कौसरनाग यात्रा पर हुर्रियत का विरोध कितना न्यायोचित?

कौसरनाग यात्रा पर बवाल बढ़ चुका है। कश्मीर में धर्म के ठेकेदार अपनी सियासी दुकानों को फिर से सजाने संवारने में लगे हैं। निशाना बनी है कश्मीरी पंडितों की वो परम्परागत धार्मिक यात्रा जिसका सदियों पुरान इतिहास है। आखिर क्योंकर अलगाववाद के नाम पर दूसरों की धार्मिक भावनाओं से छेडख़ानी किसी भी लोकतांत्रिक देश में जायज हो सकती है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब इस सरहदी सूबे ने भूमि विवाद आदोंलन की तपिश झेली थी। इस रियासत में यह दूसरा अब तक का सबसे बड़ा आदोंलन था जिसमें कई लोग जान से गए करोड़ों रूपए की संपत्ति स्वाह हो गई।

कारण क्या था, मात्र इतना की इन्ही अलगाव पंसद नेताओं को अमरनाथ यात्रा से पर्यावरण के दूषित होने का खतरा महसूस हुआ था। यह जानते बूझते भी कि इस वार्षिक यात्रा से हजारों कश्मीरियों की रोजी-रोटी चलती है। अब भी स्थिति यथावत है, कौसरनाग यात्रा को रोकने के पीछे हुर्रियत नेता कारण पर्यावरण को बता रहे हैं। रियासती सरकार ने शोपियां और कुलगाम से होकर जाने वाली इस यात्रा को रद्द कर दिया। क्या यह सही है। इस सूबे में आखिर सरकार है किसकी, आवाम की या फिर कट्टरता का जहर बोने वाले इन हुर्रियत नेताओं की। विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और मौजूदा सरकार इन नेताओं को नाराज नहीं करना चाहती।

क्या यह न्यायोचित है कि आप लोकतंत्र में किसी की धार्मिक भावनाओं का गला घोंट दें। वो भी ऐसे समुदाय को जो दशकों से विस्थापन का दर्द झेल रहा है। कौसरनाग यात्रा नयी नहीं है सदियों से चली आ रही है लेकिन आतंकवाद के उस नासूर ने जो इन कश्मीरी पंडितों के दिलों में आज भी टीसें भरता है इन्हें इस यात्रा से दशकों महरूम रखा। और अब जबकि केन्द्र में स्थापित मोदी सरकार कश्मीरी पंडितों की घर बापिसी के रास्ते तलाशने में लगी है इस यात्रा के नाम पर पकने वाली स्वार्थ की सियासी रोटियां फिर से तवे पर हैं। झुलसेगा आम आदमी फिर चाहे वो कश्मीर का हो या जम्मू का। अगर किसी शिकारे वाले से जाकर पूछें कि वो बीते सालों से क्या तलाश कर रहा है तो जबाव होगा पयर्टक। ऐसे कितने ही घरेलू व्यपार पतन के मुहाने पर खड़े हैं जो कभी कश्मीर की पहचान हुआ करते थे। कश्मीर का केसर, कश्मीर में बनने वाले बल्ले, कश्मीरी ड्राई फ्रूट, पश्मीना शॉल और भी कितना कुछ, सब कहानी बन कर रह गया। सिर्फ इसलिए कि भारत के इस अभिन्न अंग को यहां के अलगाववादी व्यक्तिगत जागीर मानते हैं। पर्यावरण की दुहाई देने वाले इन नेताओं के पास इस बात का जबाव है कि विश्व प्रसिद्ध डल झील की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या कभी इन नेताओं ने सरकार के खिलाफ इस झील की साफ सफाई को लेकर आवाज उठाई है? फिर आखिर क्यों जब बात किसी अन्य धर्म विशेष या उसकी धार्मिक भावनओं की आती है तो यह नेता पर्यावरण का राग अलापना शुरू कर देते हैं।

