इस्राइल और हमास, एक अंतहीन विवाद

दुनिया के लगभग हर लोकतांत्रिक देश में गाजा पट्टी पर इस्राइली हमले का पुरजोर ढंग से विरोध हो रहा है। भारत की बात करें तो कश्मीर भी इसका अपवाद नहीं है, जहां इस्राइली हमलों का निरंतर और ङ्क्षहसक विरोध देखा गया है। स्वाभिक भी है क्योंकि सोशल साइटों पर अपलोड होने ऐसी तस्वीरें जिनमें फिलस्तीनी बच्चों की लाशें और बर्बादी का खूनी मंजर दुनिया के सामने आ रहा है चंगे भले आदमी को सवेंदनशील करने के लिए काफी है। लेकिन इस्राइल के ‘आप्रेशन प्रोटेक्टिव एज’ को नए सिरे से समझने और तार्किक ढंग से देखने की भी जरूरत है। जगविदित है कि सुन्नी आतंकी संगठन हमास ने गाजा के रिहायशी और सघन आबादी बाले इलाकों में अपनी युद्ध सामग्री एकत्रित की है।

आठ जुलाई से जारी इस्राइल के खूनी हमलों में अब तक 1939 फिलस्तीनी मारे जा चुके हैं जबकि 67 इस्राइलियों को भी जान गंवानी पड़ी है। अब तक के इस खूनी खेल में सोशल साइटों पर अॅपलोड हुई तस्वीरों में फिलस्तीनी बच्चों के क्षत विक्षत शव मार्मिक सवेंदनाओं को झिंझोड़ देते हैं। सुखद: खबर है कि मिस्र की मध्यस्थता के बाद बीते 84 घंटों से संघर्ष विराम सफल रहा है। काइरो में भी इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि हमास ने स्थाई समझौते के लिए इस्राइल द्वारा आठ साल पुरानी किलेबंदी को खत्म करने की शर्त रखी है। निकट भविष्य में क्या होता है यह तो जल्द सामने आ जाएगा लेकिन इस इतने बड़े अतंर्राष्ट्रीय विवाद पर मनन की आवश्कता है। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न तो यथावत कायम है कि आखिर क्यों इस्राइल गाजा पर लगातार हमले करता चला जा रहा है।

कुछ देर के लिए मान भी लिया जाए कि इस्राइल अतंर्राष्ट्रीय बिरादरी को यकीन दिलाने में सफल रहा है कि यह सब वो अपनी और अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कर रहा है बावजूद इसके किसी भी देश को अपनी संप्रभुता और अस्तिव बचाए रखने का पूरा अधिकार है, और खासतौर से जब कट्टरता की विषबेल पर उपजे खूनी जेहाद की बात हो तो यह और भी गंभीर मुद्दा हो जाता है। नतीजतन बदकिस्मती से गाजा पर हमलों का सिलसिला बीते कल तक बदस्तूर जारी था।

मुस्लिम आतंकवाद और इस्राइल : भारतीय आजादी के एक साल बाद प्रभाव में आए यह यहूदी देश आरंभ से ही फलस्तीन सहित मध्य पूर्व में सक्रिय आतंकी संगठनों के हमलों से दो चार होता रहा है। इस्राइल पर हुए हमलों की फेयरिस्त भी लम्बी चौड़ी है। तारीख गवाह है कि इस्राइली खिलाडियों पर फलस्तीनी आतंकियों ने साल 1972 में म्युनिख के ओलंपिक में हमला किया था। 11 सदस्यीय टीम को अगवा कर लिया गया जिसके बाद उनका बेरहमी से कत्ल किया गया। इस घटना में जर्मन पुलिस का एक अधिकारी भी मारा गया था। हमले की जिम्मेदारी ब्लैक सितंबर नामक फलस्तीनी आतंकी गुट ने ली थी जिसकी मांग उन 234 कैदियों को छुड़वाने की थी जो उस समय इस्राइली जेलों में बंद थे।

