जनादेश 2014 : ‘सर्वधर्म समभाव’ की विजय

सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस समेत कथित सैकुलर लीक पर चलने का दावा करने वाले राजनीतिक दलों का सूपड़ा साफ हो गया है। इस पतन का कारण क्या है? इसकी जड़ें तलाशने के लिए हमें 80 के दशक में जाना होगा। 3 फरवरी, 1981 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश मुर्तजा फजल अली और ए. वरदराजन की द्विसदस्यीय पीठ ने एक मुस्लिम परित्यक्ता शाहबानो के मामले की सुनवाई शुरू की।

निचली अदालत ने तलाकशुदा शाहबानो और उसके 5 बच्चों की परवरिश के लिए पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ कट्टरपंथी तत्वों ने खूब हंगामा किया। अंतत: मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। मामले की गंभीरता को देखते हुए बाद में इसे सर्वोच्च न्यायालय की 5 सदस्यीय पीठ के हवाले किया गया। 23 अप्रैल, 1985 को सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश सुनाया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। इस आदेश के खिलाफ कट्टरपंथी मुसलमानों ने आसमान सिर पर उठा लिया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने उन्हें तुष्ट करने के लिए 1986 में संविधान में संशोधन कर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को ही पलट दिया।

कटु सत्य यह है कि राजनीतिक अवसरवाद के लिए मुस्लिम कट्टरवाद के पोषण और संरक्षण की मानसिकता ही सैकुलरवाद की कसौटी बन गई है। यह विकृति नई नहीं है। आजादी के पहले से यह कांग्रेसी परम्परा में विद्यमान है, जब कांग्रेस पार्टी के अधिवेशनों में राष्ट्रगान के वक्त मुस्लिम सदस्यों को उनके विरोध के कारण नमाज पढऩे की छूट दी जाती थी। यह अल्पसंख्यक समुदाय के कट्टरपंथी वर्ग के तुष्टीकरण की कांग्रेसी परम्परा की ही देन है कि आज प्राय: सभी सैकुलर दल आतंकवादियों के साथ खड़े नजर आते हैं। बिहार के स्वयंभू ‘विकास पुरुष‘ नीतीश कुमार ने तो इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापक यासीन भटकल की अपने राज्य में गिरफ्तारी दिखाने से ही मना कर दिया था। उन्होंने बिहार में भटकल के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करने से इंकार कर दिया। बाद में एन.आई.ए. की टीम को कोलकाता से दौड़ लगानी पड़ी।

उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी ने विधान सभा चुनावों में अल्पसंख्यक वर्ग से वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद वह आतंकवाद के सिलसिले में जेल में बंद मुस्लिम युवाओं को रिहा कर देगी। सत्ता संभालने के बाद उसने ऐसे युवा मुस्लिमों की रिहाई की प्रक्रिया भी शुरू कर दी, किंतु इलाहाबाद उच्च न्यायालय की चाबुक पडऩे के बाद इस पर कार्रवाई फिलहाल रोक दी गई है, किंतु सपा का मंसूबा थका नहीं है। सपा ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष याचिका के तहत जो हलफनामा दाखिल किया है, उसमें अपनी ही पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। आंध्र प्रदेश की कांग्रेसी सरकार ने तो अदालत से बरी होने वाले आतंक के आरोपियों को मुआवजा भी दिया।

जब से (मार्च, 2012) समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ हुई है, तब से 50 से अधिक सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हो चुकी हैं। वोट बैंक की राजनीति को पोषित करने के लिए समाजवादी पार्टी ने कानून व व्यवस्था की मशीनरी और प्रशासन, दोनों का सांप्रदायीकरण किया। उसके परिणामस्वरूप ही मुजफ्फरनगर, शामली आदि जिलों में हिंसा फैली। उत्तर प्रदेश में प्रशासन और पुलिस को अलिखित आदेश हैं कि किसी भी अपराध में कार्रवाई अपराध की गंभीरता को न देखकर अपराधी के मजहब और जाति को ध्यान में रखकर की जाए।

