रोमन साम्राज्य की तर्ज पर कांग्रेस का पतन

सन् 476 ईस्वी में इतिहास के सबसे बड़े रोमन साम्राज्य का लगभग 500 वर्षों के बाद पतन हुआ था। उस समय रोमन साम्राज्य विश्व में सबसे महान महाशक्ति थी। इसके पतन के कारणों में सरकार में भ्रष्टाचार, फिजूलखर्ची के कारण गंभीर वित्तीय संकट, दमनकारी कर नीति और महंगाई थे। इसके कारण गरीबों और अमीरों के बीच खाई बढ़ गई थी। इसके साथ ईसाई धर्म का प्रचार धीमा हुआ, परम्परागत मूल्यों में गिरावट आई, पूर्वी साम्राज्यों का उदय हुआ, सेनाओं पर अत्यधिक खर्च हुआ और बर्बर कबीलों आदि के आक्रमण बढ़े।

2014 में 129 वर्ष पुरानी कांग्रेस का पतन भी लगभग रोमन साम्राज्य के पतन की तरह है। कांग्रेस के शासन में अनेक घोटाले हुए, मंत्रियों और उनके प्रिय पात्रों द्वारा राजकोष की लूट की गई, महंगाई ने आसमान छुआ, कर दरें अत्यधिक बढ़ीं, सबसिडी भी बढ़ी और अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया और ये सब बातें यू.पी.ए. के 10 साल के शासन की पर्याय बनीं जिसके कारण भाजपा के नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिन्दुत्व की शक्तियों का विकास हुआ और उन्होंने कांग्रेस को बुरी तरह पराजित किया। यह सच है कि कांग्रेस नेे भारत को स्वतंत्रता दिलाई और नेहरू से लेकर उनकी पुत्री इंदिरा, नाती राजीव-सोनिया तक ने लगभग 60 वर्षों तक शासन किया किन्तु इस बार की आंधी में नेहरू-गांधी वंश उड़ गया। मोदी की सुनामी ने कांग्रेस को उड़ा दिया।

1952 में लोकसभा के गठन के बाद पहली बार पार्टी को इतनी सीटें नहीं मिलीं कि उसे एक संसदीय दल का दर्जा दिया जा सके। सोनिया के घावों पर नमक इस बात से और छिड़का गया कि पार्टी अध्यक्ष के रूप में वह विपक्ष की नेता बनने के योग्य भी नहीं रह गईं। लोकसभा के नियमों के अनुसार 543 सदस्यों में से विपक्ष का नेता बनने के लिए किसी भी पार्टी के सदन में 10 प्रतिशत अर्थात 55 सदस्य होने चाहिएं और कांग्रेस के केवल 44 सदस्य हैं। इससे नेहरू-गांधी खानदान के शासन की याद ताजा हो जाती है जब कोई भी विपक्षी दल विपक्ष का नेता बनने में सफल नहीं रहा। आज कांग्रेस केवल एक मान्यता प्राप्त संसदीय समूह के लिए पात्र है क्योंकि उसकी 30 से अधिक सीटें हैं। क्या इस प्रकार कांग्रेस अपने पापों का फल भुगत रही है?

पार्टी में सोनिया-राहुल की मां-लाडले की जोड़ी की आलोचना की जा रही है कि वे सत्ता के नशे में चूर थे और उनको यह अहंकार हो गया था कि वे शासन करने के लिए ही पैदा हुए हैं और वे यह भूल गए थे कि जो सत्ता उनके पास है वह केवल अस्थायी है और इसी तरह उनकी चाटुकार मंडली की भी आलोचना की जा रही है। एक सम्राट की तरह उन्हें उनके मंत्रियों, जी हुजूरों और 24&7 चलने वाले मीडिया द्वारा बनाई गई नकली छवि के बूते मूर्ख बनाया गया और वे जनाक्रोश के समक्ष नहीं टिक सके। आज स्थिति ऐसी हो गई है कि पार्टी यह पता नहीं लगा पा रही है कि उनके इस प्रदर्शन में कौन नायक था और कौन खलनायक जिसके कारण पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और राहुल की बेपेंदे की चाटुकार मंडली के बीच दोषारोपण का खेल शुरू हो गया है और ये लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार जड़ थी, घूसखोरी बढ़ी तथा जमीनी स्तर पर लोगों से पार्टी सम्पर्क नहीं साध पाई और जिसके कारण नमो के प्रतीकात्मकता हिन्दुत्व और राष्ट्रवादी उत्साह का सामना नहीं कर पाई।

