नए विश्वविद्यालय खोलने की बजाय गुणात्मक शिक्षा देने की जरूरत

टैक्नीकल शिक्षा प्राप्त करने का ऐसा दौर पंजाब में चला कि नित नए कालेज, नित नए विश्वविद्यालय सरकारी, गैर-सरकारी खुलते चले गए। बाढ़-सी आ गई इंजीनियरिंग कालेजों की, ऐसी यूनिवर्सिटीज की। पिद्दी सा पंजाब और उसमें इतने विश्वविद्यालय कि लोग दांतों तले उंगली दबाने लगे। समाज मेें भेड़चाल भी ऐसी कि हर मां-बाप अपने बच्चे को इंजीनियर बनाने दौड़ पड़ा। बी.सी.ए., एम.सी.ए., बी.बी.ए., एम.बी.ए., कम्प्यूटर इंजीनियरिंग, आई.टी.आई. ऐसे कोर्सों की भरमार आ गई। क्लासिकल और परम्परागत विषय मानो समाज भूल गया। ऐसे विषयों की संख्या कालेजों और विश्वविद्यालयों में उत्तरोत्तर घटती चली गई। वैश्वीकरण और टैक्नोलॉजी का दौर शिक्षा में छा गया। एक-दो साल चला फिर टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी स्टैगनेशन आ गई। प्लेसमैंट रुक गई। पर पता नहीं क्यों ऐसे इंजीनियरिंग कालेजों की बाढ़ रुक नहीं रही। ऐसे विश्वविद्यालय खुलते ही जा रहे हैं।

संख्यात्मक रूप से देखें तो उच्च शिक्षा देने में पंजाब भारत के अन्य प्रांतों से बहुत आगे है। टैक्नोलॉजी शिक्षा में इतने कालेज और विश्वविद्यालय हो गए हैं कि इंजीनियरिंग की शिक्षा में अब स्टैगनेशन आ गई है। इंजीनियरिंग की 20 हजार सीटें खाली पड़ी हैं। इंजीनियरिंग की डिग्री लिए पंजाब का नौजवान बेकार घूम रहा है। कम्पनियों, कारखानों और उद्योगों में नौकरियां मिल नहीं रहीं।

अत: पंजाब सरकार शिक्षा के विस्तार के स्थान पर अब रिसर्च पर शिक्षा को केन्द्रित करे। टैक्नीकल शिक्षा देने के नाम पर विद्यार्थियों का शोषण हो रहा है। बहुत महंगी टैक्नीकल शिक्षा। पंजाब के बुद्धिजीवी, वाइस चांसलर्ज, शिक्षाविद् और ब्यूरोक्रेट सोचें कि टैक्नीकल शिक्षा में आई स्टैगनेशन को कैसे दूर करना है और टैक्नीकल शिक्षा के डिग्री धारकों को उद्योगोन्मुखी कैसे बनाना है। विस्तार और संख्यात्मक रूप से कालेजों, विश्वविद्यालयों को बढ़ाते जाने के स्थान पर इस शिक्षा को सकारात्मक, गुणात्मक और उपयोगी कैसे बनाना है। इस ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

कालेज बहुत खुल गए, विश्वविद्यालय बहुत हो गए, अब क्वालिटेटिव शिक्षा पंजाब में उभरे। रिसर्च वर्क केन्द्रित शिक्षा बने, उद्योग केन्द्रित बने और रोजगारोन्मुख शिक्षा बने। नए कालेज, नए विश्वविद्यालय थोड़ी देर बंद। पहले टैक्नोक्रेट्स, इंजीनियरिंग डिग्री धारकों को एडजस्ट करे पंजाब सरकार।

पंजाब टैक्नीकल यूनिवर्सिटी ने पिछले डेढ़ दशक में टैक्नीकल एजुकेशन में कई मील पत्थर गाड़े हैं। तीन लाख इंजीनियर्स तैयार कर चुकी है। 6 लाख विद्यार्थी भिन्न-भिन्न टैक्नीकल विषयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। पंजाब टैक्नीकल यूनिवर्सिटी ने अपना एक नाम पैदा किया है। अपना इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है। दान-अनुदान लेकर अपनी पहचान बनाई है। अब जब यह यूनिवर्सिटी फल देने लगी है तो इसके समांतर महाराजा रणजीत सिंह के नाम पर एक और यूनिवर्सिटी भटिंडा में पंजाब सरकार बनाने लगी है। इसी यूनिवर्सिटी में सॉलीडैरिटी लाने के स्थान पर पंजाब टैक्नीकल यूनिवर्सिटी, जालंधर को कमजोर करने का मन सरकार बनाने लगी है। 1997 में इसे बनाया, पंजाब के टैक्नीकल कालेजों को इससे जोड़ा, बीसियों आई.टी.आई. की इमारतों के रख-रखाव,उनकी मशीनरी को सम्भाल पंजाब के शिक्षा जगत की रक्षा की, अब सरकार अपने ही संस्थान को विभाजित करेगी।

पंजाब टैक्नीकल यूनिवर्सिटी को ताकत देने की बजाय उसके समांतर एक और संस्थान खड़ा कर पंजाब सरकार शिक्षण संस्थाओं की संख्या तो भले बढ़ा ले परन्तु गुणात्मक शिक्षा को धक्का लगा रही है। शिक्षार्थियों के विश्वास को कमजोर करने जा रही है। एक और टैक्नीकल यूनिवर्सिटी की मांग उस इलाके के लोगों ने की ही नहीं। पंजाब के पैसे का बहाव पहले ही भटिंडा की ओर है। लोगों और खास कर विपक्षी पार्टी पहले ही बादल सरकार पर दोआबे और माझे क्षेत्र की अनदेखी कर मालवा को अधिमान देने का आरोप लगा रही है। उस पर पंजाब टैक्निकल यूनिवर्सिटी के समांतर यूनिवर्सिटी बनाना टैक्नीकल शिक्षा को कमजोर करना है। पैरों पर खड़े हो रहे एक शिक्षा संस्थान के अस्तित्व को खतरा पहुंचाना है। पंजाब सरकार टैक्नीकल यूनिवर्सिटी, जालंधर का सहारा बने। इस विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों का मनोबल बढ़ाए और पंजाब के सभी सरकारी, गैर-सरकारी कालेजों को इसी एक यूनिवर्सिटी से जोड़ कर क्वालिटेटिव शिक्षा के प्रोत्साहन में अपना योगदान दे।

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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