इस खतरनाक मानसिकता का ज्वलंत उदाहरण ग्रेटर नोएडा की पूर्व एस.डी.एम. दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन है। कर्तव्यपरायण दुर्गा शक्ति का अपराध इतना था कि इन्होंने सरकारी जमीन पर बनाई जा रही मस्जिद की गैर कानूनी दीवार को गिरवा दिया था। इन सब के पीछे सपा के काबीना मंत्री आजम खान की प्रमुख भूमिका थी, जो चुनाव के दौरान निरंतर नरेंद्र मोदी के खिलाफ विषवमन करते रहे।

चुनाव प्रचार के दौरान सहारनपुर के कांग्रेसी प्रत्याशी इमरान मसूद ने मतदाताओं का भयादोहन करने के लिए मोदी को काट डालने की धमकी दी थी। सहारनपुर देवबंद के पड़ोस में है। मुस्लिम समाज को दिशा दिखाने वाले दारूल उलूम देवबंद ने इस पर अपना मुंह बंद रखा। जिस दिन अदालत ने मसूद को जेल भेजा, उसी दिन शाम को कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी सहारनपुर पहुंचे और मतदाताओं से मसूद के पक्ष में मतदान करने की अपील की। 2012 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान जब राहुल गांधी आजमगढ़ के दौरे पर गए तो उनके साथ दिग्विजय सिंह भी थे, जो निरंतर दिल्ली के बाटला हाउस में हुई मुठभेड़ को फर्जी बताते आए हैं। दोनों ने इसे लेकर आजमगढ़ के निवासियों का भावनात्मक दोहन करने का प्रयास किया था।

बाटला मुठभेड़ से पूर्व अहमदाबाद बम धमाकों के सिलसिले में आजमगढ़ के ही एक मौलाना अबू बशर को गिरफ्तार किया गया था। बशर की गिरफ्तारी के बाद भी उसके घर मातमपुर्सी के लिए सपा-बसपा और कांग्रेस में होड़ लग गई थी। सन् 1993 में केरल में ‘इस्लामिक सेवक संघ’ नामक संगठन को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के कारण प्रतिबंधित किया गया था। इसके मुखिया अब्दुल नसीर मदनी ने तब एक नई पार्टी ‘पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी’ का गठन कर लिया। 8 अप्रैल, 1998 को कोयम्बटूर बम धमाकों के सिलसिले में मदनी को गिरफ्तार किया गया। लालकृष्ण अडवानी की हत्या के इरादे से किए गए इस बम विस्फोट में 58 निरपराधों की मौत हुई थी और 200 से अधिक गंभीर रूप से घायल हुए थे। मुस्लिम बहुल इलाकों में ‘पी.डी.पी.’ के प्रभाव से मोहग्रस्त होकर 2001 के चुनाव में कांग्रेस और 2006 में माकपा नेे मदनी को गले लगाया। 2009 के चुनाव में भी मदनी को साथ रखने के लिए कांग्रेस और माकपा, दोनों में होड़ लगी थी, जिसमें माकपा ने बाजी मारी थी।

दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा देश होगा, जहां विधायिका ने किसी राष्ट्रविरोधी शक्ति को अपना समर्थन दिया हो। सन् 2006 (16 मार्च, होली की छुट्टी के दिन) में केरल विधानसभा काविशेष सत्र बुलाकर ‘मानवता के आधार पर’ मदनी की रिहाई के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कियागया। चुनाव के दौरान केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने धमकी दी थी कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बने और भारत ‘सैकुलर’ नहीं रहा तो जम्मू-कश्मीर भारत का अंग नहीं रहेगा। मोदी को ‘मौत का सौदागर’ बताने वाली मां-बेटे की जोड़ी निरंतर पूरे देश में नरेंद्र मोदी के खिलाफ झूठे आरोप लगाती रही। देश का जनमानस इन सारी विकृतियों को देख रहा था। सैकुलरिस्टों ने जहां समाज में डर और निराशा भरने का काम किया, वहीं नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे और गुजरात के विकास माडल के साथ जनता में आशा का संचार कर रहे थे। यही कारण है कि इस देश की बहुलतावादी संस्कृति और देश पर अभिमान करने वाले हिंदू और मुसलमान, दोनों ने एकजुट हो भारतीय जनता पार्टी का वरण किया। भाजपा के पक्ष में आया प्रचंड बहुमत सैकुलरिस्टों के दोहरे चाल चरित्र को जनता के द्वारा नकारने का ही परिणाम है।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA [ EDITOR IN CHIEF ]
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