अब ‘जेहाद’ के निशाने पर भारत

ईराक और सीरिया में कथित इस्लामी राज स्थापित करने को लेकर चल रहे गृह युद्ध का नंगा चेहरा दुनिया के सामने आने लगा है। वहां आई.एस.आई.एस. के लड़ाके उत्तरी ईराक, उत्तर मध्य के निनेवाह प्रांत और उत्तर-पूर्वी कुर्दिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक यजीदियों के नरसंहार में जुटे हैं। प्वाइंट ब्लैंक से 2-3 महीने के बच्चों तक को गोली मारने से लेकर यजीदियों को सामूहिक रूप से जिंदा दफनाया जा रहा है। विडंबना यह है कि फिलस्तीन मुद्दे पर इसराईल कीकटु निंदा करने वाले सैकुलरिस्ट इस हिंसक घटनाक्रम पर दबी जुबान से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं।

विश्व भर में करीब 6 लाख यजीदी हैं जिनमें से अधिकांश (4 से 5 लाख) ईराक में निवास करते हैं और खुद को तुर्क मानते हैं किंतु कट्टरपंथी सुन्नी उन्हें ‘शैतान का उपासक’ बता उनके सफाए की निरंतर कोशिश करते आए हैं। अब जबकि ईराक और सीरिया में सुन्नी आतंकी संगठनों का कब्जा हो चुका है, यजीदियों को बड़े पैमाने पर मौत के घाट उतारा जा रहा है। यजीदियों ने पलायन कर पहाड़ोंमें शरण ले रखी है जिसे चारों ओर से आतंकियों ने घेर रखा है। छोटे बच्चे और बूढ़े भूख-प्यास से दम तोड़ रहे हैं। इंटरनैट पर आतंकियों द्वारा अपलोड की जा रही तस्वीरें हृदयविदारक हैं। मानवता की सेवा करने का दावा करने वाले इस्लाम का यह कैसा संस्करण है?

इन दिनों इंटरनैट पर भारत को लक्षित कर जेहाद छेडऩे के आह्वान वाले कई वीडियो भी सामने आए हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु से कई मुस्लिम युवाओं के ईराक जाने और आई.एस.आई.एस. के साथ जेहाद में शामिल होने की खबरें ङ्क्षचताजनक हैं। अल इसाबा मीडिया की ओर से गजनवी हिंदी नामक वैबसाइट पर हिंदी में ‘जिहाद में शिरकत के 44 तरीके’ और उर्दू में ‘जेहाद- दि फॉरगॉटन ऑब्लिगेशन’ डालकर मुस्लिम समुदाय में मजहबी उन्माद पैदा करने का प्रयास किया गया है। मीडिया खबरों के अनुसार यह प्रचार सामग्री कथित तौर पर किसी अनवर अवलाकी द्वारा लिखित है जिसका अनुवाद उबैदा अल हिंदी ने किया है। इससे पहले दुनिया के मुस्लिमों के लिए खुद को खलीफा घोषित किए बैठे आई.एस.आई.एस. के मुखिया अबू बकर अल बगदादी ने भारत के खिलाफ जेहाद छेडऩे का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘भारत भी उन देशों में से एक है, जहां मुस्लिमों के अधिकार जबरन दबाए रखे गए हैं।’’ कश्मीर घाटी के अलगाववादियों के साथ देश के अन्य भागों में यदि ऐसे वीडियो मजहबी उन्माद पैदा करने में सफल हो रहे हैं तो इसके लिए सैकुलरिस्टों के दोहरे मापदंड ही कसूरवार हैं।

सुन्नी कट्टरपंथियों के हाथों यजीदियों का जिस तरह नरसंहार हो रहा है, अस्सी-नब्बे के दशक में जम्मू-कश्मीर की संस्कृति के मूल वाहक, कश्मीरी पंडित क्या उसी जेहादी मानसिकता के शिकार नहीं हुए? कश्मीरी पंडितों के मानवाधिकार और उनकी घर वापसी के लिए कभी आवाज तक नहीं उठाई गई। क्यों? आज जब भाजपा नीत राजग सरकार उनकी घर वापसी का प्रयास कर रही है तो एक बार फिर घाटी के अलगाववादी उसका हिंसक विरोध कर रहे हैं। नवम्बर माह में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए प्रदेश का सत्ता अधिष्ठान अलगाववादियों के सुर में सुर मिला रहा है, जिसका ताजा प्रमाण कश्मीरी पंडितों के कौसरनाग तीर्थयात्रा पर लगाया गया सरकारी प्रतिबंध है।