नजरबंदी का ड्रामा: पिछले दिनो हुर्रियत नेता नजरबंद थे लेकिन बावजूद इसके आवाम को दूरभाष के जरिए इनमें से कुछेक नेताओं द्वारा इस्राइली विरोध प्रदर्शन को लेकर सम्बोधित किया गया। कश्मीर के तमाम हुर्रियत नेता न जाने कितनी बार नजरबंद हो चुके हैं लेकिन आवाम को भड़काने में इनकी नजरबंदी कहीं आड़े नहीं आती। सड़कों पर जमकर पत्थर बरसते हैं। जगविदित है कि कश्मीर में एक समय ऐसा भी था जब पत्थरबाज किराए पर मिला करते थे। समझ नहीं आता कि देश के जाने-माने पत्राकरों की कलमें भी जबाव दे देती हैं जब इन तथाकथित नेताओं और उनकी ङ्क्षहसक कार्यशैली की बात आती है। जहां पर दो बातें हैं या तो कश्मीरी पंडित भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में रहते ही नहीं हैं और अगर रहते हैं तो उनकी इस धार्मिक यात्रा को रोकने की मजाल इन अलगाववादी नेताओं की कैसे हो सकती है।

केन्द्र और कश्मीरी पंडितों की बापिसी : नरेन्द्र मोदी सरकार का सत्तासीन होने के बाद पहला प्रयास कश्मीरी पंडितों की घर बापिसी को लेकर था, अलग होमलैंड की बात भी सामने आई। क्या यह संभव है कि जिस खित्ते में उन्हें महज एक धार्मिक यात्रा की इजाजत न हो वहां पर उनकी बापिसी सहजता से हो जाएगी। ऐसा होना सीधे सीधे लोकतंत्र पर प्रहार है। इस मर्तबा अमरनाथ यात्रा के दौरान क्या हुआ, मामूली से विवाद को तूल दे दिया गया और यात्रा अपने आखिर पड़ाव में सिमट सी गई। दर्जनों टैंट राख हो गए, लंगर और भंडार स्थलों को नुक्सान पहुंचा। पर्यावरण की बात अगर हो ही रही है तो जहां पर यह बताना जरूरी होगा कि जो जंक और फास्ट फूड यात्रा के दौरान प्रतिबंधित था वो निजी दुकानों पर खुलेआम बिका। और तो और नहाने और पीने का गर्म पानी बोतलों के हिसाब से बिका। फिर रूलस फॉर फूलस् जैसी स्थिति क्यों है यह एक बड़ा सवाल है।

कौसरनाग यात्रा के लिए संबंधित जिला आयुक्त द्वारा आधिकारिक तौर पर अहरबल वॉटरफाल रास्ते से यात्रा की अनुमति दी गई। बकायादा इस आधिकारिक पत्र की कॉपी सोशल साइट्स पर वायरल हो चुकी है लेकिन अब सरकार कथित रूप से यात्रा का पारम्परिक मार्ग रियासी से बता रही है जिसे न तो कश्मीरी समुदाय मानने को तैयार है और ना ही इस यात्रा से जुड़ा हुआ पौराणिक इतिहास ही इसकी वकालत करता है।

स्पष्ट शब्दों में दो टूक कहा जाए तो यह इस राज्य की बदकिस्मती ही है कि सरकार भले ही किसी भी राजनैतिक दल की रही हो लेकिन सत्ता में वही पार्टी किंग मेकर की भूमिका में रही है जिसका वजूद और जनाधार कश्मीर आधारित था। अब भी आलम यही है। ऐसे में परिसीमन के जिन्न को बाहर आने में सालों लगेंगे और तब तक इसी प्रकार से खित्तेवाद की राजनीति पर टिकी सरकारें इस लोकतांत्रिक देश के आजाद नागरिकों की धार्मिक भावनाओं का गला घोंटती रहेंगी।

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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