुट हैं। 8 अप्रैल, 1998 को हुए कोयम्बटूर धमाके में 58 लोग मारे गए थे और मदनी उसका मुख्य आरोपी है। पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी का नेता मदनी फिलहाल एक अन्य आतंकी घटना के कारण कर्नाटक सरकार की कैद में है। इससे पूर्व 26 मार्च, 2008 को होली की छुट्टी के दिन केरल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर मदनी को पैरोल पर रिहा कराने के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया। एक देशघाती के मानवाधिकारों की चिंता का ऐसा सैकुलर उदाहरण क्या दुनिया के किसी स्वाभिमानी देश में मिल सकता है?

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की चुनावी सभा में भाजपा के पी.एम. प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने बंगलादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का इरादा व्यक्त किया तो मानो भूचाल आ गया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोदी को ‘बंगलादेशीयों को छूकर दिखाने’ की चुनौती दी है। इस विषाक्त मानसिकता के कारण एक बार फिर असम साम्प्रदायिक हिंसा में सुलग उठा है। बंगलादेशी घुसपैठिए न केवल असम, बल्कि देश के कई भागों में कानून व व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद कोई भी उन्हें देश से निकाल बाहर करने के पक्ष में नहीं है।

ऐसे दोहरे सैकुलर मापदंडों के कारण ही देशद्रोही ताकतों को देश को अस्थिर और खंडित करने का प्रोत्साहन मिल रहा है। लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे सीमा पार के आतंकी संगठनों ने पूरे देश में अपना स्थानीय नैटवर्क विकसित कर लिया है। ये संगठन सिम्मी व इंडियन मुजाहिदीन जैसे प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े लोगों का उपयोग कर छोटे-छोटे मुद्दों पर मजहबी भावनाओं को भड़काकर हिंसा करवा रहे हैं। भारतीय समाज के एक भाग में कट्टरवादी हावी हो रहे हैं और मजहबी जुनून को हवा मिल रही है तो इसका बड़ा श्रेय सैकुलरिस्टों को जाता है, जो वोट बैंक की राजनीति के कारण कट्टरपंथ को आंख बंद कर पोषित करते हैं।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA [ EDITOR IN CHIEF ]
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