अलगाववादी नेता और सरकार का कुतर्क है कि कौसरनाग यात्रा का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है और यह घाटी की शांति और सौहार्द को भंग करने का प्रयास है। 12वीं सदी में कल्हण द्वारा लिखित ‘राजतरंगिनी’ में जम्मू-कश्मीर का इतिहास दर्ज है। इसमें कौसरनाग यात्रा का उल्लेख मिलता है। कश्मीरी पंडित सदियों से यहां नागपंचमी के दिन 6 दिन का तीर्थ कर भगवान विष्णु की उपासना करते आए हैं। कौसरनाग दक्षिणी कश्मीर के शोपियां जिले में पीरपंजाल की पर्वत शृंखलाओं में स्थित पवित्र झरना है। कौसरनाग की तीर्थयात्रा के लिए कश्मीरी पंडित 2 रास्तों से आते रहे हैं। एक जम्मू के कटरा से और दूसरा रास्ता घाटी के कुलगाम से कौसरनाग को जाता है।

‘निजाम-ए-मुस्तफा’ कायम करने के लिए नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों का सुनियोजित नरसंहार हुआ, वे पलायन करने को मजबूर हुए इसलिए घाटी में आतंकवाद के भयावह दौर के बाद कुलगाम से तीर्थयात्रा भले ही बंद हुई हो किंतु कटरा से यह तीर्थयात्रा अबाधित चली आ रही है। आज जब 25 साल बाद हिंदू कुलगाम से कौसरनाग तीर्थ पर जाना चाहते हैं तो अलगाववादियों के दबाव में सरकार ने इस रास्ते से तीर्थयात्रा करने पर ही पाबंदी लगा दी। दुनिया में कौन-सा ऐसा देश होगा, जहां के बहुसंख्यकों के ही मानवाधिकार और पूजा-अर्चना की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगती हो? बगदादी भारत पर मुस्लिमों को प्रताडि़त करने का आरोप लगाता है। उसे बताना चाहिए कि भारत के अलावा कौन-सा देश है जो राजकोष के हर्ज पर हज का फर्ज पूरा कराता है?

कौसरनाग तीर्थयात्रा का विरोध करने वाले अलगाववादियों का कुतर्क है कि इसके द्वारा घाटी की मुस्लिम बहुल पहचान को परिवर्तित करने का प्रयास किया जा रहा है। राज्य सरकार ने कुलगाम से 4 दिन की यात्रा की अनुमति दी थी, किंतु जैसे ही अलगाववादियों ने हड़ताल और बंद की धमकी दी, सरकार को बहाना मिल गया और कुलगाम से तीर्थयात्रा पर रोक लगा दी गई। यह कोई नई घटना नहीं है। अलगाववादियों के दबाव में हर साल अमरनाथ यात्रा को भी बाधित करना आम बात है। इस बार भी अलगाववादियों ने बालटाल पर हिंसा मचाकर तीर्थयात्रियों को भयग्रस्त करने का प्रयास किया। खलीफा होने का दावा करने वाला बगदादी बताए कि क्यों मुस्लिम बहुल इलाकों में दूसरे मतानुयायियों को अपने मत के अनुसार जीने और पूजा-अर्चना की छूट नहीं मिलती?

कश्मीर में पोषित किए जा रहे अलगाववाद का लक्ष्य शेष भारत के साथ कश्मीर के सदियों पुराने सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को नकारना है। नैशनल कॉन्फ्रैंस के फारूक अब्दुल्ला-उमर अब्दुल्ला हों या पी.डी.पी. के मुफ्ती मोहम्मद-रूबीना सईद; इन सब की विचारधारा में मजहबी कट्टरपंथ गहरे पैबस्त है। वस्तुत: वे सभी उसी साजिश के भागीदार हैं, जिससे घाटी को मुस्लिम बहुल बनाना संभव हुआ।

घाटी से कश्मीर की मूल संस्कृति के प्रतीक कश्मीरी पंडितों के बलात् निष्कासन के बाद इस्लामी कट्टरवादियों का एक लक्ष्य पूरा हो चुका है। घाटी काफिर मुक्त (हिंदू रहित) हो चुकी है। ङ्क्षहदुओं के अधिकांश पूजास्थल ध्वस्त हो चुके हैं परंतु कुछ प्रमुख आराध्य स्थल अभी भी जीवंत हैं और कुफ्र का प्रतीक होने के कारण जेहादियों के निशाने पर हैं। अमरनाथ यात्रा के बाद अब कौसरनाग यात्रा का विरोध इसी जेहादी मानसिकता का उदाहरण है। ऐसे में बगदादी को यदि भारत में उर्वर जमीन मिल रही है तो आश्चर्य कैसा?

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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