धारा 370 और वास्तविकता

धारा 370 पर धारा प्रवाह वाद-विवाद और नए सिरे से आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला चल निकला है। जम्मू कश्मीर का लोकतांत्रिक इतिहास गवाह है कि चुनाव चाहे किसी भी स्तर का रहा हो, धारा 370 को हथियार बना वोट बटोरे गए हैं। हर राजनैतिक दल अपने अपने क्षेत्रीय जनाधार और सुविधानुसार इस मुद्दे को भुनाता चला आया है। रियासत में मौजूदा गठबंधन सरकार की हालिया लोकसभा चुनाव मे समूल हार के बाद हाशिए पर लुढ़की नैशनल कांफ्रेस और कांग्रेस को कोई मुद्दा ही नहीं मिल रहा था जिसके दम पर आगामी विधानसभा चुनाव में अपने जनाधार को नए सिरे से सशक्त किया जा सके।

पर अब मुद्दा है जिस पर जोर-शोर से हर कोई सियासत करने में मशगूल है। जुम्मा-जुम्मा कुछ सालों के राजनैतिक कैरियर और भूमि आदोंलन से चर्चा में आए डा. जितेन्द्र सिंह ने नयी सरकार के आधिकारिक गठन के तुंरत बाद ही धारा 370 पर बयान दे डाला। मेरे हिसाब से यह उनकी राजनैतिक नासमझी नहीं थी बल्कि पहले से ही तय की जा चुकी ऐसी रणनीति थी जिसके दम पर भारतीय जनता पार्टी कश्मीर केन्द्रित राजनीति से दो चार होने के लिए होमवर्क कर रही है।

सिहं के बयान के बाद घाटी में क्षेत्रीय जनाधार की दावेदार नेशनल कांफ्रैस और पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी का केन्द्र में स्थापित भाजपा और पर्दे के पीछे बैठे संघ से मौखिक युद्ध का आगाज हो चुका है। दरअसल यह रियासत के उन दोनो प्रमुख क्षेत्रिय दलों की मजबूरी भी है। परिसीमन का मसला अगले कई सालों तक सोची समझी राजनैतिक साजिश के तहत ठंडे बस्ते में जा चुका है। ऐसे में कश्मीर खित्ते का विधानसभा में प्रतिनिधित्व कम होने का सवाल ही नहीं है। खित्तेवाद की इस राजनीति को भले ही कोई नाम दें दे पर आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से जम्मू और लद्दाख को विधानसभा या फिर देश की संसद में न्यायोचित प्रतिनिधित्व मिलना फिलवक्त तो असंभव है। ऐसे में चाहे जितनी भी बहस इस मुद्दे पर की ली जाए राज्य विधानसभा की बहुमत से हामी के बिना इसे हटाया नहीं जा सकता। अब एकबारगी गौर करें कि आखिर क्या है धारा 370, किस प्रकार का अनुच्छेद है यह विवादित मुद्दा। रियासत में जनसाधारण की बात करें तो वह इस मुद्दे के एक ही पहलु से सबसे ज्यादा परिचित है और वह है स्टेट सब्जैक्ट। उसे महज इतना मालूम है कि अगर यह धारा टूटी तो बाहर के लोग यहां आकर बस जाएंगे। लेकिन असल में यह सारा मामला क्या है धारा 370 की कानूनी बारिकीयां और इसमें सशोंधन या फिर हटाए जाने के लिए सवैंधानिक प्रक्रिया, और इस अनुच्छेद के प्रभाव में आने के पीछे के इतिहास को खंगालना जरूरी है।