पार्टी के अनेक नवरत्न अपनी सीटें गंवा चुके हैं और पार्टी की स्थिति बहुत दयनीय है। उत्तर प्रदेश में वह 80 में से केवल 2 सीटें जीत पाई। राजस्थान और गुजरात में उसका पूर्णतया सफाया हुआ। मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और बिहार की भी लगभग यही स्थिति है। पार्टी कार्यकर्त्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है और यह पार्टी के लिए गंभीर संकट का विषय है। पार्टी के अनेक नेता राहुल गांधी को माफ नहीं कर सकते क्योंकि वह संसद में एक दशक तक रहे और उन्होंने एक भी प्रश्न नहीं पूछा। केवल 2 चर्चाओं में भाग लिया और कई बार उन्होंने ऊल-जुलूल बातें कहीं। साथ ही देश के समक्ष ज्वलंत मुद्दों के बारे में कभी भी अपने विचार व्यक्त नहीं किए। पार्टी की इस स्थिति के लिए यह बात भी जिम्मेदार है। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के शब्दों में, ‘‘हमारे युवराज नए सिरे से पार्टी को बनाना चाहते हैं। किन्तु वह कांग्रेस को एक ऊंचाई तक कैसे पहुंचाएंगे जबकि उनकी बैलेंस शीट में ही निल बैलेंस है।’’

यही नहीं,पहली बार कांग्रेसी नेता गुपचुप रूप से सोनिया गांधी के इरादों और अपने बेटे का हर कीमत पर बचाव करने की नीति के बारे में उंगली उठाने लग गए हैं। सोनिया ने कहा, ‘‘हमने व्यक्तिगत रूप से तथा सामूहिक रूप से इस अप्रत्याशित हार से समुचित सबक सीखे हैं।’’ पार्टी में महाराष्ट्र और हरियाणा में पहले ही गुटबाजी शुरू हो गई है जहां इस वर्ष के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। असमकी भी यही स्थिति है। इन 3 राज्यों में पार्टी कार्यकर्त्ताचाहते हैं कि मुख्यमंत्रियों को बर्खास्त किया जाए। पंजाब में प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष के विरुद्ध आक्रोश बढ़ता जा रहा है। पार्टी की इस स्थिति को देखते हुए उसकी सहयोगी राकांपा के शरद पवार ने भी कांग्रेस की आलोचना की है और अब वह विधानसभा चुनावों के लिए अधिक सीटें मांग रहे हैं क्योंकि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस केवल 2 सीटें जीत पाई है।

धीरे-धीरे किन्तु निश्चित रूप से कांग्रेस अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩे जा रही है। पार्टी के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं : राहुल की कार्यशैली और पार्टी में आंतरिक प्रयोगों का प्रभावीपन और अनिच्छुक नेता के रूप में उनकी छवि। इसके अलावा कांग्रेस में इस समय अनेक छुटभैया नेता हैं जिनकी मानसिकता सांकेतिकता और ‘मैं भी हूं’ वाली है। इस सबका दुखद पहलू यह है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त होता जा रहा है और इसके कारण पार्टी पहल के लिए शीर्ष नेतृत्व पर निर्भर हो गई है और इसके अभाव में पार्टी जड़ बन जाती है। नाम-निर्देशन की संस्कृति में पार्टी में केवल वे लोग फल-फूल पाते हैं जो अपनी निष्ठा का सबूत देते हैं और राजनीतिक परजीवी होने के कारण वे ब्लादिमिर नोबोकोव की लोलिता की तरह निष्ठावान हैं।

