न्याय मंदिरों में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित हो

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.एम. लोढा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ और न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नारीमन पर आधारित पीठ ने बयान दिया है कि वांछित आधारभूत ढांचे सहित अतिरिक्त अदालतों का सृजन केवल प्रतीकात्मक रूप में ही नहीं बल्कि वास्तविक तौर पर होना चाहिए। फिर भी कुछ असाधारण परिस्थितियों में बलात्कार और दागी सांसदों व विधायकों के मामले में न्याय की सुस्त रफ्तार से हताश हो चुके लोगों का विश्वास बहाल करने हेतु अतिवांछित फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित करने के लिए प्रतीकात्मक शुरूआत भी बहुत सहायक हो सकती है।

विभिन्न अदालतों में वर्ष दर वर्ष लंबे समय से जमा हो रही मुकद्दमों की भारी बैकलॉग पर जरा दृष्टिपात करें। यह तथ्य देश की न्यायपालिका की कोई बढिय़ा छवि प्रस्तुत नहीं करता। इसके लिए दोषी कौन है? देश की सरकार के साथ-साथ शीर्ष न्यायपालिका को इस दोष की जिम्मेदारी आधी-आधी बांटनी होगी। जहां अदालतों में रिक्त स्थानों को भरने और आधारभूत ढांचे की कमी को पूरा करने के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रशासकीय अधिकारी कई दशकों से रींग-रींग कर चल रहे हैं, वहीं न्यायप्रणाली को सुधारने की दृष्टि से सुप्रीम कोर्ट ने भी मुश्किल से ही कोई पहलकदमी की है। मुकद्दमे लड़ रहे लोगों की परेशानियों का कभी ध्यान नहीं रखा गया। यह भी कोई लुकी-छिपी बात नहीं कि न्याय प्रणाली में मौजूद कुछ निहित स्वार्थ कानूनी भाईचारे के साथ मिलीभगत करके न्याय प्रक्रिया को लटकाए रखने के खेल में लगे रहते हैं, जिससे गरीब मुद्दइयों का ही नुक्सान होता है। इस संबंध में जितनी कम टिप्पणी की जाए, उतना ही बेहतर होगा। हैरानी की बात नहीं कि जानकार हलकों में अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि ‘परवाह किसको है?’

अब पानी सिर से गुजर चुका है। लोकतांत्रिक भारत की व्यवस्था से जहां जनसमूह गुणवत्तापूर्ण गवर्नैंस की उम्मीद लगाए हुए हैं, वहीं न्याय प्रणाली के सभी स्तरों पर तेज रफ्तार एवं निष्पक्ष मुकद्दमा प्रक्रिया की भी कामना करते हैं। बहुत आडंबरयुक्त भाषणों और उपदेशों के स्थान पर लोग सरकार जितनी ही पारदर्शी, जवाबदेह और जनसंवेदनाओं के प्रति सजीव न्यायपालिका चाहते हैं-खास तौर पर महिलाओं और बच्चों से होने वाले दुष्कर्मों और संसद एवं विधानसभाओं की गरिमा को धूमिल कर रहे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों और विधायकों के मामले में। ताजा-तरीन आंकड़ों के अनुसार आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसदों और विधायकों की संख्या 1460 है, यानी कि वर्तमान में मौजूद 4807 सांसदों और विधायकों की कुल संख्या का 30 प्रतिशत। ये तथ्य बहुत ही विचलित करने वाले हैं।

यह सत्य है कि गत वर्ष अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने रूङ्क्षलग दी थी कि सजा पाने के बाद चुने हुए जनप्रतिनिधि अपने पद पर जमे नहीं रह सकते और आपराधिक सजा होने का तात्पर्य यह होगा कि तत्काल प्रभाव से चयनित प्रतिनिधि अयोग्य हो जाएगा। फिर भी वास्तविक प्रश्र यह है कि जनता के जो दागी प्रतिनिधि करदाताओं की कीमत पर अपनी सुख-सुविधाओं का आनंद लेना जारी रखते हैं, उन्हें दंड दिलाने की प्रतिक्रिया में तेजी किस प्रकार आए। इस मामले में विलम्ब बिल्कुल ही स्वीकार्य नहीं।