इसके ठीक दो साल बाद मालोट में एक दफा फिर डैमोक्रेटिक फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फलस्तीन (डी.एफ.एल.पी.) ने लेबनान के रास्ते आकर 115 इस्राइलियों को बंदी बना लिया जिसमें 105 स्कूली बच्चे शामिल थे। 15 मई 1974 को हुए इस हमले में 22 फलस्तीनियों को छोडऩे की मांग की गई लेकिन इस्राइल के न झुकने और प्रत्युत्तर में हमला करने पर 25 लोग मारे गए जिनमें 22 बच्चे शामिल थे जबकि 68 अन्य घायल हो गए। इस्राइली इतिहास में योम किप्पर युद्ध का जिक्र भी यहां पर तर्कसंगत है। इसे रमदान वॉर या अक्तूबर वॉर के नाम से भी जाना जाता है। अरब-इस्राइल युद्ध 6 अक्तूबर से 25 अक्तूबर 1973 तक लड़ा गया। अरब देशों का यह इस्राइल पर अब तक का सबसे बड़ा हमला था जिसकी अगुवाई मिस्र और सीरिया ने की थी।

अरब देशों ने मिलकर इस्राइल के योम किप्पर पर एकाएक हमला बोला। यह दिन यहूदी धर्म में तो पवित्र माना ही जाता है अलबत्ता मुस्लिम समुदाय में भी रमदान का महीना चल रहा था। मिस्र और सीरिया की फौजों ने सीमा रेखा का उल्लंघन करते हुए सिनाई प्रायद्वीप और गोलान हाइट्स से इस्राइल इलाकों पर धावा बोला जिसे इस्राइल ने सन 1967 में छह दिनों के युद्ध में जीता था। इस बड़े हमले में भी इस्राइल ने संयमपूर्वक और नीतिगत ढंग से युद्ध लड़ा और मात्र तीन दिनों में अपना बर्चस्व बचाए रखने में कामयाब हो गया। इस युद्ध के बाद सारे अरब देशों सहित मिस्र को खासतौर से यह समझ में आ गया कि इस्राइल के साथ भिडऩा निरर्थक है। सिलसिलेवार बात करें तो आजादी के बाद सन 1949 में युद्वविराम की घोषणा के साथ ही 50 फीसदी से ज्यादा इलाके पर इस्राइल का कब्जा हुआ। सन 1959 में यासिर अराफात ने नए संगठन फतह की शुरूयात की जिसके बाद सन 1964 में फिलस्तीन मुक्ति संगठन प्रभाव में आया। सन 1967 में इस्राइल ने छह दिनी युद्ध में जीत हासिल कर पड़ोसी मुल्कों को हरा दिया और एक बड़ा इलाका फिर इस्राइल के कब्जे में आया। तदोपरांत सन 1972 के म्यूनिख ओलंपिक और योम किप्पर युद्ध का जिक्र मैने पहले किया है। सन 1979 में मिस्र ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए और सिनाई का इलाका उसे बापिस मिल गया। हालांकि अरब देशों ने इसका मिस्र का वहिष्कार किया।

सन 1982 में लेबनान में घुसपैठ हुई जहां फिलस्तीनी नागरिकों का नरसंहार हुआ। यह वह दौर था जब फिलस्तीन दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह बना रहा था। सन 1987 में फिलस्तीन ने क्रांति की घोषणा की जिसके बाद अगले ही साल यानि सन 1988 में फिलस्तीन नामक इस देश को दुनिया के 130 देशों ने मान्यता दे दी। इन देशों में भारत भी शुमार था। नब्बे के दशक में अराफात एक बड़े नेता के तौर पर उभरे और सन 1994 में उन्हें यित्जाक, रॉबिन और शिमोन पेरेज के साथ शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। सन 2000 में अमेरिकी पहल पर कैंप डेविड में क्लिंटन ने पश्चिमी तट और गाजा का फिलस्तीनी इलाका बापिस करने का प्रस्ताव रखा लेकिन अराफात ने इंकार कर दिया। सन 2004 में अराफात की मौत हुई। बावल उठा और इस्राइल द्वारा अराफात को आर्सेनिक जहर दिए जाने के आरोप लगे। अब अगर आखिर के दशक में नजर डालें तो महमूद अब्बास के सन 2005 में फिलस्तीन प्राधिकार के चेयरमैन बनने के बाद हमास ने संसदीय चुनावों में गाजा में जीत दर्ज की जिसका इस्राइल ने विरोध किया।