फिर इसका समाधान क्या है? समय आ गया है कि पार्टी निष्क्रिय नेताओं और निहित स्वार्थी तत्वों से मुक्ति पाए। यह सच है कि पार्टी में किसी ने भी राहुल के त्यागपत्र की मांग नहीं की किन्तु यदि वह पार्टी के पदाधिकारी बने रहते हैं तो पार्टी में असंतोष को शांत करना मुश्किल हो जाएगा। फिर से पार्टी नेतृत्व करने में सफल होने के लिए राहुल गांधी को अपने तौर-तरीकों में बदलाव लाना होगा, अपने नेतृत्व को स्थापित करना होगा और पार्टी को अपने साथ आगे बढ़ाना होगा। लगता है कि वह दरबारी संस्कृति को पसंद नहीं कर सकते हैं किन्तु पार्टी में अभी दरबारी संस्कृति बदली नहीं गई है जिसके कारण उनकी अपनी विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में आ रही है। क्या वह पार्टी नेतृत्व से अलग हो जाएंगे क्योंकि अब पार्टी में उनकी बहन प्रियंका को बागडोर देने की चर्चाएं तेज हो रही हैं किन्तु राहुल के निष्ठावान नेताओं का कहना है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। जब तक पार्टी नेताओं के लिए नेहरू-गांधी परिवार अनुकूल रहा तब तक वे इस परिवार को समर्थन की बातें करते थे और अब वे पार्टी उपाध्यक्ष को खलनायक बता रहे हैं किन्तु 44 सदस्यों से भी पार्टी की स्थिति में सुधार आ सकता है। इसका मतलब है पार्टी अब भी गांधी परिवार की गुलाम बनी रहेगी।

पार्टी को सोनिया-राहुल से परे देखना होगा और इन समस्याओं का समाधान ढूंढना होगा क्योंकि पार्टी में चाहे कोई भी नेता कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अपरिहार्य नहीं होता। उत्तर प्रदेश में पार्टी की बुरी हार बताती है कि नेहरू-गांधी परिवार का करिश्मा समाप्त होता जा रहा है। इस पुरानी प्रणाली के स्थान पर नई प्रणाली लाई जानी चाहिए। कांग्रेस नेताओं को भी जी-हुजूरी बंद करनी होगी और कांग्रेस को मजबूत करने के लिए कार्य करना होगा।

पार्टी को मजबूत करने के लिए आवश्यक है कि वे अपनी गलतियों से सबक सीखें। पार्टी का आधुनिकीकरण हो, पार्टी में पदानुक्रम और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार किया जाए और उसे रणनीतिक पाठ पढऩे होंगे। पार्टी का भविष्य इस बात को स्वीकार करने पर निर्भर करता है कि भारत की राजनीति अब वैचारिक रूप से वामपंथी और दक्षिणपंथियों की बजाय मध्यम मार्गी पार्टी के बीच लड़ी जाएगी। यह एक बड़ी मांग है किन्तु असंभव नहीं है।

क्या सोनिया-राहुल पार्टी में व्यापक बदलाव ला पाएंगे? क्या वे अपने हक की राजनीति से परे जाकर आम आदमी की बढ़ती अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए कार्य करेंगे? एक युवा नेता के शब्दों में ‘‘आज की दुनिया में राजनीति वास्तव में रॉकेट साइंस बन गई है। जो राजनीति में हैं वही इसकी बारीकियों और इसके विज्ञान को समझते हैं। खुद खोदी गई कब्र के कगार से पार्टी को वापस लाने के लिए केवल प्रस्ताव पारित करना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी को राजनीतिक क, ख, ग आक्रामकता और विश्वास के बारे में सबक सीखने होंगे।’’ क्या पार्टी एक नई शुरूआत करने में सक्षम है? कांग्रेस को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि राजनीति एक निर्मम और कभी माफ न करने वाली दासी है।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA { EDITOR IN CHIEF }
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