कैसे साकार हो ‘स्वस्थ भारत’ बनाने का सपना

मनुष्य ने बहुत कुछ प्राप्त कर लिया परन्तु धरती पर प्रसन्नता से जीना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। विश्व भर में प्राकृतिक आपदाएं ही नहीं परस्पर की विषमताओं के कारण संघर्ष और विषाद बढ़ता जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग भी नई-नई सीमाएं पार कर रहा है। नित नए शोध हो रहे हैं, बहुत-सी बीमारियों पर विजय प्राप्त कर ली गई परन्तु यह वरदान अब कहीं एक अभिशाप भी बनने लगा है। कुछ वर्ष पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि विश्व में जितने लोग मरते हैं, आधे बीमारियों से मरते हैं और आधे दवाइयों के अधिक और गलत उपयोग से मरते हैं। स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के सामने यह भी एक समस्या बनती जा रही है। एंटीबायोटिक दवाइयों के अनावश्यक उपयोग के कारण कई बीमारियां पैदा हो रही हैं। अमरीका जैसे देश में भी 25 प्रतिशत मौतें इन दवाइयों के गलत व अधिक उपयोग से होती हैं।

दवाई की विपरीत प्रतिक्रिया (एडवर्स ड्रग रिएक्शन) नाम से नया रोग पैदा हो गया है। अधिक और गलत प्रयोग से कुछ दवाइयां अपना प्रभाव खो रही हैं। दवाइयों में मिलावट भी इस समस्या को विकट बना रही है। भारत सरकार ने इस संबंध में निर्देश दिया है कि एंटीबायोटिक दवाइयों का कम से कम उपयोग हो। सुपरवर्ग की समस्याएं भी पैदा होनी शुरू हो गई हैं। एलोपैथी में नवीनतम शोध व उपलब्धियां एक वरदान हैं, पर यदि वरदान का गलत उपयोग किया जाए तो वह भी अभिशाप बन जाता है।

एक ओर विश्व में अमीरी और सम्पन्नता बढ़ रही है और दूसरी ओर भुखमरी बढ़ रही है। विकास के साथ सामाजिक न्याय नहीं हो रहा है, आर्थिक विषमताएं बढ़ती जा रही हैं। अन्तर्राष्ट्रीय रैड क्रास के अनुसार विश्व में 100 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और 150 करोड़ अधिक खाने के कारण बीमार होते हैं। 24 लाख इसी कारण मरते हैं।

लाखों गांवों में अभी भी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंचीं। यदि कहीं छोटे-बड़े अस्पताल हैं भी तो बहुतों में या तो डाक्टर नहीं हैं या दवाइयां नहीं हैं। बहुत से गांवों में मीलों तक अभी सड़कें ही नहीं बनीं। बीमारी और गंभीर बीमारी होने पर रोगी न डाक्टर के पास और न ही डाक्टर रोगी के पास पहुंच सकता है। आज भी बिना इलाज व दवाई से मरते हैं बहुत गरीब।

भारत की इन परिस्थितियों में प्राकृतिक चिकित्सा, योग और प्राणायाम का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। इनके प्रयोग से मनुष्य प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहता है। बीमारी आती भी है तो बहुत देर से आती है। आज विश्व भर में योग पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है। प्राकृतिक चिकित्सा पर नए प्रयोग हो रहे हैं। जैसे ग्लोबल वार्मिंग की समस्याओं से निपटने के लिए-‘प्रकृति की ओर वापस जाओ’ का नारा लगाया जा रहा है। उसी प्रकार स्वस्थ भारत बनाने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और योग पर लौटने की बात की जा रही है। ये सुविधाएं बहुत कम साधनों से अधिक लोगों को दी जा सकती हैं।

यदि सरकार विद्यालयों में प्राइमरी शिक्षा से ही योग, प्राणायाम और प्राकृतिक चिकित्सा प्रारंभ करे तो स्वस्थ भारत बनाने में बहुत अधिक लाभ होगा। पाठ्यक्रम में इन विषयों को जोड़ा जा सकता है। खेलों की बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं में योग व प्राणायाम को शामिल किया जा सकता है।

एक अकेले स्वामी रामदेव जी ने एक टी.वी. चैनल द्वारा पूरे भारत को स्वस्थ बनाने में एक क्रांतिकारी राष्ट्रीय काम किया है। देश के करोड़ों लोग चैनल देखकर व स्वामी जी के शिविर में उपस्थित रह कर बिना दवाई के स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। वे परोक्ष रूप में सरकार का ही एक बड़ा काम कर रहे हैं। सरकार को उन्हें राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित करना चाहिए। यदि उस काम को सरकार अपना ले तो स्वस्थ भारत का सपना साकार हो सकता है।

आज से लगभग 35 वर्ष पहले मैं प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र बंगलौर में रहा था। मुझे गर्दन दर्द का भयंकर कष्ट था। कुछ और समस्याएं भी थीं। मेरी धर्मपत्नी को घुटनों में दर्द का रोग था। कुछ दिन के उपचार के बाद बहुत अधिक लाभ हुआ। वहीं पर मैंने सोचा कि इस प्रकार का केन्द्र तो हिमाचल प्रदेश में होना चाहिए। पाठकों को स्मरण होगा कि मैं जब पहली बार मुख्यमंत्री बना तो ऐनक लगाता था। लगभग 20 वर्ष ऐनक लगाता रहा। वहां योग प्राणायाम किया। आंखों की ज्योति बढ़ाने के व्यायाम विशेष रूप से किए और 6 महीने के बाद 20 वर्ष से लगी मेरी ऐनक उतर गई। आज 80 वर्ष की आयु में मैं ऐनक नहीं लगाता। मेरा गर्दन दर्द भी पूरी नियंत्रण में है, मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं।

मैं मुख्यमंत्री बना तो विवेकानंद ट्रस्ट बनाकर योग व प्राकृतिक चिकित्सा का केन्द्र कायाकल्प बनाया। आज यह विश्वविख्यात हो गया। इसे अन्तर्राष्ट्रीय निपुणता का आई.एस.ओ. 9000 प्रमाण पत्र भी मिल गया है। विश्व भर के लोग आते हैं, स्वास्थ्य लाभ करते हैं। कायाकल्प एक अस्पताल नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की कला सिखाने का केन्द्र है। हमने कायाकल्प में प्राकृतिक चिकित्सा की सभी विधाओं को एक परिसर में इकट्ठा किया है। ऐसा भारत में कहीं नहीं है।

मैं 35 वर्ष के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर सबको यह सलाह देता हूं कि यदि स्वस्थ रहना है तो योग, प्राणायाम व प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाएं। मैं प्रतिदिन प्रात:काल 2 घंटे इसी में लगाता हूं। किसी विद्वान को प्रश्र किया कि स्वास्थ्य का रहस्य क्या है, उत्तर दिया-‘डाक्टर से परहेज।’ डाक्टर तो चाहिए पर कम से कम और कभी-कभी।

Posted By : Hemant Kumar Mishra [Editor in Chief]
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