क्या है धारा 370 : सारे देश में जम्मू कश्मीर ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां पर अनुच्छेद 370 इस राज्य को एक अलग तरह का विशेष दर्जा प्रदान करता है। इस राज्य का अपना संविधान और अपना सवैंधानिक निशान है जो देश के किसी अन्य राज्य को नहीं है। धारा 370 के दम पर क्या क्या बदल चुका है रियासत में पहले उसे देखते हैं। 73 वें व 74 वें सशोंधन का पूरी तरह से लागू न होना, रियासत में पांच की जगह छह साल का राज, शेष भारत के किसी भी नागरिक को जम्मू कश्मीर के नागरिक न होने का अधिकार, राज्य में किसी भी अन्य राज्य के नागरिक को जमीन खरीदने पर प्रतिबंध और रियासत की बेटी को राज्य से बाहर शादी करने पर उसके उत्तराधिकारी को राज्य जम्मू कश्मीर में नागरिक का दर्जा न मिलना इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य में लागू हैं। इन्ही सब समस्याओं को आगे रख भाजपा इस धारा का विरोध या फिर कहें कम से कम चर्चा पर जोर दे रही हैं। अब अगर उक्तवर्णित समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक मनन करें तो स्थिति और होगी। उदाहरणत 73 वें सशोंधन को सूबे में पूरी तरह से लागू किया जाए तो रियासत में पंचायती राज को हर वो अधिकार मिल सकता है जो बाकी बचे देश में पंचायतों को है। 74वां सशोंधन नगर परिषद् व नगर निगम में लोगों के चुने नुमांइदों की भागीदारी को लेकर है जो वर्तमान में राज्य के अंदर लागू नहीं है। सारे देश में रियासती सरकारें पांच साल के लिए राज कर सकती हैं पर जम्मू कश्मीर में रियासती राज की उम्र छह साल की है। जम्मू कश्मीर का नागरिक तो भारत का नागरिक है पर भारत के अन्य राज्यों का नागरिक जम्मू कश्मीर का नागरिक नहीं हो सकता। इसके अलावा राज्यवासी तो बाहर जाकर जमीन खरीद सकते हैं लेकिन कोई अन्य भारतीय जो जम्मू कश्मीर का ना हो यहां पर आकर जमीन नहीं खरीद सकता। इस राज्य का कोई युवक अगर बाहरी राज्य की किसी युवती से शादी करे तो उसे वो हक शादी के तुंरत बाद प्राप्त होते हैं जो उसके पति को बतौर रियासत का बाशिंदा होने के नाते मिलते हैं। पर अगर यहां की बेटी बाहर शादी करती है तो उसके उत्तराधिकारियों को उन अधिकारों से बंचित होना पड़ता है जो उसे बतौर राज्यवासी प्राप्त हैं। हालांकि भारतीय संवधिान में देश के दस राज्यों को अलग तरह का दर्जा प्राप्त है लेकिन इसके बावजूद भी धारा 370 रियासत जम्मू कश्मीर को सबसे अलग श्रेणी में ला खड़ा करती है।
कैसे हट सकती है यह धारा: इस अनुच्छेद के अनुसार देश का राष्ट्रपति यह हक रखता है कि वह रियासती सरकार की सहमति से आदेश जारी कर संविधान के उपबंधों में जरूरी बदलाव लाकर यहां लागू कर सके। ऐसा हुआ भी। वर्ष 1954 में तत्तकालीन राष्ट्रपति द्वारा कान्स्टीट्यूशन (एप्लीकेशन टू जम्मू कश्मीर) नामक आदेश जारी किया गया। इसके बाद ही संविधान में अनुच्छेद 35 के बाद 35 (क) शामिल हो गया। इसके लागू होने से रियासती सरकार को कुछ ऐसे भी हक मिल गए जिनके बारे में शायद अभी तक आमजन को पता भी नहीं है। इसके अनुसार भारतीय संवधिान में चाहे कैसा भी प्रवाधान क्यों न हो जम्मू कश्मीर राज्य की विधानसभा को देश के संविधान से हटकर भी कानून बनाने की आजादी है। इसके तहत सरकार को यह फ्री हैंड मिल गया कि रियासत में बाहर से आकर बसने वाले भारतीय नागरिकों, छात्रावृति, रोजगार संबंधी और राज्य के स्थाई निवासियों को लेकर अन्य किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता के लिए राज्य सरकार अलग से कानून खड़ा कर सकती है।

एक और विशेषाधिकार इस धारा के अंर्तगत्त राज्य सरकार को हासिल है जिसके अनुसार भारतीय संविधान में दर्ज मूलभूत अधिकारों या अन्य उपबंधों के उल्लंघन के बावजूद भी राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कानून जायज होगा। अनुच्छेद 35 (क) के तहत अगर सूबे की विधानसभा गुलाम कश्मीर यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के किसी नागरिक को यहां बसाने पर आ जाए तो केन्द्र सरकार चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। इसके अलावा अगर शेष भारत के लोगों को यहां की नागरिकता से बंचित करने की बात हो तो यह अख्तियार भी राज्य विधानसभा को होगा। इससे अधिक और क्या होगा कि जिस कानून को देश की सबसे बड़ी पंचायत बहुमत के साथ भी नहीं कर सकती मात्र उसे राष्ट्रपति के एक आदेश पर अनुच्छेद 35 (क) के तहत लागू कर दिया गया। यद्यपि भारतीय संवधिान में सशोंधन का प्रवाधान है और अनुच्छेद 368 इसकी इजाजत देता है पर उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय के अनुसार सशोंधन में संविधान के मूलभूत ढांचे के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। अनुच्छेद 368 के अनुसार ऐसे किसी भी विधेयक को न केवल दोनो सदनों में सदस्यों की कुल संख्या के बहुमत से और मतदान के लिए मौजूद सदस्यों में दो तिहाई से पारित करना होगा। इसके अलावा सशोंधन अगर अनुच्छेद 368 के कुछ विशेष विषयों पर हो तो उसे समूचे देश के विधानमंडलों में से आधे विधानमंडलों में भी सर्वसहमति से पारित करवाना होगा।

कमोबेश वर्तमान में स्थिति यह बन चुकी है कि कश्मीर केन्द्रित राजनैतिक दल इस पर चर्चा के लिए भी तैयार नहीं है जबकि अलगाववादी आजादी के अलावा और किसी भी विषय को प्रासांगिक ही नहीं मानते। इस मुद्दे पर मची उथल-पुथल का निष्कर्ष कुछ अलग से निकलेगा इस पर अभी से कुछ कहना मुहाल है लेकिन एक बात स्पष्ट है कि अगर भारतीय जनता पार्टी रियासत में पीडीपी के साथ विधानसभा चुनाव के बाद किसी गठबंधन के बारे में विचार करती है तो कम से कम दोनो पार्टियों में से किसी एक को इस मुद्दे पर अपने स्टैंड को बदलना होगा।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA { EDITOR IN CHIEF }
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