विवाह में माता-पिता की स्वीकृति

भारत में विवाहों के सम्बन्ध में लागू कानूनों के अनुसार कोई कन्या 18 वर्ष की आयु के बाद किसी भी ऐसे लड़के से विवाह कर सकती है जो 21 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो। भारत के वैवाहिक कानूनों में विवाह के सम्बन्ध में माता-पिता की भावनाओं को कहीं कोई स्थान नहीं दिया गया है। आए दिन थानों और अदालतों में ऐसे प्रार्थना पत्रों की भरमार दिखाई देती है जिनमें लड़की के माता-पिता अपनी बेटी के विवाह की शिकायत करते नजर आते हैं जो उनकी स्वीकृति के बिना हुआ होता है। ऐसे प्रार्थना पत्रों में यदि लड़की की आयु 18 वर्ष से कम हो तो उम्मीद होती है कि माता-पिता के पक्ष में कहीं कोई सुनवाई होगी। परन्तु सुनवाई होते-होते कुछ महीने या वर्ष बीत जाने पर उस सुनवाई का महत्व भी समाप्त हो जाता है क्योंकि तब तक लड़की 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकी होती है।

जहां तक कानून और सांस्कृतिक विचारों में विरोधाभास की बात है तो ऐसी चर्चा का कहीं कोई अन्त नहीं होता। संस्कृति के रक्षक अपने पुराने और पारम्परिक विचारों को हर परिस्थिति में लागू करना चाहते हैं जबकि कानून के पैरोकार बिना कोई तर्क सुने सीधा कानून को तकनीकी रूप में लागू करने का तर्क देते हैं। ऐसी परिस्थिति में संस्कृति और कानून के टकराव में समन्वय का कार्य सरकार को बड़ी समझदारी के साथ करना चाहिए। परन्तु हमारी सरकारें अक्सर तकनीकी कानूनों के सहारे ही कार्य करती हैं। वैसे भी सरकारों को चलाने वाला उच्चाधिकारी वर्ग आधुनिक और पाश्चात्य वातावरण से ग्रसित है इसलिए वे प्राचीन भारतीय संस्कृति के किसी भी विचार को अधिक महत्व दे ही नहीं पाते।

हाल ही में समलैंगिकता को लेकर भी इसी प्रकार कानून और संस्कृति का टकराव सामने आया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तो कानून को केवल तकनीकी रूप से ही देखकर समलैंगिकता के अपराधीकरण वाले प्रावधानों को समाप्त करने का आदेश दे डाला, परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने विषय की बारीकी को समझते हुए समलैंगिकता को अपराध के रूप में ही माना। सर्वोच्च न्यायालय ने केवल सांस्कृतिक कारणों से ऐसा नहीं किया अपितु इसके पीछे मानवीय कारण थे। समलैंगिकता किसी भी दृष्टि से प्राकृतिक जीवन नहीं माना जा सकता था। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से संस्कृति के प्रेमियों को प्रसन्नता हुई।

इसी प्रकार आए दिन ग्रामीण स्तर की पंचायतों के फरमान संस्कृति की रक्षा की आड़ में घोषित किए जाते हैं। अक्सर ऐसे फरमान केवल अंध परम्पराओं के पोषक होते हैं। उनमें कोई मानवीय या प्राकृतिक जीवन पद्धति का आधार नहीं होता, इसलिए ऐसे फरमानों को सदैव कानून के रक्षक कुचलते चले जाते हैं।

विवाहों के सम्बन्ध में एक विशेष पहलू ध्यान देने योग्य है। माता-पिता जब बच्चे को जन्म देते हैं और 18 वर्ष की आयु तक उसके पालन-पोषण का दायित्व निभाते हैं तो विशेष रूप से बच्चियों के लिए योग्य वर की तलाश में अपनी स्वीकृति को वे अत्यन्त महत्वपूर्ण मानने लगते हैं। यह केवल संस्कृति की ही बात नहीं अपितु एक प्राकृतिक इच्छा भी है। इसके अतिरिक्त इसका एक मानवीय आधार भी है। भारत में आज भी पारम्परिक और पारिवारिक सुरक्षा के बीच पली लड़की 18 वर्ष की आयु में भी परिपक्व बुद्धि की नहीं बन पाती है। वह अपने लम्बे जीवन में काम आने वाले विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णय को दूरदर्शिता से नहीं ले पाती। इसलिए कानून के रक्षकों को इस सुझाव पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए कि 18 से 23 वर्ष तक की लड़कियों के विवाह में माता-पिता की स्वीकृति अनिवार्य हो। इसी प्रकार लड़कों के मामले में 25 वर्ष तक की आयु से पूर्व विवाह होने पर भी माता-पिता की स्वीकृति अनिवार्य हो।

यह सुझाव केवल किसी सांस्कृतिक या पारम्परिक आधार पर नहीं है बल्कि फिलीपीन्स जैसे देश में यह विचार कानून के रूप में लागू है। फिलीपीन्स के पारिवारिक कानून के अनुच्छेद-14 में यह स्पष्ट कहा गया है कि 18 से 21 वर्ष की आयु के बीच की लड़कियों के विवाह का पंजीकरण कराते समय माता-पिता या संरक्षक की स्वीकृति अनिवार्य होगी। इस प्रावधान का पालन किए बिना सम्पन्न हुए विवाह अवैध घोषित किए जाने योग्य होते हैं। इसका अभिप्राय है कि ऐसे विवाहों को अवैध घोषित करने की याचिका माता या पिता भी अदालत में दे सकते हैं। लड़कों के मामलों में 21 से 25 वर्ष की आयु के बीच विवाह होने पर ऐसी स्वीकृति होनी आवश्यक होती है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि विवाह लड़के और लड़की के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है। दोनों को स्वतंत्रता से इस सम्बन्ध में निर्णय का अधिकार अवश्य होना चाहिए, परन्तु इसके साथ ही माता-पिता के अरमानों को भी एकदम 18 वर्ष की आयु के बाद दफन नहीं किया जाना चाहिए। वैसे भी भारत में 18 वर्ष की आयु में लड़की का परिपक्व होना सदैव संदेह से घिरा रहता है, इसलिए कानून को भारतीय वातावरण के अनुसार ही अपने प्रावधान निर्धारित करने चाहिएं।

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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