सन 2008 में हमास द्वारा दागे गए रॉकेटों के जबाव में इस्राइल ने ऑप्रेशन हॉट विंटर की शुरुयात की। इसके बाद अगले साल ऑप्रेशन कास्ट लीड में 1000 नागरिक मरे जिनमें से 900 के करीब फिलस्तीनी थे। 2010 में तुर्की के कुछ कार्यकर्ताओं ने इस्राइली नौसैनिक घेराबंदी को तोडऩे का असफल प्रयास किया जिसमें 9 लोग मारे गए। साल 2011 में इस्राइल के अंदर बसों में धमाके हुए और फिलस्तीन अलग राष्ट्र की मांग के लिए संयुक्त राष्ट्र की चौखट पर पहुंचा। 2012 में हमास के हथियारों को तबाह करने के लिए ऑप्रेशन शुरू हुआ। 2013 में हमास द्वारा इस्राइली सैनिक के मार गिराने का मामला सामने आया जिसके बाद 2014 में सुरंगों को नष्ट करने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया जिसमें करीब 800 नागरिक मारे गए। अब फिर से हालात वैसे ही हैं।

इस्राइल द्वारा पेश किए गए हालिया संभावित हल: यरुशलम पोस्ट की मानें तो इस्राइली विदेश मंत्री एविग्दोर लिबरमैन के कथानुसार इस्राइल युद्धविराम के बाद विदेशी सुरक्षाबलों को गाजा में लाने के लिए तैयार है। हालांकि इस्राइली विदेश मंत्रालय की सात पन्नों वाली ताजा रिर्पोट के अनुसार तीन संभावित हल पेश किए गए हैं जिसका खाका जाने-माने पत्रकार हर्ब कीन्नन ने खींचा है। पहला हल विदेशी फौजों को गाजा पट्टी पर स्थित हथियारों को खोजने और नियंत्रण में लेने की बावत है।

दूसरे हल में यू.एन. के चैप्टर छह का हवाना देते हुए कहा गया है कि विदेशी फौजों को संघर्ष विराम के उल्लंघन पर रिर्पोट करने, सैन्य अभियानों को कम करने की कवायद, गाजा में पुनर्वास की योजना को लागू करना, आतंकवादी गतिविधियों पर रिर्पोट करना आदि शामिल हैं। तीसरा संभावित हल जो इस रिर्पोट में पेश किया गया है के अनुसार यू.एन. से बाहर जाकर आपसी तालमेल से सिनाई और हैबरान में अस्थाई अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति की तर्ज पर वहुराष्ट्रीय ताकतों द्वारा नए राष्ट्र के गठन को लेकर है।

अमेरिका में कुछ यहूदी मेरे परिचित थे। न केवल उनकी वेशभूषा बल्कि उनका व्यवहार भी उन्हें अमेरिका में मौजूद अधिकतर देशों के नागरिकों से अलग खड़ा करता था। गौरतलब है कि न्यूयार्क में अगर विदेशी पूंजीपतियों की बात की जाए तो यहूदियों का नाम सबसे ऊपर है। और यही पूंजीपति लॉबी जो देशप्रेम के लिए जानी जाती है अमेरिका और इस्राइल के बेहतर रिश्तों के लिए पुल का काम करती है। यहूदियों का देशप्रेम अनूठा है और यह बात काबिलेतारीफ भी है। ऐसे में अगर इस्राइल अपने बजूद को बचाने के लिए अरब देशों के आगे आरंभ से ही चुनौती बना हुआ है तो इन अरब देशों को भी यह समझना होगा और इस्राइल को एक पड़ोसी के तौर पर स्वीकार करना ही होगा। क्योंकि आप सब बदल सकते हैं पर अपना पड़ोसी नहीं। गाजा में अगर वास्तव में लोकतांत्रिक व्यवस्था निर्मित होती है और हमास की जगह जनता के नुमांइदे चुनावी प्रक्रिया के बाद लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं तो उम्मीद जताई जा सकती है कि इस विवादित अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे का हल निकालना संभव हो सकेगा।

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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