जमहूरियत पर हावी होता जेहाद

किसी महानुभव से किसी ने पूछा था कि आपका तीसरे विश्व युद्ध के बारे में क्या ख्याल है। जबाव था कि तीसरे का तो पता नहीं पर यह तय है कि चौथा हरगिज नहीं होगा। असलियत में है भी ऐसा ही। दुनिया में अब तक सार्वजनिक परमाणु हथियारों की ही बात करें तो इस नीले गृह जैसे करीब दस और गृह तबाह हो सकते हैं। इस अंदाजे में उन परमाणु हथियारों को अभी जोड़ा ही नहीं गया जो सार्वजनिक नहीं हुए। इतना ही होता तो गनीमत थी पर अब जमहूरियत पर जेहाद कुछ इस कदर हावी होने लगा है कि दुनिया के लोकतांत्रिक ढांचे की ही चूलें हिलती दिखाई दे रही हैं। आलम यह है कि सरेआम जेहादी घातक हथियारों की नुमाइश कर रहे हैं और प्रत्युत्तर में उनके इन दावों को खराब हथियारों का नाम देकर खारिज किया जा रहा है।

अमेरिका और इसके नाटो सहयोगियों ने अगर शुरू से ही अरब देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था को तय करने की पहल दिखाई होती तो शायद आज यह नौबत नहीं आती। सबसे पहले इराक से शुरुयात हुई। सद्दाम हुसैन गया, उसके बाद लीबिया, यमन, मिश्र और आखिर में सीरिया। इन तमाम मुल्कों की एक जैसी कहानी है। लोकतंत्र का आभाव। शिया और सुन्नी समुदायों के बीच खूनी संग्राम। परिणाम स्वाभिवक थे, और सामने भी आए। बशर उल असाद के पैरवी पर उतरे रूस और चीन ने यू.एन. में दो दफा वीटो का इस्तेमाल कर नॉटो हमले को मंजूरी नहीं मिलने दी। मामला ऊंची नाक का था, यू.एन.ओ. में हथियार गद्दाफी के पतन और उसके बाद के लीबिया तत्तकालीन स्थिति को बनाया गया जो अभी भी बदस्तूर जारी है। इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि लीबिया से अगर गद्दाफी का सफाया हो भी गया तो हालात वहां पर पहले से भी अधिक खराब हो गए। यमन और मिश्र में भी कमोबेश स्थिति वैसी ही है। 21 वीं सदी में लोग अगर लोकतंत्र की अपेक्षा करते हैं तो आखिर वह कैसे न्यायोचित नहीं। फिर चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से की बात हो। जगजाहिर है कि ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने ही रूस के खिलाफ अफगान की तोरा बोरा पहाडिय़ों पर उतारा था। दुनिया के इस सर्वाधिक बांछित आतंकी का मटियामेट करने के लिए अमेरिका को दस साल लग गए। वो भी इस सूरत में जब लादेन सरीखा अलकायदा का सुप्रीमो गाहे बगाहे वीडियो जारी कर दुनिया को अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाता था और उसकी यही आदत आखिरकर उसे ले डूबी। पर अब एक और लादेन पैदा हो चुका है।


कौन है बगदादी: नाम अबु बक्र अल-बगदादी, पेशा सुन्नी जेहाद के दम पर मिडल ईस्ट पर काबिज होना। जुम्मा जुम्मा एक महीने में बगदादी ने वो तबाही मचाई जिसके बाद उसे दुनिया की बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें गंभीरता से लेने लगी हैं। पर ऐसा पहले क्यों नहीं हुआ। जेहादी बेवसाइटों की मानें तो बगदादी एक संपन्न परिवार से है और पढ़ा लिखा इमाम है। ऐसा भी दावा किया जा रहा है कि बगदादी बगदाद की इस्लामिक यूनिवॢसटी से पी.एच.डी. होल्डर है। सबसे दिलचस्प बात तो बगदादी की रहस्मय शख्सियत से जुड़ी है। दुनिया को नए लादेन के बारे में ज्यादा पता ही नहीं है। अब तक बगदादी की दो ही जानी पहचानी तस्वीरें दुनिया के सामने आई हैं। पहली तस्वरी अमेरिकी रिवाड्र्स फॉर जस्टिस की बेवासाइट पर इस आतंकी खलीफा को पकडऩे के लिए एक करोड़ डॉलर के इनाम के साथ चस्पां है और दूसरी इराकी गृह मंत्रालय द्वारा जारी की गई है। जो थोड़ी बहुत जानकारी दुनिया भर के देशों की खुफिया एजेंसियों को बगदादी के बारे में पता है उनके अनुसार बगदादी 2003 में बागी हुआ था जब अमेरिका का पहली बार इराक में दखल हुआ। कहते हैं कि उस जमाने में बगदादी ने अलकायदा की उस शाखा से मिलकर जेहादी होने का दावा किया था जो अबु मुसाब अल जरकावी गुट से थी।

