भारत की राजनीति के महानायक पं. दीनदयाल उपाध्याय

पं.दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्र के सामने उभर कर तब आए जब दिसम्बर 1952 में कानपुर में उनकी देखरेख में भारतीय जनसंघ का पहला विधिवत अधिवेशन आयोजित हुआ और डा. मुखर्जी की पहले अध्यक्ष के नाते ताजपोशी हुई। वहीं उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय को महासचिव बनाने की घोषणा की। तभी से पं. दीनदयाल उपाध्याय ने जनसंघ को वैचारिक व संगठनात्मक दृष्टि से राजनीतिक क्षेत्र में नई दिशा देने और कार्यकत्र्ताओं की चाल, चेहरे व चरित्र को विशिष्ट गुणवत्ता से मंडित करने का अभियान शुरू कर दिया जिसके कारण जनसंघ जनता के बीच ‘पार्टी विद ए डिफ्रैंस’ के विशेषण से पहचानी जाने लगी।

वास्तव में पं. दीनदयाल उपाध्याय बचपन से विशिष्ट जीवन के धनी थे। 3 वर्ष के थे कि पिता का देहांत हो गया, 7 वर्ष के थे कि माता चल बसी, 9 वर्ष के थे कि पालन-पोषण कर रहे नाना जी की मृत्यु हो गई, 18 वर्ष के थे कि छोटा भाई चल बसा। अगले वर्ष नानी जी भी स्वर्गवास हो गईं। हम समझ सकते हैं कि 19 वर्ष के होते-होते उन्हें 5 मौतों का झटका सहना पड़ा किन्तु उन्हें आगे बढऩेमें यह सभी सदमे रोक नहीं पाए और मामाके संरक्षण में पढ़ाई की सीढिय़ां चढ़ते चलेगए।

1937 में वह कानपुर में एम.ए. करने गए तो वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए। बस उन्हें ऐसे लगा कि जैसे उन्हें जीवन का ध्येय मिल गया है। 1942 में वह संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए और 1951 तक वह उसी के माध्यम से राष्ट्र उत्थान के कार्य में जुटे रहे।

1951 में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और 1952 में जनसंघ के संस्थापक महासचिव बने। तब वह मात्र 36 वर्ष के थे। दिसम्बर 1967 में अपने सहयोगियों के आग्रह पर उन्होंने जनसंघ का प्रधान पद संभाला। उस समय जनसंघ का अधिवेशन कम्युनिस्टों के गढ़ माने जाने वाले केरल की राजधानी कालीकट में हुआ, जहां उनकी विधिवत ताजपोशी हुई। यह अधिवेशन जनसंघ के इतिहास में अभूतपूर्व बन गया जिसकी चकाचौंध से विरोधी दलों में हड़कम्प मच गया।

अभी प्रधान पद संभाले 43 दिन भी नहीं हुए थे कि वह कालीकट के जनसंघ के अभूतपूर्व अधिवेशन से उत्पन्न किसी राजनीतिक दल की साजिश का शिकार हो गए और बिहार में रेल यात्रा के दौरान उनकी हत्या कर दी गई और उनका शव रहस्यपूर्ण परिस्थिति में मुगल सराय स्टेशन के यार्ड में पटरी के साथ लिटाया पाया गया। अब एक बार जनसंघ अनाथ की स्थिति में आ गया किन्तु अब वह पं. दीनदयाल उपाध्याय के तप व मार्गदर्शन में किशोर बन चुका था और उसकी जीवनशक्ति संपुष्ट हो चुकी थी किन्तु भाजपा की चाल, चरित्र और चेहरे की चमक कुछ धूमिल हुई है। उसमें भी समय पा कर अन्य दलों की कमजोरियां प्रवेश कर गई हैं। आज भाजपा को जो चुनौतीपूर्ण दायित्व मिला है, वह उसे निभाने में तभी सुर्खरू हो पाएगी जब वह पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा मंडित सिद्धांतों व नीतियों की ओर लौटेगी।

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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