देश की शीर्षस्थ अदालत इस समस्या से भली-भांति अवगत है। यहां तक कि न्यायमूर्ति लोढा ने स्वयं यह स्वीकारोक्ति की है कि ‘‘अपराध न्याय प्रक्रिया उस गति से आगे नहीं बढ़ रही, जिससे मैं चाहता हूं।’’ अपराध न्याय प्रक्रिया का तेज गति से परिचालन करने के लिए अधिक अदालतों की जरूरत है। इस मुद्दे पर भारत के मुख्य न्यायाधीश की दलील निश्चय ही जायज है। फिर भी जिम्मेदारी सरकार के कंधों पर डालने की बजाय हम सुप्रीम कोर्ट की पीठ से भी ऐसी आशा कर रहे थे कि दागदार विधानकारों और दुष्कर्म की शिकार महिलाओं व बच्चों से संंबंधित मुकद्दमों के तेज गति से निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित करने के मामले में वह अधिक बेबाक व संवेदनशील (बेशक प्रतीकात्मक रूप में ही सही) होते हुए पहलकदमी करेगी। इस मामले में राहत की बात केवल इतनी है कि सरकार ने बलात्कार जैसे जघन्य मामलों के विषय में 18 वर्ष की बजाय 16 वर्षीय किशोरों को ‘वयस्क’ मानने के फैसले पर मोहर लगा दी है।

न्यायमूर्ति लोढा ने अपनी ‘खुद की सीमाओं’ के बारे में जो शिकवा किया है वह समझ में आने वाला है लेकिन खेद की बात तो यह है कि इन ‘सीमाओं’ के चलते हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता को अनेक वर्षों से भारी कीमत अदा करनी पड़ रही है। ऐसी सीमाओं के बंधन बिना किसी विलम्ब के चूर-चूर किए जाने चाहिएं।

फिलहाल शीर्ष अदालत ने गेंद फिर से महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी के पाले में फैंक दी है। इसने उन्हें आदेश दिया है कि ‘‘इस समस्या का अध्ययन करें और यह देखें कि अपराध न्याय प्रक्रिया को किस प्रकार फास्ट ट्रैक किया जा सकता है।’’ काश! सुप्रीम कोर्ट की माननीय पीठ ने सामाजिक चिन्ताओं के इन गंभीर मुद्दों पर अधिक आत्मचिन्तन किया होता और अधिक संवेदनशीलता दिखाई होती। पीड़ा भोग रहे लोगों को यह देखकर बहुत प्रसन्नता होती है कि न्यायपालिका अब अधिक संवेदनशील और कार्रवाई करने के मामले में अधिक फुर्तीली हो गई है। इस समय तो न्याय प्रणाली की अपनी ही विश्वसनीयता दाव पर लगी हुई है।

शीर्ष अदालत द्वारा न्यूनतम अदालत से लेकर ऊपर की सभी अदालतों के काम-काज की प्रणाली में सुधार की प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत है। लंबित मामलों की लगातार बढ़ती सूची पर सदा की तरह विलम्ब जारी है। इसके साथ ही साथ न्याय प्रणाली के हर स्तर पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में भ्रष्टाचार भी व्याप्त है। सुप्रीम कोर्ट को अपने तौर पर अनिवार्य रूप में न्याय प्रणाली की सभी कमजोर कडिय़ों की जांच करनी चाहिए और न्याय मंदिरों में जनता की चिन्ताओं के मद्देनजर बेहतर पारदर्शिता, जवाबदेही एवं संवेदनशीलता सुनिश्चित करनी चाहिए।

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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