गौरतलब है कि इसे अमेरिका ने गिरफ्तार भी कर लिया था। साल 2005 से लेकर 2009 तक अमेरिका ने इसे सुन्नी आतंकियों के लिए बनाई गई एक खास जेल में कैद रखा था जो दक्षिणी इराक में कहीं स्थित थी। 2010 में रिहा होने के तुंरत बाद बगदादी फिर जेहादी हो गया। इस शख्स की सबसे बड़ी खासियत है कि यह लादेन की माफिक वीडियो जारी कर अपनी मौजूदगी या फिर अपने हिमायतियों को फरमान जारी करने में बिल्लकुल भी यकीन नहीं रखता। बगदादी ने जिस सुन्नी जेहाद के नारे से इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड लेवांत (आइएसआइएस) खड़ी की उसके ङ्क्षहसक जेहाद ने महज एक महीने में ही दुनिया भर की सरकारों को सकते में डाल दिया है। आइएसआइएस द्वारा इराक में बरपाए जा रहे कहर ने नए सिरे से उन जेहादी गुटों में जान फूंक दी है जो अलकायदा के जमींदोज होने और बोको हरम के पूरी तरह से सफल न होने पर शिथिल हो चुके थे।

इराक संकट और विदेशी सियासत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सियासत का भी अपना अदांज है। तब तक दुनिया के तमाम बड़े मुल्कों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती जब तक उन्हें खासतौर से मिडल ईस्ट में युद्ध जैसी परिस्थिति में अपना स्वार्थ दिखाई नहीं देता। आइएसआइएस कोई इतना भी नया नाम नहीं है, बगदादी हो सकता है। लेकिन फिर भी आइएसआइएस के इराक और सीरिया पर ङ्क्षहसक हमलों पर किसी ने कोई एतराज नहीं दिखाया। इस गुट ने मार्च 2013 में सीरिया की प्रांतीय राजधानी रक्का पर कब्जा जमाया था। फिर एक और साल लगा आइएसआइएस को इराक तक पहुंचने में। इराक के पश्चिमी प्रांत अंबार के फल्लूजा शहर पर सुन्नियों का कब्जा हो गया जहां पहले से ही सुन्नी बहुसंख्यक थे। तदोपरांत बगदादी की अगुवाई में आइएसआइएस बगदार से मात्र 100 किमी की दूरी पर रमादी के बड़े सारे हिस्से पर काबिज हो गया। दुनिया के तमाम बड़े मुल्कों को होश तब आया जब यह जेहादी मोसुल शहर तक पहुंच गए। अगर एकबारगी पहले से ही इस बारे में दुनिया की बड़ी शक्तियों ने अपने निज स्वार्थ को त्याग कर इस और ध्यान दिया होता तो यह नौबत इराक में कभी नहीं आती।


कमतर शब्दों में कहूं तो इस समय दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है। लोकतांत्रिक शक्तियों के पास परमाणु या फिर रसानियक हथियारों की मौजूदगी भी इस जीवित ग्रह के लिए नितांत बड़ी चुनौती है पर अगर ऐसे ही हथियार अगर धर्म के नाम पर कट्टरता की घुट्टी पिए जेहादियों के हत्थे चढ़ जाएं तो फिर इस धरती का ऊपरवाला ही मालिक है।

Posted By : HEMANT KUMAR MISHRA { EDITOR IN CHIEF }
Like Us on Facebook